Sunday, May 17, 2026
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पेट्रोल की ऊंची कीमतों के लिए ऑयल बॉन्ड आज कितना जिम्मेदार?


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पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर चर्चा होते ही ऑयल बॉन्ड का मुद्दा फिर सामने आ जाता है. अक्सर यह दावा किया जाता है कि आज भी जनता महंगे पेट्रोल डीजल के जरिए पुराने ऑयल बॉन्ड का बोझ चुका रही है. लेकिन असली आंकड़े कहानी कुछ और बताते हैं. 2005 से 2010 के बीच सरकार ने तेल कंपनियों के घाटे को छिपाने के लिए करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे. इन पर ब्याज और मूलधन मिलाकर कुल देनदारी करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंची. दूसरी तरफ 2014 से 2023 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स से 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर ली. ऐसे में सवाल यही है कि क्या आज भी महंगे ईंधन की सबसे बड़ी वजह ऑयल बॉन्ड हैं या फिर सरकारों के लिए पेट्रोल डीजल सबसे भरोसेमंद कमाई का जरिया बन चुका है.

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2008 के बाद लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर रही थीं. (AI)

नई दिल्ली. भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ते ही राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा मुद्दा ऑयल बॉन्ड बन जाता है. एक पक्ष कहता है कि पिछली सरकारों ने जो बोझ छोड़ा था, उसकी कीमत आज देश चुका रहा है. दूसरी तरफ कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि अब ऑयल बॉन्ड का असर बेहद सीमित रह गया है और मौजूदा महंगे पेट्रोल डीजल की असली वजह सरकारों की टैक्स कमाई है. यही वजह है कि ऑयल बॉन्ड को समझना जरूरी हो जाता है क्योंकि इसी के जरिए यह साफ होता है कि आखिर भारत में ईंधन इतना महंगा क्यों है. 2005 से 2010 के बीच दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं. उस समय केंद्र में यूपीए (UPA) सरकार थी.

अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाए जाते तो देश में महंगाई बेकाबू हो सकती थी और जनता पर भारी बोझ पड़ता. इसलिए सरकार ने तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल (Indian Oil), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL) को बाजार भाव से कम कीमत पर पेट्रोल डीजल बेचने के लिए कहा. इससे तेल कंपनियों को भारी नुकसान होने लगा. इस नुकसान को अंडर रिकवरी कहा गया. सामान्य स्थिति में सरकार सीधे नकद सब्सिडी देकर यह घाटा भरती, लेकिन उस समय सरकार के पास इतना पैसा नहीं था. अगर सीधे नकद भुगतान किया जाता तो राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ जाता और भारत की क्रेडिट रेटिंग पर असर पड़ सकता था.

सरकार ने कैसे निकाला रास्ता?

सरकार ने नकद भुगतान करने के बजाय ऑयल बॉन्ड जारी किए. ये असल में सरकारी उधारी के कागज थे जिनमें सरकार ने वादा किया कि वह भविष्य में मूलधन और ब्याज दोनों लौटाएगी. इन बॉन्ड की अवधि 15 से 20 साल तक की थी और इन पर लगभग 7 से 8 प्रतिशत ब्याज दिया जाता था. तेल कंपनियां इन बॉन्ड को अपने पास रख सकती थीं या फिर बाजार में बेचकर तुरंत पैसा जुटा सकती थीं. इससे सरकार को तत्काल नकद भुगतान से राहत मिल गई लेकिन भविष्य के लिए बड़ा कर्ज खड़ा हो गया.

कितना था ऑयल बॉन्ड का कुल बोझ?

2005 से 2010 के बीच सरकार ने करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए. लेकिन असली बोझ केवल मूलधन तक सीमित नहीं था. इन पर वर्षों तक ब्याज भी देना पड़ा. ब्याज और मूलधन को मिलाकर कुल देनदारी करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई. 2014 के बाद धीरे धीरे इन बॉन्ड की मियाद पूरी होने लगी. 2021, 2023, 2024 और 2026 में कई बड़े बॉन्ड मैच्योर हुए जिन्हें सरकार ने चुकाया. सरकार को इन वर्षों में भारी ब्याज भुगतान भी करना पड़ा. हालांकि अब ज्यादातर बॉन्ड का भुगतान हो चुका है और केवल कुछ हिस्से ही बाकी बचे हैं.

फिर पेट्रोल डीजल पर इतना टैक्स क्यों?

यहीं से असली बहस शुरू होती है. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि पेट्रोल डीजल पर भारी टैक्स इसलिए लगाया जा रहा है ताकि पुराने ऑयल बॉन्ड का पैसा चुकाया जा सके. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि वास्तविकता इससे काफी अलग है. 2014 से 2023 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी और सेस के जरिए 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की. अगर इसकी तुलना ऑयल बॉन्ड की कुल 2.4 लाख करोड़ रुपये की देनदारी से की जाए तो यह रकम उसके मुकाबले 10 गुना से भी ज्यादा बैठती है.

आंकड़ा अनुमानित रकम
ऑयल बॉन्ड की कुल देनदारी करीब ₹2.4 लाख करोड़
2014-2023 के बीच पेट्रोल डीजल से टैक्स कमाई ₹25 लाख करोड़ से ज्यादा

यानी सरकार ने केवल कुछ वर्षों में पेट्रोल डीजल से जितना टैक्स जुटाया, वह ऑयल बॉन्ड के कुल बोझ से कई गुना ज्यादा है.

आज के महंगे पेट्रोल डीजल के पीछे ऑयल बॉन्ड हैं?

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक अब ऑयल बॉन्ड का मौजूदा ईंधन कीमतों पर लगभग कोई सीधा असर नहीं बचा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें वर्षों पहले डीरेगुलेट हो चुकी हैं. पेट्रोल 2010 में और डीजल 2014 में बाजार आधारित मूल्य प्रणाली में आ गए थे. सैद्धांतिक रूप से अब ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव और टैक्स ढांचे के हिसाब से तय होती हैं, न कि पुराने सरकारी कर्ज के आधार पर. ऐसे में अगर सरकार चाहे तो बाकी बचे ऑयल बॉन्ड का भुगतान सामान्य टैक्स आय से कर सकती है और पेट्रोल डीजल पर टैक्स कम करके जनता को राहत दे सकती है.

फिर सरकारें कीमतें कम क्यों नहीं करतीं?

इसका सबसे बड़ा कारण राजस्व है. पेट्रोल और डीजल भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए सबसे स्थिर और भरोसेमंद कमाई का जरिया बन चुके हैं. सड़क निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं और बजट घाटे को संभालने के लिए सरकारें इसी टैक्स आय पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद कई बार जनता को उतनी राहत नहीं मिलती जितनी उम्मीद होती है. सरकारें टैक्स घटाने के बजाय उस अतिरिक्त कमाई का इस्तेमाल अपने बजट संतुलन के लिए करती हैं. हालांकि, पिछले कुछ समय से एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर के ऊपर बनी हुई हैं. ऐसे में पेट्रोल की कीमतें घटाना तो दूर अब खबरें हैं कि दाम उल्टा बढ़ाए जा सकते हैं.

असली तस्वीर क्या कहती है?

ऑयल बॉन्ड भारत की आर्थिक नीति का एक बड़ा अध्याय जरूर रहे हैं और उन्होंने सरकार पर वित्तीय बोझ भी डाला. लेकिन आज पेट्रोल डीजल की ऊंची कीमतों की पूरी जिम्मेदारी केवल उन्हीं पर डालना सही तस्वीर नहीं दिखाता. असलियत यह है कि ईंधन अब सरकारों के लिए सबसे बड़ा टैक्स इंजन बन चुका है. ऐसे में ऑयल बॉन्ड एक राजनीतिक तर्क जरूर हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा कीमतों के पीछे सबसे बड़ी ताकत सरकारों की राजस्व जरूरतें ही हैं.

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जय ठाकुरSenior-Sub Editor

मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…और पढ़ें



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सड़क हादसे में अररिया के शख्स की भागलपुर में मौत: बालू लाने जमुई जा रहा था, खगड़िया में ट्रक खलासी का हुआ एक्सीडेंट – Bhagalpur News




खगड़िया में सड़क हादसा हुआ, जिसमें अररिया के रामपुर कोदरकट्‌टी गांव निवासी मंजा टुडू घायल हो गए थे। शनिवार रात भागलपुर में इलाज के दौरान उनकी मौत हुई। मंजा मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था और ट्रक में खलासी का काम करता था। उसकी मौत से पत्नी और छोटे बच्चे का सहारा छिन गया है। मृतक के भाई अंजू ने बताया कि मंजा टुडू ट्रक का खलासी था। जो जमुई में बालू लाने निकला था। इसी दौरान खगड़िया में ट्रक हादसे का शिकार हो गया। हादसे के बाद गंभीर रूप से घायल मंजा टुडू को इलाज के लिए भागलपुर के मायागंज अस्पताल रेफर किया गया था। खगड़िया पुलिस ने फोन पर दी सूचना
भाई अंजू ने कहा कि खगड़िया पुलिस ने फोन कर सूचना दी कि मंजा टुडू गंभीर रूप से घायल है और उसे मायागंज अस्पताल भेजा गया है। सूचना मिलने के बाद परिवार के लोग आनन-फानन में भागलपुर के लिए रवाना हुए। 12 बजे जब परिजन मायागंज अस्पताल पहुंचे, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। मृतक की पत्नी चांदनी सुमन का रो-रोकर बुरा हाल है। भाभी मेरी मुर्म ने बताया कि मंजा टुडू की शादी 2020 में हुई थी। दंपती का एक छोटा बच्चा भी है। कम उम्र में पति की मौत के बाद पत्नी और बच्चे के सामने अब जीवनयापन की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। बरारी पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है



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बंगाल में दीदी के अपने हुए पराए, पूर्व मंत्री ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज कराई शिकायत


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दीदी के अपने हुए पराए, पूर्व मंत्री ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज कराई केस

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टीएमसी के पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री गियासुद्दीन मोल्ला ने मगराहाट पश्चिम में अभिषेक बनर्जी और पुलिस अधिकारी मिथुन कुमार डे पर मारपीट, दुरुपयोग और धमकी के आरोप में शिकायत दर्ज करवाई है.

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टीएमसी के एक पूर्व विधायक और मंत्री ने अभिषेक बनर्जी के खिलफ केस दर्ज करवाया है.

“तृणमूल कांग्रेस के तीन बार विधायक रह चुके और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली कैबिनेट के पूर्व सदस्य गियासुद्दीन मोल्ला ने पार्टी के महासचिव और लोकसभा सदस्य अभिषेक बनर्जी और एक पुलिस अधिकारी मिथुन कुमार डे के खिलाफ दक्षिण 24 परगना जिले के मगराहाट (पश्चिम) विधानसभा क्षेत्र के एक स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई है.

रविवार को अपनी पुलिस शिकायत दर्ज कराने की पुष्टि करते हुए, मोल्ला ने कहा कि वह पुलिस कार्रवाई और अपनी ही पार्टी द्वारा प्रताड़ित किए जाने के डर से चुप रहे थे. मोल्ला मगराहाट (पश्चिम) से तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक हैं और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक मामलों व मदरसा शिक्षा के पूर्व मंत्री भी रह चुके हैं.

मोल्ला ने कहा कि मैं डर के साए में जी रहा था, इसलिए मैंने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं की. मुझे डर था कि मेरी ही पार्टी के कार्यकर्ता मुझ पर हमला कर सकते हैं और मुझे परेशान कर सकते हैं. हालांकि अब मैं पुलिस में शिकायत दर्ज करा रहा हूं क्योंकि मुझे नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाले प्रशासन पर भरोसा है.

2011 से 2026 तक मगराहाट (पश्चिम) निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे मोल्ला को हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी द्वारा दोबारा टिकट नहीं दिया गया था. इसके बजाय, पार्टी ने शमीम अहमद मोल्ला को उम्मीदवार बनाया, जो मौजूदा विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से एक हैं.

उनके अनुसार, दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर उपमंडल के पूर्व उप-विभागीय पुलिस अधिकारी (एसडीपीओ) मिथुन कुमार डे, तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग के खिलाफ अनावश्यक दंडात्मक कार्रवाई करते थे. ये नेता और कार्यकर्ता अभिषेक बनर्जी द्वारा पार्टी चलाने के तानाशाही तरीके को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे.

टीएमसी कार्यकर्ता को मिथुन कुमार डे ने बुरी तरह पीटा था

तृणमूल कांग्रेस के एक कार्यकर्ता को मिथुन कुमार डे ने बुरी तरह पीटा था. उसने पुलिस स्टेशन के अंदर पार्टी कार्यकर्ताओं को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया. उस समय पार्टी विधायक होने के नाते, मैंने इसका विरोध किया लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ. इसके विपरीत, मिथुन कुमार डे ने मुझे डांटा और अपनी लाठी लेकर मुझे पीटने के लिए मेरी तरफ दौड़ा. मैंने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी, दोनों को इस बारे में बताया लेकिन कोई समाधान नहीं निकला.

उन्होंने यह भी कहा कि अभिषेक बनर्जी को सब कुछ पता था और मिथुन कुमार डे ने बनर्जी के निर्देशों पर ही ऐसी हरकतें की थीं. हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले, भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने डे को चुनाव से जुड़ी किसी भी ड्यूटी से रोक दिया था.

इससे पहले शुक्रवार रात को ही उत्तरी 24 परगना जिले के बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट के तहत बिधाननगर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई थी. उन पर आरोप है कि उन्होंने राज्य में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों से पहले कथित तौर पर हिंसा भड़काई और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को धमकी दी. वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई का आरोप लगाया है.

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संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें



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आलिया भट्ट का हीरो, संजय लीला भंसाली संग किया काम, फिर भी काम को है मोहताज


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शांतनु महेश्वरी ने छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक अपने अभिनय का जलवा बिखेरा है. उन्होंने टीवी सीरियल्स से अपने करियर की शुरुआत की थी और फिल्मों में भी धाक जमाई. शांतनु महेश्वरी को संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में आलिया भट्ट के अपोजिट देखा गया था. इस फिल्म को शांतनु के करियर में अहम मोड़ की तरह देखा जा रहा था.

नई दिल्ली.‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में आलिया भट्ट के अपोजिट अहम किरदार अदा कर शांतनु ने खूब वाहवाही लूटी. फिल्म में उनके अभिनय को काफी सराहा गया था. उम्मीद की जा रही थी कि संजय लीला भंसाली के साथ काम करने के बाद एक्टर के करियर को नई दिशा मिलेगी. हाल ही में न्यूज18 के साथ बातचीत में शांतनु ने कहा कि बड़ी फिल्म का हिस्सा रहने के बावजूद उनके करियर को नई दिशा नहीं मिल पाई है.

शांतनु से पूछा गया कि क्या इंडस्ट्री में उनके लिए चीजें और आसान हो गई हैं तो एक्टर ने कहा कि नहीं ऐसा नहीं है. वो कहते हैं, ये तो आपने अलग नस छू दी. मैं क्या ही कहूं. आसान नहीं है यार, चीजें बिलकुल भी आसान नहीं हैं. जब आप किसी बड़े और दिग्गज के साथ काम कर लेते हो तो चीजें और भी मुश्किल हो जाती हैं.

वो आगे कहते हैं कि अगर एक बार आपने अच्छा खाना खा लिया है तो फिर आपको बेकार खाने की परख हो जाती है. ये अक्सर होता है. मैं अभी इसी प्रक्रिया में हूं. मुझे खराब काम की परख है. कई बार मुझे लगता है कि चीजें अच्छी नहीं हैं, लेकिन मैं इसे भी पॉजिटिव तरीके से लेने की कोशिश कर रहा हूं.

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इस बारे में शांतनु आगे कहते हैं कि उनके लिए चीजें अभी भी काफी मुश्किल हैं, लेकिन वो अपनी कोशिश जारी रखेंगे. उन्होंने आगे कहा, ‘मैं संघर्ष करने के लिए तैयार हूं और कड़ी मेहनत करने के लिए भी. मैं अपनी स्किल्स को लगातार निखारता रहूंगा, और मुझे लगता है कि भगवान मेरे साथ मेहरबान रहेंगे. अब तक रहे हैं, और उम्मीद है आगे भी रहेंगे’.

अभिनेता इन दिनों डांस पर आधारित यूथ शो ‘कैंपस बीट्स’ के छठे सीजन में नजर आ रहे हैं. यह शो 29 अप्रैल 2026 को अमेजन एमएक्स प्लेयर पर स्ट्रीम हुआ था और दर्शकों से खूब प्यार मिला है. इस पॉपुलर शो के नए सीजन में अपने किरदार के बारे में बात करते हुए वो कहते हैं कि वो अपनी जर्नी पर फोकस रहते हैं.

अभिनेता ने बताया, ‘बहुत कुछ लिखा गया था कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं. मेरे लिए सबसे जरूरी था कि मैं अपने किरदार और अपनी जर्नी पर फोकस करूं, और इस बात से प्रभावित न हो जाऊं कि ‘अरे यार, उसको ये सीन अच्छा मिल रहा है.’ नहीं, मुझे उन लोगों पर ध्यान देना है जो ईशान की जर्नी को फॉलो कर रहे हैं’. 

शांतनु महेश्वरी एक शानदार कलाकार होने के साथ ही बेहतरीन डांसर भी हैं. उन्होंने डांस के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी. शांतनु ने छोटे पर्दे पर डांस शो से पहचान बनाई थी. आलिया भट्ट के साथ काम करने के बाद एक्टर को बड़े पर्दे पर पहचान मिली. 

‘कैंपस बीट्स’ के इस सीजन में शांतनु महेश्वरी एक बार फिर ईशान के रोल में नजर आने वाले हैं. श्रुति सिन्हा नेत्रा के रोल में नजर आ रही हैं, वहीं शो में नए ट्विस्ट, इमोशनल ड्रामा और जबरदस्त डांस राइवलरी देखने को मिल रही है.

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बाराबंकी में प्रधान संघ ने की कार्यकाल बढ़ाने की मांग: पंचायत चुनाव तक पद पर बने रहने के लिए मुख्यमंत्री को भेजा ज्ञापन – Barabanki News




बाराबंकी के सिरौलीगौसपुर क्षेत्र में ग्राम प्रधानों ने पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाने की मांग की है। इस संबंध में प्रधान संघ ने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भेजा है। यह ज्ञापन प्रधान संघ अध्यक्ष विकेश वर्मा के नेतृत्व में खाद्य एवं रसद राज्य मंत्री सतीश चंद्र शर्मा के माध्यम से लोकनिर्माण विभाग अतिथि गृह में सौंपा गया। ज्ञापन में बताया गया है कि त्रिस्तरीय पंचायतों में वर्तमान ग्राम प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। पंचायत चुनाव की तैयारियों और संभावित देरी को देखते हुए समय पर चुनाव संपन्न होने पर संशय बना हुआ है। प्रधान संघ ने आशंका व्यक्त की है कि यदि समय पर चुनाव नहीं होते हैं, तो सरकार ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त कर सकती है। प्रधान संघ अध्यक्ष विकेश वर्मा ने कहा कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के स्थान पर सरकारी कर्मचारियों को प्रशासक बनाना उचित नहीं होगा। उन्होंने जोर दिया कि निर्वाचित प्रधानों का कार्यकाल पंचायत चुनाव संपन्न होने तक बढ़ाया जाना चाहिए। ग्रामीण जनता का विश्वास इससे विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे और ग्रामीण जनता का विश्वास भी बना रहेगा। प्रधान संघ ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि यदि किसी कारणवश पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते हैं, तो त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाने के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।



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भीषण गर्मी में भी नहीं रुके कदम: बीकानेर रेलवे स्टेशन परिसर से हटाया एक ट्रॉली कचरा, हर सप्ताह एक घंटा सफाई का अभियान – Bikaner News




भीषण गर्मी और तेज हीट वेव के बीच, जब अधिकांश लोग घरों से बाहर निकलने से बच रहे हैं, ऐसे समय में टीम “आवर फॉर नेशन” के सदस्यों ने शनिवार सुबह समाज सेवा का प्रेरणादायी उदाहरण पेश किया। टीम ने बीकानेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-1 स्थित एस्केलेटर एंट्री की पार्किंग और सजावटी क्षेत्र में विशेष सफाई अभियान चलाया। अभियान के दौरान पूरे क्षेत्र की गहन सफाई कर लगभग एक ट्रैक्टर-ट्रॉली कचरा हटाया गया। टीम के सदस्यों ने धूल, प्लास्टिक कचरा, पुराने बैनर और अन्य गंदगी हटाकर क्षेत्र को स्वच्छ और व्यवस्थित स्वरूप दिया। स्टेशन पर वैसे तो सफाई कर्मचारी है लेकिन वो रेलवे प्लेटफॉर्म तक ही सीमित रहते हैं, ऐसे में ऑवर फॉर नेशन की टीम ने स्टेशन के उस हिस्से को साफ कर दिया, जो आमतौर पर कचरे से भरा दिखता है। एक से डेढ़ घंटे में ही उस हिस्से की तस्वीर बदल गई। हर सप्ताह कुछ समय राष्ट्र के नाम टीम के सदस्य और सीए सुधीश शर्मा ने बताया कि स्वच्छता केवल अभियान नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी है। “हर सप्ताह कुछ समय राष्ट्र के नाम” की भावना के साथ टीम लगातार शहर में स्वच्छता और जनजागरण के कार्य कर रही है। इस टीम में शहर के कई इंजीनियर, स्कूल-कॉलेज संचालक, टीचर, डॉक्टर, सीए, वकील, एकाउंट स्पेशलिस्ट्स शामिल है। विशेष बात यह रही कि टीम के संचालक शर्मा शहर से बाहर होने के बावजूद सदस्यों का उत्साह कम नहीं हुआ। टीम ने पूरे समर्पण और अनुशासन के साथ अभियान को सफल बनाया। यात्रियों और आमजन ने की सराहना रेलवे स्टेशन जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल पर चलाए गए इस अभियान की यात्रियों और आमजन ने भी सराहना की। अभियान में सीए वसीम रज़ा, पुरुषोत्तम शर्मा, गुरमोहन सेठी, इन्द्र सिंह, गजेंद्र सिंह, बसंत, भवानी सिंह राजपुरोहित, डॉ. रेखा श्रीवास्तव, दीपा सिंह, वंदना शर्मा, चन्द्र कला उपाध्याय, डॉ. फारूक अहमद, किशोर भाटिया, मो. हसन, मानक व्यास, रामहंस मीना, राजू ड्रेसर और महेंद्र तिवारी सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।



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NEET पेपर लीक केस में 9वां आरोपी कोर्ट में पेश: राउज एवेन्यू कोर्ट ने बॉटनी टीचर मनीषा मंधारे को 14 दिन की CBI कस्टडी में भेजा


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नई दिल्ली6 मिनट पहले

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NEET-UG 2026 पेपर लीक केस में गिरफ्तार 9वीं आरोपी को CBI ने राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया। जहां कोर्ट ने बॉटनी टीचर मनीषा मंधारे को 14 दिन की कस्टडी में भेज दिया है।

पुणे की बायोलॉजी लेक्चरर मनीषा गुरुनाथ को दिल्ली में CBI हेडक्वार्टर में पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया था। एजेंसी का दावा है कि मंधारे NTA की पेपर सेटिंग कमेटी का हिस्सा थीं।

मंधारे जानती थीं कि एग्जाम में कौन से सवाल आएंगे। उसने एग्जाम से पहले पुणे में स्पेशल कोचिंग क्लास चलाई। वहां छात्रों को बॉटनी और जूलॉजी के सवाल नोट करवाए थे।

जांच में यह भी सामने आया है कि मंधारे ने पुणे से गिरफ्तार ब्यूटीशियन मनीषा वाघमारे के जरिए NEET देने वाले स्टूडेंट्स को अपने कोचिंग में एडमिशन दिलाया था।

CBI ने अब तक इस मामले में दिल्ली, जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्यानगर से 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

मंधारे ने पेपर के बदले लाखों रुपए लिए

CBI के मुताबिक मनीषा मंधारे और मनीषा वाघमारे ने छात्रों और उनके पेरेंट्स से लीक पेपर देने के बदले लाखों रुपए लिए। बाद में मनीषा वाघमारे ने अपने कॉन्टेक्ट्स के और लोगों तक पेपर पहुंचाए। मनीषा वाघमारे 14 मई को गिरफ्तार हुई थी।

मनीषा वाघमारे और पेपर लीक के मास्टरमाइंड पीवी कुलकर्णी से पूछताछ के आधार पर ही मनीषा मंधारे की गिरफ्तारी हुई है। कुलकर्णी लातूर का केमिस्ट्री प्रोफेसर है और कई सालों तक NEET पेपर सेटिंग से जुड़े पैनल का हिस्सा था।

एजेंसी के मुताबिक कुलकर्णी ने अप्रैल के आखिरी हफ्ते में अपने घर पर स्पेशल क्लास लेकर छात्रों को वे सवाल, ऑप्शन और जवाब बताए थे, जो बाद में एग्जाम में आए।

NTA में IRS अफसर आकाश जैन समेत 4 अधिकारियों की नियुक्ति

केंद्र सरकार ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) में बड़े प्रशासनिक फेरबदल करते हुए चार अधिकारियों की नियुक्ति की है। IRS अधिकारी आकाश जैन और आदित्य राजेंद्र भोजगढिया को जॉइंट डायरेक्टर बनाया गया है।

अनुजा बापट और रुचिता विज को भी NTA में जॉइंट सेक्रेटरी बनाया गया है। दोनों का कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तारीख से पांच साल या अगले आदेश तक रहेगा।

3 मई को हुई NEET-UG, 12 मई को रद्द, 21 जून को रीएग्जाम

NEET-UG परीक्षा 3 मई को देश के 551 शहरों और विदेश के 14 केंद्रों पर आयोजित हुई थी। इसमें करीब 23 लाख उम्मीदवार शामिल हुए थे। NTA के अनुसार 7 मई की शाम परीक्षा में गड़बड़ी की सूचना मिली थी। इसके बाद मामला केंद्रीय एजेंसियों को सौंपा गया। 12 मई को परीक्षा रद्द की गई और रीएग्जाम का फैसला लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट पहुंची NTA को भंग करने की मांग वाली याचिका

यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) ने NEET-UG 2026 पेपर लीक, एग्जाम कैंसिल होने के मामले में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को भंग करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड रितु रेनीवाल और एडवोकेट महेंद्र कुमावत ने याचिका दायर की है। इसमें एक रिट जारी करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह NTA को भंग कर दे। उसकी जगह संसद से पारित कानून के आधार पर नेशनल टेस्टिंग बॉडी बनाई जाए।

याचिका में एक ऐसी समिति गठित करने की भी मांग की गई है, जिसकी निगरानी अदालत करे। इस समिति का काम नेशनल लेवल की परीक्षाएं ऑर्गनाइज करने की प्रक्रिया की देखरेख करना और यह सुनिश्चित करना होगा कि परीक्षाओं का कोई पेपर न हो।

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NTA से NEET के दोनों पेपर लीक हुए: दूसरे के सवाल भी हूबहू क्वेश्चन बैंक में शामिल थे, 2 सेट में होते हैं प्रिंट

NEET पेपर लीक मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। CBI की जांच में सामने आया है कि नीट-26 के लिए फाइनल हुए पेपर के दोनों सेट प्रिंट होने से पहले ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से लीक हो गए थे। एजेंसी के एक अधिकारी ने बताया कि जो पेपर 3 मई को परीक्षा में आया और जो रिजर्व में रखा गया था, दोनों के बायोलॉजी और केमिस्ट्री के सभी सवाल हूबहू क्वेश्चन बैंक (गेस पेपर) में थे। पढ़ें पूरी खबर…

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फ्रिजर कंप्रेशर फटने से दुकान में आग, लाखों का नुकसान: शिवपुरी में मुक्तिधाम के सामने स्टॉल में देर रात आग, एक घंटे में काबू पाया जा सका – Shivpuri News




शिवपुरी शहर के देहात थाना क्षेत्र में शनिवार देर रात एक स्टॉल में आग लग गई। कोल्ड्रिंक्स फ्रिजर का कंप्रेशर फटने से लगी इस आग में दुकान का लाखों का सामान जलकर राख हो गया। घटना की सूचना मिलते ही डायल 112 और फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंची, जिन्होंने करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। पुरानी शिवपुरी निवासी रविंद्र खेमरिया मुक्ति धाम के सामने चाय, कोल्ड्रिंक्स और परचून की दुकान चलाते हैं। शनिवार रात करीब 11 बजे दुकान बंद होने के बाद अचानक कोल्ड्रिंक्स कंपनी के फ्रिजर का कंप्रेशर फट गया। धमाका इतना जोरदार था कि स्टॉल का एक हिस्सा भी टूट गया और दुकान के अंदर आग तेजी से फैल गई। आग की लपटें देखकर राहगीरों ने तुरंत डायल 112 को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने फायर ब्रिगेड को बुलाया। इसी दौरान दुकान संचालक रविंद्र खेमरिया भी घटनास्थल पर पहुंच गए। फायर ब्रिगेड ने कड़ी मशक्कत कर आग बुझाई, लेकिन तब तक दुकान में रखा अधिकांश सामान पूरी तरह जल चुका था। दुकान संचालक रविंद्र खेमरिया के अनुसार, इस आगजनी की घटना में उन्हें करीब दो लाख रुपए का नुकसान हुआ है।



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ऑस्ट्रेलिया में पंजाबियों को डराने वाला संगठन बैन: न्यू नाजी संगठन करता था नस्लीय टिप्पणियां; सिखों की कृपाण का विरोधी – Jalandhar News




ऑस्ट्रेलिया में रह रहे पंजाबी समुदाय को वहां की सरकार ने बड़ी राहत दी है। गृह मंत्री टोनी बर्क ने पंजाबी कम्युनिटी सहित सभी भारतीय लोगों के खिलाफ नस्लीय टिप्पणियां करने और रैलियां निकाल डराने वाले न्यू नाजी संगठन को हमेशा के लिए बैन कर दिया है। गृह मंत्री टोनी बर्क ने प्रतिबंध की घोषणा करते हुए साफ किया है कि अब इस संगठन से जुड़ने, इसका प्रचार करने या इसकी गतिविधियों में भाग लेने वाले किसी भी व्यक्ति को 15 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। सरकार के इस कड़े फैसले का ऑस्ट्रेलिया में रह रहे पंजाबी समुदाय ने स्वागत किया है और इसे समाज में शांति और भाईचारे की जीत बताया है। यह संगठन पिछले कुछ सालों से एडोल्फ हिटलर की नाजी विचारधारा का प्रचार कर रहा था और देश में रह रहे गैर-श्वेत प्रवासियों को निशाना बना रहा था। खासकर मेलबर्न और सिडनी जैसे बड़े शहरों में इस ग्रुप के लीडर थॉमस सेवेल ने प्रवासियों के खिलाफ कई रैलियां निकाली थीं। यह ग्रुप सोशल मीडिया और जमीन पर लगातार ऑस्ट्रेलियाई समाज को बांटने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसक माहौल तैयार करने की कोशिशों में जुटा था, जिसके बाद सरकार ने नए सख्त नफरत-विरोधी कानूनों के तहत इसे गैर-कानूनी और नफरत फैलाने वाला समूह घोषित कर दिया है। जानें पंजाबी समुदाय को कब-कब किया टारगेट… जानें क्या है संगठन और क्यों लगा बैन…



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बिहार में नई पॉलिटिकल लाइन खिंच गई! ललन ने बताया नीतीश की विरासत का नया अध्याय


पटना. “जब नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की कमान छोड़ने का फैसला किया, तो उन्होंने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी खुद तय किया था. नीतीश जी ने सम्राट चौधरी के हाथों में अपना उत्तराधिकार सौंपा था.” अपने इसी संबोधन में ललन सिंह ने आगे जोड़ा कि “सम्राट चौधरी सिर्फ भाजपा की पसंद नहीं थे, बल्कि उन्हें खुद नीतीश कुमार ने आशीर्वाद दिया था. सम्राट चौधरी ने भी संकल्प लिया है कि वे नीतीश कुमार के दिखाए विकास के रास्ते पर ही बिहार को आगे बढ़ाएंगे.” लखीसराय के एक दिवसीय दौरे पर पहुंचे केंद्रीय पंचायती राज मंत्री ललन सिंह ने खुले मंच से जैसे ही बिहार के वर्तमान और भावी नेतृत्व को लेकर जेडीयू का रुख साफ किया, उनके इस बयान ने बिहार की राजनीति में अचानक ही गर्माहट ला दी है.

दरअसल, बिहार की सियासत में ‘उत्तराधिकार’ का सवाल हमेशा से सबसे जटिल और संवेदनशील रहा है. ऐसे में राजनीति के जानकारों की नजर में ललन सिंह का दिया गया बयान जेडीयू और बीजेपी के शीर्ष स्तर पर तय की गई एक बेहद गहरी रणनीतिक बिसात का हिस्सा माना जा रहा है. ललन सिंह का यह बयान इसलिए भी अहम है, क्योंकि बिहार में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने हैं. इसको लेकर विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि मुख्यमंत्री चयन भाजपा का एकतरफा फैसला था और जेडीयू की भूमिका सीमित हो गई है. अब जब उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा की है तो ललन सिंह के इस बयान को सिर्फ एक राजनीतिक प्रशंसा भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार NDA की भविष्य की राजनीति का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है.

ललन सिंह के बयान के कई राजनीतिक मायने

ललन सिंह ने जब यह कहा कि सम्राट चौधरी ने भी यह संकल्प लिया है कि वे नीतीश कुमार द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलते हुए बिहार के विकास को आगे बढ़ाएंगे. साफ है कि उनके इस बयान को बिहार एनडीए की भविष्य की राजनीति का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से पीछे हटने के बाद बिहार एनडीए के भीतर जो नए शक्ति केंद्र उभर रहे हैं, ललन सिंह का यह बयान उन समीकरणों को एक नया आकार देता हुआ प्रतीत हो रहा है. ललन सिंह के बयान ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सम्राट चौधरी को सिर्फ भाजपा का समर्थन नहीं, बल्कि खुद नीतीश कुमार की सहमति और भरोसा भी प्राप्त था.

निशांत कुमार बनाम सम्राट चौधरी

ललन सिंह का यह बयान अचानक नहीं आया है, इसके पीछे हालिया सियासी घटनाक्रम है. मार्च 2026 में जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से हटने के संकेत दिए, तो उनके बेटे निशांत कुमार आधिकारिक तौर पर जेडीयू में शामिल हो गए थे. इसके बाद 15 अप्रैल 2026 में एनडीए गठबंधन के तहत भाजपा के सम्राट चौधरी को बिहार का नया मुख्यमंत्री बनाया गया. इसके बाद मंत्रिपरिषद विस्तार में बीते 7 मई को निशांत कुमार को उनके मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई. इसके बावजूद, जेडीयू के अंदर और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि क्या नीतीश कुमार अपनी पारिवारिक विरासत को ही आगे बढ़ाएंगे. लेकिन, लखीसराय में ललन सिंह ने ‘उत्तराधिकारी’ शब्द का इस्तेमाल करके यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत का नेतृत्व अब भाजपा के सम्राट चौधरी के हाथों में है, न कि उनके बेटे निशांत कुमार के पास.

लव-कुश समीकरण की मजबूरी

बिहार में नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे बड़ा आधार ‘लव-कुश’ (कुर्मी और कोइरी) वोट बैंक रहा है. नीतीश कुमार खुद कुर्मी जाति से आते हैं, जबकि वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कोइरी (कुशवाहा) समाज के बड़े चेहरे हैं. नीतीश कुमार के हटने के बाद इस बात का बड़ा डर था कि यह वोट बैंक बिखर सकता है. ललन सिंह ने सम्राट चौधरी को नीतीश का उत्तराधिकारी बताकर इस पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखने की रणनीतिक चाल चली है. वे संदेश देना चाहते हैं कि नीतीश कुमार के जाने के बाद भी ‘लव-कुश’ एकता की सरकार बिहार में मजबूती से काम कर रही है.

क्यों अहम है ललन सिंह का बयान?

बिहार में करीब दो दशक तक सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा इस सवाल से जुड़ी रही कि उनके बाद नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा. जेडीयू के भीतर भी कभी किसी नेता को खुलकर उत्तराधिकारी नहीं बताया गया. ऐसे में ललन सिंह जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक मंच से सम्राट चौधरी को उत्तराधिकारी बताना राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

ललन सिंह का बयान इसलिए भी खास

यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि बिहार में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने. विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि मुख्यमंत्री चयन भाजपा का एकतरफा फैसला था और जेडीयू की भूमिका सीमित हो गई थी. लेकिन ललन सिंह के बयान ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सम्राट चौधरी को सिर्फ भाजपा का समर्थन नहीं बल्कि खुद नीतीश कुमार की सहमति और भरोसा भी प्राप्त था.

NDA में संतुलन साधने की कोशिश

राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह बयान एनडीए के भीतर संतुलन बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है. बिहार में भाजपा और जेडीयू के रिश्ते हमेशा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहे हैं. ऐसे में सम्राट चौधरी को “नीतीश मॉडल” का विस्तार बताना जेडीयू समर्थकों को यह भरोसा देने की कोशिश है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद शासन की दिशा नहीं बदलेगी.

क्या आंतरिक खींचतान पर मरहम है बयान?

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार भाजपा के भीतर भी कई तरह की आंतरिक खींचतान की खबरें चर्चा में आ रही थीं. राजनीति के जानकारों का मानना है कि ललन सिंह ने यह बयान देकर सम्राट चौधरी की स्थिति को और मजबूत किया है. उन्होंने विपक्ष और भाजपा के विरोधी धड़े को यह संदेश दिया है कि मौजूदा सरकार और सम्राट चौधरी के पीछे नीतीश कुमार का पूरा नैतिक और राजनीतिक समर्थन खड़ा है.

बिहार में अनुकंपा बनाम जनता की राजनीति

बहरहाल, लखीसराय में दिया गया ललन सिंह का बयान बिहार की राजनीति में सामान्य राजनीतिक टिप्पणी से कहीं अधिक महत्व रखता है. ललन सिंह के इस बयान ने साफ कर दिया है कि एनडीए अब सम्राट चौधरी को सिर्फ वर्तमान मुख्यमंत्री नहीं बल्कि भविष्य के स्थायी नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. आगामी राजनीति में एनडीए गठबंधन सम्राट चौधरी के नेतृत्व को ही नीतीश कुमार के विकल्प और विकास के चेहरे के रूप में पेश करने जा रहा है.



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