LPG सिलेंडर से लेकर दवाई तक सब महंगा! जिनका बजट पहले से बिगड़ा, वो मिस न करें
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई को हिलाकर रख दिया है. एलपीजी गैस, पेट्रोल, डीजल और खाने-पीने की चीजों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं. दवाओं के कच्चे माल की कीमतों में 300% तक के उछाल ने स्वास्थ्य सेवाओं को भी महंगा कर दिया है. फिलहाल दिक्कत ये है कि न तो अमेरिका ही मान रहा है और न ही ईरान. दोनों के बीच चल रही ये लड़ाई न जाने कब रुकेगी. तो ऐसे में क्या आम आदमी की थाली से दाल और सब्जी कम होने वाली है? क्या पेट्रोकैमिकल प्रोडक्ट्स की बढ़ती कीमतें आपके बजट को पूरी तरह बिगाड़ देंगी? चलिए समझते हैं कि अब तक क्या-क्या महंगा हुआ है और आगे क्या होने वाला है.
पश्चिम एशिया में गहराता तनाव अब केवल समाचारों की सुर्खी नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे आपकी रसोई और बटुए पर हमला कर रहा है. जब भी दुनिया के उस हिस्से में हलचल होती है, तो भारत जैसे देश में उसकी गूंज पेट्रोल पंप से लेकर सब्जी मंडी तक सुनाई देती है. वर्तमान संकट ने सप्लाई चेन के लिए ऐसा व्यावधान खड़ा किया है कि आम आदमी के लिए अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण रास्तों के बंद होने से आयात-निर्यात का गणित पूरी तरह बिगड़ गया है, जिसका सीधा असर अब हमारी डेली लाइफ की चीजों के दाम पर दिखने लगा है. (Image – AI)

सबसे तगड़ा और पहला झटका रसोई गैस के रूप में लगा है. भारत अपनी जरूरत की 60% एलपीजी (LPG) बाहर से मंगवाता है, जिसका बड़ा हिस्सा उसी समुद्री रास्ते से आता है जो अभी तनाव की वजह से बंद है. इसकी वजह से साप्ताहिक आयात में भारी कमी आई है और घरेलू सिलेंडर के दाम ₹60 तक बढ़ गए हैं. कमर्शियल सिलेंडर की हालत तो और भी खराब है, जहां 1 मई 2026 से ₹993 की भारी बढ़ोतरी देखी गई है. दिल्ली में अब यह ₹3,071 और कोलकाता में ₹3,355 तक जा पहुंचा है. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप बाहर खाना खाने के शौकीन हैं, तो रेस्तरां और ढाबों के बढ़े हुए बिल आपकी जेब ढीली करने के लिए तैयार हैं.

घर में खाने-पीने की थाली भी इस महंगाई से अछूती नहीं रही. दालों और खाद्य तेल की कीमतें मार्च के महीने से ही ऊपर चढ़ना शुरू हो गई हैं. अरहर और मूंग जैसी जरूरी दालों के भाव बढ़ रहे हैं, वहीं पाम ऑयल भी करीब 5% महंगा हो गया है. समझने वाली बात ये है कि कभी-कभी कंपनियां दाम नहीं बढ़ातीं, बल्कि पैकेट का वजन कम कर देती हैं. जैसे पार्ले-जी का ₹5 वाला पैकेट अब 50 ग्राम के बजाय 45 ग्राम का रह गया है. इसके अलावा, क्रूड ऑयल महंगा होने से चीनी की कीमतों में भी उछाल आया है क्योंकि अब गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में ज्यादा हो रहा है. (Image – AI)
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ईंधन की बात करें तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹25 से ₹28 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी का काला साया मंडरा रहा है. भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 190-210 मिलियन डॉलर बढ़ चुका है. जब डीजल महंगा होता है, तो सामान ढोने वाले ट्रक अपना किराया बढ़ा देते हैं, जिससे मंडी में आने वाली हर सब्जी और फल महंगा हो जाता है. जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में औसत महंगाई दर 4.8% तक जा सकती है, जो पहले के अनुमान से लगभग दोगुनी है.

हवाई सफर करने वालों के लिए भी बुरी खबर है. जेट फ्यूल (ATF) की कीमतें 80 से बढ़कर 190 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. एयर इंडिया जैसी बड़ी कंपनियां अपनी रोजाना की उड़ानों में कटौती कर रही हैं. खासकर खाड़ी देशों (Gulf countries) में काम करने वाले लाखों भारतीय मजदूरों के लिए अपने घर आना-जाना अब एक सपना जैसा होता जा रहा है क्योंकि उड़ानों की कमी और भारी किराए ने उनकी मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया है.

बीमारी के वक्त काम आने वाली दवाइयां भी अब महंगी हो रही हैं. दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल यानी API और पैकेजिंग मटेरियल की कीमतें महज दो हफ्तों में 200% से 300% तक बढ़ गई हैं. पेरासिटामोल का कच्चा माल जो पहले ₹250 में मिलता था, अब ₹450 प्रति किलो हो गया है. हालात इतने गंभीर हैं कि सरकार अब जरूरी दवाओं की कीमतों में कुछ रियायत देने पर विचार कर रही है ताकि फैक्ट्रियां दवाओं का उत्पादन बंद न कर दें. आम आदमी के लिए अस्पताल का खर्च और दवाओं का बिल अब बजट बिगाड़ने वाला साबित हो रहा है.

रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें जैसे साबुन, शैम्पू और डिटर्जेंट भी इस संकट की चपेट में हैं. इन चीजों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का सीधा संबंध कच्चे तेल (Crude Oil) से होता है. पैकेजिंग की लागत बढ़ने और कच्चे माल की कमी की वजह से कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स के दाम 8% से 15% तक बढ़ाने की तैयारी में हैं. वहीं, प्लास्टिक से बनी चीजें जैसे बाल्टी, मग, खिलौने और यहां तक कि मेडिकल में इस्तेमाल होने वाली सिरिंज और आईवी बैग की कीमतें भी बढ़ सकती हैं क्योंकि प्लास्टिक बनाने वाला नेफ्था और पॉलिमर अब लगभग ₹1,51,200 प्रति टन के पार जा चुका है. (Image – AI)

कपड़ा उद्योग और खेती पर भी इस संकट की दोहरी मार पड़ी है. कपड़े बनाने के लिए जरूरी धागा और फाइबर सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों से आता है, जहां से सप्लाई रुक गई है. वहीं किसानों के लिए यूरिया की वैश्विक कीमत 500 से बढ़कर 700 डॉलर (लगभग ₹42,000 से ₹58,800) प्रति टन हो गई है. हालांकि सरकार सब्सिडी देकर किसानों को राहत देने की कोशिश कर रही है, लेकिन अगर खाद की कमी हुई तो आने वाले समय में अनाज की कीमतें आसमान छू सकती हैं. इसके साथ ही घर बनाने का सपना देख रहे लोगों के लिए स्टील और सरिया महंगा होने से कंस्ट्रक्शन की लागत भी काफी बढ़ गई है.























