Thursday, June 11, 2026
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50 साल बाद भी बरकरार है ‘एंग्री यंग मैन’ का जादू , असली डॉन से जुड़ा है ‘दीवार’ का कनेक्शन


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हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी हैं, जो सिर्फ हिट नहीं होतीं बल्कि एक दौर की पहचान बन जाती हैं. 1975 में रिलीज हुई ‘दीवार’ ऐसी ही फिल्मों में से एक है. इस फिल्म ने न केवल अमिताभ बच्चन के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि उन्हें बॉलीवुड का ‘एंग्री यंग मैन’ भी बना दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस फिल्म दिखा ‘विजय’ का किरदार असली डॉन से जुड़ा है.

नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के इतिहास में साल 1975 को एक ‘चमत्कारी साल’ माना जाता है. इसी साल दो ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने बॉक्स ऑफिस के सारे समीकरण बदल दिए. पहली ‘शोले’ और दूसरी यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी ‘दीवार’. आज अपनी रिलीज के 50 से अधिक साल बीत जाने के बाद भी ‘दीवार’ को एक ऐतिहासिक लैंडमार्क माना जाता है. इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में स्थापित कर बॉलीवुड का ‘शहंशाह’ बना दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि फिल्म में अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया ‘विजय वर्मा’ का आइकॉनिक किरदार महज एक कल्पना नहीं था, बल्कि वह असल जिंदगी के एक मशहूर अंडरवर्ल्ड डॉन से प्रेरित था? (Image: IMDb)

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दिग्गज लेखक जोड़ी सलीम-जावेद द्वारा लिखित ‘दीवार’ दो भाइयों की कहानी थी. एक भाई रवि (शशि कपूर) जो कानून के रास्ते पर चलकर ईमानदार पुलिस अफसर बनता है और दूसरा भाई विजय (अमिताभ बच्चन) जो समाज के अन्याय से तंग आकर अपराध और तस्करी की दुनिया का बेताज बादशाह बन जाता है. फिल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था.

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विजय का किरदार उस दौर के दर्शकों के दिलों में सीधे उतर गया था. वह पारंपरिक हीरो नहीं था, बल्कि एक ऐसा शख्स था जो समाज की नाइंसाफी, गरीबी और अपमान से जूझते हुए अपनी राह बनाता है. यही वजह थी कि लाखों लोगों ने खुद को ‘विजय’ के संघर्ष में देखा. फिल्म का असली आकर्षण विजय और उसकी मां (निरूपा रॉय) और भाई रवि के बीच का नैतिक टकराव था. Image: IMDb

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According to several accounts over the years, Vijay's rise in the world of smuggling bore similarities to the life of Haji Mastan, one of Mumbai's most famous underworld figures. Mastan was known for building a vast smuggling empire during a time when imported goods were heavily restricted in India. Unlike the stereotypical gangster, he cultivated an image of sophistication and influence, becoming a larger-than-life figure in Mumbai's social and business circles.

फिल्म इतिहासकारों और सिनेमा विशेषज्ञों की मानें तो विजय का यह किरदार काफी हद तक मुंबई के पहले बड़े अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान की शुरुआती जिंदगी पर आधारित था. हालांकि ‘दीवार’ कोई बायोपिक नहीं थी और इसकी कहानी पूरी तरह हाजी मस्तान के जीवन पर आधारित नहीं थी, लेकिन दोनों के जीवन में कई समानताएं देखी गईं. (Image: Instagram/@bollywoodtriviapc)

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हाजी मस्तान ने अपने करियर की शुरुआत मुंबई के डॉकयार्ड (बंदरगाह) पर एक मामूली कुली के रूप में की थी. ठीक इसी तरह, फिल्म ‘दीवार’ में भी अमिताभ बच्चन को शुरुआत में डॉकयार्ड पर कुली का काम करते और बांह पर ‘बिल्ला नंबर 786’ बांधे दिखाया गया है. हाजी मस्तान का नाम उस दौर में तस्करी की दुनिया का बड़ा चेहरा माना जाता था. ऐसे समय में जब भारत में विदेशी सामानों पर कड़े प्रतिबंध थे, उन्होंने तस्करी के जरिए एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया. साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर दौलत, रसूख और लोकप्रियता हासिल करने की उनकी कहानी काफी हद तक विजय वर्मा के सफर से मेल खाती थी. Image: IMDb

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फिल्म में विजय का संघर्ष, गरीबी से उठकर ताकतवर बनना और समाज में अपनी पहचान बनाना, कई लोगों को हाजी मस्तान की याद दिलाता है. हालांकि, फिल्म का मूल संदेश अपराध नहीं, बल्कि परिवार, नैतिकता और परिस्थितियों के बीच लिए गए फैसलों पर केंद्रित था. ‘दीवार’ ने भारतीय सिनेमा को कई यादगार संवाद भी दिए. फिल्म का मशहूर डायलॉग ‘आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, दौलत है’ और उसके जवाब में ‘मेरे पास मां है’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित डायलॉग्स में गिने जाते हैं. Image: IMDb

Interestingly, Haji Mastan was also the inspiration behind Ajay Devgn's character Sultan Mirza in the hit film, Once Upon a Time in Mumbaai (2010).

‘दीवार’ पहली फिल्म थी जिसने हाजी मस्तान की जिंदगी के हिस्सों को पर्दे पर उतारा और ब्लॉकबस्टर रही. दिलचस्प बात यह है कि इसके दशकों बाद, साल 2010 में आई मिलन लूथरिया की हिट फिल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ में अजय देवगन द्वारा निभाया गया ‘सुल्तान मिर्जा’ का किरदार भी पूरी तरह से हाजी मस्तान की ही जिंदगी और उनके बाद के दौर पर आधारित था.  Image: IMDb

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कटनी में ट्रक डिवाइडर तोड़कर रेल पुल से गिरा: पटरियों पर नहीं पहुंचने से हादसा टला, केबिन में फंसे ड्राइवर को सुरक्षित बाहर निकाला – Katni News




कटनी के नेशनल हाईवे-43 पर गुरुवार दोपहर को एक तेज रफ्तार ट्रक डिवाइडर को तोड़ता हुआ रेलवे ओवरब्रिज से सीधे नीचे जा गिरा। यह दुर्घटना बड़वारा इलाके के जगतपुर उमरिया गांव के पास हुई। अच्छी बात यह रही कि ट्रक सीधे रेल की पटरियों पर न गिरकर उनके किनारे गिरा, जिससे कटनी-चोपन रेल मार्ग पर एक बहुत बड़ा ट्रेन हादसा होते-होते टल गया। इस हादसे में ड्राइवर को हल्की-फुल्की चोटें आई हैं। तेज रफ्तार के कारण खोया संतुलन जानकारी के मुताबिक, गुरुवार दोपहर करीब 1:00 बजे एक ट्रक कटनी से उमरिया की तरफ जा रहा था। वहां मौजूद लोगों ने बताया कि ट्रक की रफ्तार बहुत तेज थी। जैसे ही ट्रक जगतपुर उमरिया गांव के पास रेलवे पुल पर पहुंचा, ड्राइवर का गाड़ी पर से काबू खो गया। इसके बाद बेकाबू ट्रक डिवाइडर से टकराया और उसे तोड़ते हुए सीधे पुल के नीचे गहरी खाई में गिर गया। गांव वालों ने बचाई ड्राइवर की जान पुल से ट्रक नीचे गिरने की जोरदार आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण और राहगीर तुरंत मौके की तरफ दौड़े। ट्रक ऊपर से गिरने के कारण पूरी तरह पिचक चुका था। गांव वालों ने बिना देर किए नीचे उतरकर राहत का काम शुरू किया और भारी मशक्कत के बाद ट्रक के केबिन में फंसे घायल ड्राइवर को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इतनी ऊंचाई से गिरने के बाद भी ड्राइवर की जान बच गई और उसे सिर्फ मामूली चोटें आईं, जिसके बाद उसे प्राथमिक इलाज दिया गया। टल गया बड़ा रेल हादसा इस पूरी घटना में सबसे राहत वाली बात यह रही कि ट्रक सीधे रेलवे ट्रैक के ऊपर नहीं गिरा। अगर ट्रक पटरियों पर गिरता और उसी दौरान वहां से कोई ट्रेन गुजरती, तो बड़ा नुकसान हो सकता था। रेलवे और स्थानीय पुलिस ने साफ किया है कि इस हादसे की वजह से ट्रेनों के आने-जाने पर कोई असर नहीं पड़ा है और रेल यातायात पूरी तरह सामान्य रूप से चल रहा है।



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लहसुन का अचार खाने के हैं शौकीन? घर पर इस ट्रिक से करें तैयार


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Lahsun Achar Recipe: लहसुन का अचार स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है. यह शरीर में आयरन के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है, जिससे हीमोग्लोबिन की कमी और एनीमिया का खतरा कम हो सकता है. लहसुन का अचार बनाने के लिए छिले हुए लहसुन की कलियों में नमक, हल्दी, लाल मिर्च, सौंफ, मेथी और सरसों का तेल मिलाया जाता है. इसके बाद इसे कुछ दिनों तक धूप में रखा जाता है, जिससे इसका स्वाद और बढ़ जाता है. नियमित मात्रा में इसका सेवन इम्युनिटी मजबूत करने में मदद करता है और फ्लू जैसी मौसमी बीमारियों से बचाव में सहायक हो सकता है.

लहसुन अपने भीतर कई औषधीय गुण समेटे हुए है. सदियों से इसका उपयोग आयुर्वेद और घरेलू उपचारों में किया जाता रहा है. लहसुन एंटी-बैक्टीरियल, एंटीबायोटिक और एंटी-वायरल गुणों से भरपूर होता है, जो शरीर को कई संक्रमणों और बीमारियों से बचाने में मदद कर सकता है. इसके नियमित सेवन से इम्युनिटी मजबूत होती है, हृदय स्वास्थ्य बेहतर रहता है और शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है. यही वजह है कि लहसुन को प्राकृतिक औषधि माना जाता है. ( एआई फोटो )

लहसुन का अचार दिल की सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं. नियमित मात्रा में लहसुन के अचार का सेवन रक्त संचार को बेहतर बनाने और धमनियों में ब्लॉकेज के खतरे को कम करने में सहायक माना जाता है. इसके अलावा, यह ब्लड क्लॉट बनने की संभावना को भी घटा सकता है. इसी वजह से लहसुन को हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी खाद्य पदार्थों में गिना जाता है. ( एआई फोटो )

लहसुन का अचार शरीर में आयरन के अवशोषण (एब्सॉर्प्शन) को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है. आयरन हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए जरूरी तत्व है, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. आयरन की कमी से एनीमिया जैसी समस्या हो सकती है, जिससे कमजोरी और थकान महसूस होती है. ऐसे में आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थों के साथ लहसुन का सेवन फायदेमंद माना जाता है. यह शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बनाए रखने और बेहतर स्वास्थ्य में सहायक हो सकता है. ( एआई फोटो )

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लहसुन का अचार एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है. इसमें मौजूद पोषक तत्व संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने में सहायक माने जाते हैं. नियमित रूप से थोड़ी मात्रा में लहसुन का अचार खाने से सामान्य सर्दी, जुकाम और फ्लू जैसी मौसमी बीमारियों का खतरा कम हो सकता है. यही कारण है कि इसे स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी लाभकारी माना जाता है. ( एआई फोटो )

लहसुन का अचार स्वास्थ्य के लिए कई तरह से लाभकारी माना जाता है. शोधों में पाया गया है कि लहसुन में मौजूद ऑर्गेनो-सल्फर यौगिक शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं. कुछ अध्ययनों में इनके कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने की संभावित भूमिका का भी उल्लेख किया गया है. हालांकि, लहसुन का अचार किसी बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन संतुलित आहार के हिस्से के रूप में इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है. ( एआई फोटो )

अगर आप झटपट और स्वादिष्ट लहसुन का अचार बनाना चाहते हैं, तो यह आसान रेसिपी ट्राई कर सकते हैं. इसके लिए 1 किलो कच्चा लहसुन, हल्दी, लाल मिर्च पाउडर, भुनी मेथी पाउडर, नमक, नींबू का रस और सरसों का तेल चाहिए. लहसुन को साफ कर मसालों और नींबू के रस के साथ मिलाएं, फिर गर्म करके ठंडा किया हुआ सरसों का तेल डाल दें. सिर्फ 10 मिनट में आपका स्वादिष्ट और चटपटा लहसुन का अचार तैयार हो जाएगा. ( एआई फोटो )

लहसुन का अचार बनाने के लिए सबसे पहले छिली हुई लहसुन की कलियों को भाप में हल्का पका लें. इन्हें एक बाउल में निकालकर मसाले और नींबू का रस मिलाएं. दूसरी ओर सरसों का तेल अच्छी तरह गर्म करें और उसमें राई तड़काएं. गैस बंद कर यह तेल लहसुन पर डालकर अच्छी तरह मिला लें. स्वादिष्ट अचार तैयार है. इसे एयरटाइट कांच के जार में भरकर फ्रिज में रखें, जहां यह लगभग 3 महीने तक सुरक्षित रह सकता है. ( एआई फोटो )

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रेलवे का बड़ा फैसला! देशभर के स्टेशनों पर होगी फायर सेफ्टी की चेकिंग


भारतीय रेलवे ने यात्रियों की सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए देशभर के रेलवे स्टेशनों पर फायर सेफ्टी ऑडिट कराने का फैसला किया है. रेलवे मंत्रालय के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य स्टेशनों पर आग से जुड़ी संभावित रिस्क की पहचान करना और समय रहते जरूरी सुधार सुनिश्चित करना है. हाल के सालों में रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ी है, ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक और प्रभावी बनाना रेलवे की प्राथमिकता बन गई है. इसी दिशा में यह विशेष ऑडिट अभियान शुरू किया जा रहा है, ताकि किसी भी आपात स्थिति से बेहतर तरीके से निपटा जा सके.

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि यह केवल एक ऑफिशियल जांच नहीं होगी, बल्कि स्टेशनों की सुरक्षा तैयारियों की गहराई से समीक्षा की जाएगी. जहां भी सुरक्षा स्टैंडर्ड में कमी पाई जाएगी, वहां तुरंत सुधार कनरे के लिए कदम उठाए जाएंगे. रेलवे का लक्ष्य है कि देश के सभी प्रमुख और व्यस्त रेलवे स्टेशन फायर सेफ्टी के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित और तैयार रहें.

ऑडिट में किन चीजों की होगी जांच?

फायर सेफ्टी ऑडिट के दौरान रेलवे स्टेशनों की कई अहम व्यवस्थाओं की डिटेल जांच की जाएगी. इसमें स्टेशन भवनों की संरचना, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, वायरिंग, एयर कंडीशनिंग (AC) और वेंटिलेशन सिस्टम की सुरक्षा का आकलन किया जाएगा. इसके अलावा फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर एक्सटिंग्विशर, पंपिंग सिस्टम और आग बुझाने के लिए मौजूद पानी की व्यवस्था की भी जांच होगी.

ऑडिट टीम यह भी देखेगी कि इमरजेंसी की स्थिति में यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बनाए गए इमरजेंसी एग्जिट सही स्थिति में हैं या नहीं. कई स्टेशनों पर भीड़भाड़ को देखते हुए एक्जिट गेट की प्रभावशीलता की चेंकिंग भी की जाएगी. जरूरत पड़ने पर राज्य फायर विभाग और विशेषज्ञ एजेंसियों की मदद ली जाएगी, ताकि सुरक्षा स्टैंडर्ड का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जा सके.

जहां कमी मिलेगी, वहां होगा तुरंत सुधार

रेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ऑडिट के दौरान सामने आने वाली किसी भी खामी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा. जिन स्टेशनों पर सुरक्षा संबंधी कमियां पाई जाएंगी, वहां प्राथमिकता के आधार पर सुधार कार्य शुरू किए जाएंगे. रेलवे का मानना है कि केवल समस्याओं की पहचान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समयबद्ध तरीके से दूर करना भी उतना ही जरूरी है.

इसके तहत पुराने डिवाइस को बदला जा सकता है, अतिरिक्त फायर फाइटिंग सिस्टम लगाए जा सकते हैं और कर्मचारियों को  परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है. रेलवे स्टेशनों पर नियमित सुरक्षा अभ्यास (मॉक ड्रिल) आयोजित करने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि किसी भी आपदा की स्थिति में तुरंत प्रोसेस को सुनिश्चित की जा सके.

यात्री करेंगे सुरक्षित सफर

देशभर में करोड़ों लोग हर दिन रेलवे सर्विसेस का उपयोग करते हैं. ऐसे में स्टेशनों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होना बेहद जरूरी है. फायर सेफ्टी ऑडिट के जरिए यात्रियों को डबल फायदा होगा. पहला है कि इससे संभावित रिस्क की पहले से पहचान हो सकेगी और दूसरा फायदा है कि दुर्घटनाओं की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकेगा.

रेलवे का मानना है कि यह पहल न केवल यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाएगी, बल्कि रेलवे परिसंपत्तियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी. बेहतर सुरक्षा व्यवस्था से यात्रियों का भरोसा मजबूत होगा और उन्हें अधिक सुरक्षित यात्रा अनुभव मिलेगा. रेलवे का यह कदम सुरक्षा मानकों को नई ऊंचाई पर ले जाने और भविष्य की चुनौतियों के लिए रेलवे नेटवर्क को बेहतर तरीके से तैयार करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है.



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अहमदाबाद प्लेन हादसे का एक साल: प्लेन में बैठने से डरते हैं मरने वालों के परिवार; कुछ अब भी काउसिंलिंग करवा रहे


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अहमदाबाद39 मिनट पहले

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अहमदाबाद में एयर इंडिया की फ्लाइट AI-171 दुर्घटना को एक साल पूरा हो गया है, लेकिन हादसे की भयावह यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं।

12 जून 2025 को लंदन जाने वाली AI-171 फ्लाइट मेघानीनगर में BJ मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल से टकराकर क्रैश हो गई, जिसमें विमान में सवार 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई। सिर्फ एक यात्री जिंदा बचा था।

भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, हादसे के एक साल बाद भी BJ मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर में उस त्रासदी के निशान पूरी तरह मिट नहीं पाए हैं। जहां विमान का मलबा गिरा था, लोगों के शव मिले थे, वहां आज भी खून के धब्बे दिखाई देते हैं।

इधर हादसे में मरने वालों के परिवार आज भी सदम में हैं। कुछ लोग अभी भी उड़ान भरने से डरते हैं, जबकि कुछ लोग इस गहरे सदमे से उबरने के लिए काउंसलिंग ले रहे हैं।

हादसे के एक साल बाद कॉलेज के हॉस्टल की 4 तस्वीरें…

जिस हॉस्टल पर प्लेन का हिस्सा गिरा था, वहां कई कमरे बंद पड़े हैं। कई हिस्सों में मरम्मत का काम हुआ है, लेकिन हादसे के निशान अब भी मौजूद हैं।

जिस हॉस्टल पर प्लेन का हिस्सा गिरा था, वहां कई कमरे बंद पड़े हैं। कई हिस्सों में मरम्मत का काम हुआ है, लेकिन हादसे के निशान अब भी मौजूद हैं।

हादसे के दौरान हुए विस्फोट और आग ने इमारत को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया था।

हादसे के दौरान हुए विस्फोट और आग ने इमारत को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया था।

प्लेन हादसे का एक साल पूरा होने पर रेस्क्यू से जुड़े लोगों ने अपने अनुभव शेयर किए हैं। पढ़िए किसने क्या बताया…

1. गुजरात DGP ज्ञानेंद्र सिंह मलिक- करियर का सबसे दर्दनाक अध्याय

ज्ञानेंद्र बताते हैं कि यह उनके करियर का सबसे दर्दनाक अध्याय है। उनके जेहर में मलबे से निकाली गई जली हुई लाशों की डरावनी तस्वीरें अभी भी बसी हुई हैं। मलिक ने बताया कि उन्होंने 30 मिनट के भीतर 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को हादसे वाली जगह पर तैनात किया था।

मलिक उस समय अहमदाबाद के कमिश्नर थे। वे हादसे के 15-20 मिनट के अंदर घटनास्थल पर पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि जमीन पर जले हुए शवों को देखना बहुत दर्दनाक था।

DNA मैचिंग के बाद सौंपे गए शवों में से पहला शव दुर्घटना के 50 घंटे से भी कम समय में, 14 जून को दोपहर 3:19 बजे सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद सौंपा गया।

2. फोरेंसिक साइंटिस्ट एचपी संघवी- कटे हुए हाथ को भुला नहीं पा रहा

गुजरात डायरेक्टरेट ऑफ फोरेंसिक साइंसेज के डायरेक्टर संघवी और उनकी 38 सदस्यों की टीम की जिम्मेदारी थी कि वे मारे गए लोगों की पहचान करने के लिए बायोलॉजिकल सैंपल की बारीकी से जांच करें और राख से निकाले गए टूटे-फूटे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जांच करके उनसे जो भी जानकारी मिल सके, उसे हासिल करें।

संघवी के लिए, कटे हुए हाथ की वह तस्वीर ऐसी है जिसे वे भुला नहीं पा रहे हैं। संघवी ने बताया कि ऐसा लग रहा था जैसे वह मदद की गुहार लगा रही हो। एक साल बाद भी, हम उसके आखिरी पलों के खौफ की सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। पहला सैंपल आधी रात के बाद आया और हमारी टीमों ने पहले 100 घंटों में ही 100 DNA प्रोफाइल तैयार कर लिए।

प्लेन हादसे के पीड़ितों के 3 किस्से

  • बेटा खोया, प्लेन की आवाज से भी डरते हैं रफीक: दीव के रहने वाले रफीक अरब ने पिछले साल 12 जून को अपने 25 साल के बेटे फैजान को खोने के बाद से कभी हवाई यात्रा नहीं की है। वे अब भी गहरे डर के साथ जी रहे हैं। रफीक बताते हैं- ऊपर से गुजरते विमान की आवाज भी हमें बेचैन कर देती है।
  • माता-पिता की मौत के बाद नौकरी छोड़ी, मुक्ति ने महीनों काउसिंलिंग करवाई: सूरत की रहने वाली मुक्ति वंसदिया के माता-पिता दिव्या और अर्जुनसिंह हादसे में मारे गए थे। हादसे के बाद मुक्ति डिप्रेशन से जूझने लगीं। उन्होंने ट्रैवल एजेंसी की अपनी नौकरी छोड़ दी और महीनों तक काउंसलिंग लीं।
  • माली का काम छूटा, पत्नी छोड़ गई, हादसे के चश्मदीद थे अजय परमार: घर से लौटते समय हादसे की चपेट में आए अजय का 2 महीने इलाज चला था। डॉक्टरों ने सीधी धूप में काम करने से मना किया। रंग-रूप बदलने और काम छूटने के कारण शादी के एक महीने बाद ही उनकी पत्नी भी छोड़कर चली गई।



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Tecno ने लॉन्च किया 8000mAh बैटरी वाला धांसू गेमिंग फोन, जानें कीमत


Tecno ने भारत में 8000mAh बैटरी वाला एक और गेमिंग फोन लॉन्च कर दिया है। टेक्नो का यह गेमिंग फोन एक्टिव मैट्रिक्स डिस्प्ले के साथ आता है, जैसा नथिंग के फोन में देखने को मिलता है। यह फोन पिछले साल लॉन्च हुए Pova 7 का अपग्रेड है। भारत में कंपनी ने इस फोन को तीन कलर ऑप्शन 16 बिट व्हाइट, प्लाज्मा ऑरेंज और टर्मिनल ग्रीन कलर ऑप्शन में पेश किया है। इस फोन को ई-कॉमर्स वेबसाइट फ्लिपकार्ट से खरीदा जा सकता है।

Tenco Pova 8 की कीमत

टेक्नो की पोवा सीरीज खास तौर पर गेमिंग यूजर्स के लिए लॉन्च की जाती है। इस सीरीज के लेटेस्ट फोन Pova 8 5G को भारत में दो स्टोरेज वेरिएंट्स- 6GB RAM + 128GB और 8GB RAM + 128GB में पेश किया गया है। यह फोन 29,999 रुपये की शुरुआती कीमत में आता है। वहीं, इसके टॉप वेरिएंट की कीमत 31,999 रुपये है।

  • 6GB RAM + 128GB – 29,999 रुपये
  • 8GB RAM + 128GB – 31,999 रुपये

Tecno Pova 8 के फीचर्स

टेक्नो का यह फोन 6.76 इंच के FHD+ डिस्प्ले के साथ आता है। फोन का डिस्प्ले 144Hz रिफ्रेश रेट को सपोर्ट करता है। साथ ही, इसकी पीक ब्राइटनेस 950 निट्स तक की है। यह फोन MediaTek Dimensity 7100 चिपसेट पर काम करता है। इसके साथ 8GB रैम और 128GB तक स्टोरेज का सपोर्ट मिलता है। टेक्नो ने अपने इस फोन में डेडिकेटेड G1 और SE1 सिग्नल चिपसेट दिया है।










Tecno Pova 8 5G फीचर्स
डिस्प्ले 6.76 इंच, 144Hz
प्रोसेसर MediaTek Dimensity 7100
स्टोरेज 8GB, 128GB
बैटरी 8000mAh, 45W
कैमरा 50MP, 13MP
OS Android 16

इस स्मार्टफोन के बैक में डुअल कैमरा सेटअप दिया गया है। इसमें 50MP का Sony LYT 600 प्राइमरी कैमरा मिलता है। इसके साथ एक लाइट सेंसर दिया गया है। सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए इसमें 13MP का कैमरा दिया गया है। यह फोन AI कैमरा के साथ आता है। 

इस फोन में 8000mAh की दमदार बैटरी दी गई है। इसके साथ 45W फास्ट चार्जिंग फीचर दिया गया है। यह Android 16 ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करता है। साथ ही, इसमें ड्यूरेबिलिटी के लिए MIL-STD-810H मिलिट्री ग्रेड सर्टिफिकेशन मिलता है। यह IP64 डस्ट और वाटरप्रूफ रेटिंग को सपोर्ट करता है।

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खूंटा उखड़ने से पहले एक्शन मोड में राहुल-अखिलेश, UP में नहीं दोहराएंगे यह भूल!


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UP Assembly Elections 2027 : यूपी चुनाव से पहले राहुल गांधी और अखिलेश यादव अपनी-अपनी रस्सी और खूंटा मजबूत करने में लग गए हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने ‘मिशन 2027’ के लिए हाथ मिला लिया है. इस बार न तो चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन का इंतजार किया जाएगा और न ही बिहार की तरह फ्रेंडली फाइट के नाम पर वोट कटेंगे. अखिलेश यादव ने समय से पहले 200 जिताऊ चेहरे छांट लिए हैं. जानिए इस बार यूपी के ‘दो लड़के’ बीजेपी के ‘चाणक्य’ और ‘बुलडोजर बाबा’ के गर्जना का सामना कैसे करेंगे.

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राहुल-अखिलेश इस बार यूपी में कौन सी गलती नहीं दोहराएंगे?

लखनऊ. बंगाल चुनाव में कांग्रेस को लगे झटके के बाद राहुल गांधी ने यूपी चुनाव 2027 में इज्जत बचाने के लिए अपने आपको अखिलेश यादव के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. अब पूरी तरह से साफ हो गया है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस यूपी विधानसभा का चुनाव मिलकर ही लड़ेगी. ऐसे में राहुल गांधी और अखिलेश यादव बिहार वाली वह गलती नहीं दोहराना चाहते हैं, जिससे आरजेडी और कांग्रेस की दुर्गति हुई थी. सपा ने इस बार यूपी में चुनाव लड़ने का फॉर्मूला बदल दिया है. सपा इस बार चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन का इंतजार नहीं करेगी. नोटिफिकेशन से पहले ही दोनों पार्टियां अपने कैंडिडेट का ऐलान कर देगी, जिससे क्षेत्र में जनता के बीच काम करने का मौका मिल जाए. दोनों के बीच टिकट बंटवारे का फार्मूला भी तय हो गया है. सपा ने सर्वे के आधार पर करीब 200 सीटों पर प्रत्याशियों का नाम भी तय कर लिया है. कहा जा रहा है कि सबसे पहले नामों का ऐलान भी सपा ही कर देगी.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय जो खिचड़ी पक रही है, उसकी खुशबू दिल्ली तक आने लगी है. लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग से लेकर दिल्ली के लुटियंस जोन तक एक बात बिल्कुल साफ हो चुकी है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पूरी ताकत से मिलकर लड़ने जा रहे हैं. लेकिन इस बार का यह गठबंधन साल 2017 की तरह सिर्फ ‘यूपी के लड़कों’ का पोस्टर लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बार अखिलेश यादव ने अपनी पूरी रणनीति ही बदल दी है. ग्राउंड जीरो पर काम कर रहे सपा और कांग्रेस के नेताओं से जब न्यूज-18 हिंदी ने बात की, तो एक बहुत दिलचस्प बात सामने आई. समाजवादी पार्टी इस बार ‘बैकसीट’ पर बैठकर चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन का इंतजार करने के मूड में कतई नहीं है.

यूपी में कांग्रेस और एसपी की तैयारी शुरू.

राहुल-अखिलेश कर रहे हैं खूंटा मजबूत

अमूमन देखा जाता है कि जब तक चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान नहीं करता, तब तक पार्टियों में टिकट को लेकर सिर-फुटौव्वल चलती रहती है. ऐन वक्त पर टिकट बंटने से उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में जाने और जनता के बीच पैठ बनाने का समय ही नहीं मिल पाता. लेकिन सपा सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव ने अंदरूनी सर्वे और लोकल फीडबैक के आधार पर करीब 200 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम लगभग तय कर लिए हैं. अब इस नई रणनीति के तहत, दोनों पार्टियां औपचारिक अधिसूचना जारी होने से काफी पहले ही अपने-अपने उम्मीदवारों की लिस्ट धीरे-धीरे जारी करना शुरू कर देंगी. इससे कैंडिडेट को जमीन पर जाकर कार्यकर्ताओं को एक्टिव करने और वोटरों के बीच सत्ता विरोधी लहर का माहौल बनाने के लिए पूरा 4-5 महीने का वक्त मिल जाएगा.

बिहार वाली गलती यूपी में नहीं दोहराई जाएगी

यूपी के इस गठबंधन में इस बार सबसे बड़ा फोकस इस बात पर है कि किसी भी कीमत पर बिहार वाली गलती नहीं दोहरानी है. पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच कई सीटों पर पेंच फंसा रह गया था, जिसका नतीजा यह हुआ कि कई महत्वपूर्ण सीटों पर दोनों दलों के बीच फ्रेंडली फाइट देखने को मिला, जिसमें एनडीए ने बाजी मार ली.

नोटिफिकेशन से पहले ही एक्शन में सपा-कांग्रेस

यूपी की राजनीति को करीब से जानने वाले संजीव पांडेय कहते हैं, ‘राजनीति में फ्रेंडली फाइट जैसा कोई शब्द नहीं होता. जब दो सहयोगी दल एक ही सीट पर आमने-सामने लड़ते हैं, तो उनका कैडर आपस में ही भिड़ जाता है. इसका सीधा फायदा तीसरी पार्टी उठा ले जाती है. लेकिन अखिलेश यादव ने बिहार वाली भूल को शायद इस बार यूपी में न दोहराएं. लेकिन जब एक टेबल पर सीटों के बंटवारे का खाका तैयार किया जाता है, तो स्थिति बदल जाती है. कैडर वोट और कार्यकर्ताओं के प्रेशर के सामने बड़े नेताओं को झुकना पड़ता है, जिसका नतीजा बिहार में लोग देख चुके हैं. इसलिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने काफी सोच समझकर यह पैसला लिया है. ‘

यूपी चुनाव 2027 में अखिलेश यादव कांग्रेस नेता के किस बयान को रखेंगे याद?

इस नई जुगलबंदी से सपा-कांग्रेस को कितना फायदा?

वोटों का बिखराव रुकेगा:मुस्लिम और दलित-पिछड़ा (PDA) वर्ग का वोटर जो अक्सर इस असमंजस में रहता था कि सपा को दें या कांग्रेस को, उसके सामने अब तस्वीर बिल्कुल साफ होगी.

बीजेपी के ‘सरप्राइज एलिमेंट’ की काट: बीजेपी हमेशा आखिरी वक्त पर चौंकाने वाले फैसले लेती है. अगर सपा-कांग्रेस के उम्मीदवार पहले से मैदान में डटे होंगे, तो उन्हें घेरना सत्ता पक्ष के लिए आसान नहीं होगा.

भीतरघात की गुंजाइश खत्म: समय रहते टिकट तय होने से जो बागी या असंतुष्ट नेता होंगे, उन्हें मनाने या शांत करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा, जिससे ऐन चुनाव के दिन भीतरघात का खतरा न्यूनतम हो जाएगा.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव का अब एक ही नारा है-“सवाल सीटों का नहीं, सवाल जीत का है.” यही वजह है कि कांग्रेस भी इस बार ज्यादा नखरे दिखाने के मूड में नहीं है और व्यावहारिक होकर सीटों की मांग कर रही है. ग्राउंड की हकीकत यही कहती है कि अगर यह फॉर्मूला जमीन पर शत-प्रतिशत उतर गया, तो यूपी की चुनावी लड़ाई बेहद दिलचस्प और कांटे की होने वाली है.



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होर्मुज में 90 दिन फंसे रहे रायपुर के रुद्रांश: जहाज के ऊपर से गुजरती थीं मिसाइलें-ड्रोन, सायरन बजते ही इंजन रूम में छिपते थे – Raipur News




जैसे ही हमले का सायरन बजता, जहाज के सभी 22 कर्मचारी भागकर नीचे इंजन रूम में छिप जाते थे। आसमान में मिसाइलें, ड्रोन और फाइटर जेट चक्कर काट रहे होते थे और अंदर सब अपनी जान बचाने के लिए भगवान से प्रार्थना करते थे। रायपुर के रहने वाले रुद्रांश चौबे इस कार्गो शिप में असिस्टेंट कैप्टन और चीफ ऑफिसर हैं। उन्होंने मौत के इसी खौफ के बीच ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में 3 महीने बिताए, ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग के दौरान उनका जहाज ठीक उसी इलाके में फंस गया जहां लड़ाई चल रही थी। कई बार मिसाइलें जहाज के बिल्कुल ऊपर से गुजरीं, एक ड्रोन का टूटा हुआ मलबा भी उनके जहाज पर आकर गिरा। 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के बाद कंपनी ने एक स्पेशल बोट (नाव) भेजकर रुद्रांश और उनके साथियों को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला। पढ़िए पूरा इंटरव्यू:- सवाल: उस समय वहां की स्थिति कैसी थी और आप कैसे फंस गए? जवाब: हम अपना कार्गो डिस्चार्ज करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट में गए थे। इसके बाद हमें अगला कार्गो लेना था, तभी पता चला कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है और होर्मुज में आना-जाना बंद कर दिया गया है। इसके बाद करीब 3 महीने तक हम उसी क्षेत्र में रहे। इस दौरान हमने कार्गो लोड और डिस्चार्ज भी किया और भारत लाने के लिए एक और कार्गो लोड किया। लंबे समय तक जहाज एंकर पर खड़ा रहा और हम वहीं फंसे रहे। सवाल: समुद्र के बीच 24 घंटे रहना पड़ता था, उस दौरान स्थिति कैसी थी? जवाब: समुद्र में रहने के दौरान हर समय सतर्क रहना पड़ता था। युद्ध शुरू होने के शुरुआती दिनों में ड्रोन, मिसाइल और लड़ाकू विमानों की गतिविधियां दिखाई देती थीं। रेडियो पर लगातार अलग-अलग तरह के अलर्ट और सूचनाएं मिल रही थीं। जीपीएस स्पूफिंग (जीपीएस सिग्नल हैकिंग) जैसी घटनाएं भी हो रही थीं। शुरुआत में स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि हमें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना है और कहां जाना है। बाद में डीजी शिपिंग, इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन और हमारी कंपनी की ओर से जारी सुरक्षा दिशा निर्देशों का पालन कर हमने स्थिति का सामना किया। सवाल: पहली ही नौकरी और घर से दूर सीधे युद्ध के मैदान में एंट्री, मौत के इस साए के बीच खुद को और घर वालों की चिंता को कैसे संभाला? जवाब: मेरी कोशिश रहती थी कि हर दिन घरवालों को अपनी स्थिति की जानकारी दूं। समाचारों में वे लगातार हमले और तनाव की खबरें देखते थे, इसलिए उन्हें यह बताना जरूरी था कि मैं सुरक्षित हूं। सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए हम संपर्क में रहते थे। हालांकि कई बार जीपीएस स्पूफिंग और तकनीकी समस्याओं के कारण चार-पांच दिन तक बात नहीं हो पाती थी, लेकिन हम किसी तरह एक छोटा मैसेज भेजकर अपने सुरक्षित होने की जानकारी दे देते थे। सवाल: क्या कभी ऐसा हुआ कि ड्रोन या मिसाइल का खतरा आपके जहाज के बेहद करीब पहुंच गया हो? जवाब: जी हां, एक बार जब हमारा जहाज बहरीन के आसपास था, तब हमारे जहाज के ऊपर एक ड्रोन विस्फोट हुआ था। उसके कुछ अवशेष जहाज पर आकर गिरे थे। इस घटना के बाद सभी लोगों को महसूस हुआ कि स्थिति वास्तव में गंभीर है। इसके अलावा मिसाइलें, ड्रोन और लड़ाकू विमान लगातार हमारे ऊपर से गुजरते दिखाई देते थे। शुरुआत में इससे काफी डर लगा, लेकिन बाद में हमने सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन किया और खुद को संभाला। सवाल: उस समय सबसे ज्यादा डर किस बात का लगता था? जवाब: डर यही था कि कहीं कोई मिसाइल या ड्रोन गलती से हमारे जहाज को निशाना न बना ले। रात में जब अलर्ट आते थे या ऊपर से लड़ाकू विमान गुजरते थे, तब मन में कई तरह के विचार आते थे। ऐसे समय में हम ईश्वर को याद करते थे और सुरक्षित रहने की प्रार्थना करते थे। सवाल: समुद्र में उतरते वक्त बड़े-बड़े सपने रहे होंगे और वहां जाकर मिसाइलें देखनी पड़ीं, पहली नौकरी का यह अनुभव कैसा रहा? जवाब: कॉलेज और एनसीसी के दौरान हमने कई आपात परिस्थितियों के बारे में पढ़ा और प्रशिक्षण लिया था कि संकट के समय कैसे काम करना चाहिए। लेकिन यह पहली बार था जब हमने ऐसी स्थिति को करीब से देखा। शुरुआत में काफी घबराहट थी और समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। बाद में सुरक्षा नियमों का पालन किया, आपात स्थिति में वहां से सुरक्षित निकलने की तैयारियां समझीं और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाकर हालातों का सामना किया। सवाल: उस समय जहाज पर कितने लोग थे और आप लोग एक-दूसरे का मनोबल कैसे बढ़ाते थे? जवाब: हमारे जहाज पर कुल 22 क्रू मेंबर थे। उनमें सबसे कम अनुभव मेरा ही था, क्योंकि यह मेरी पहली समुद्री यात्रा और पहली नौकरी थी। हमने एक सरल तरीका अपनाया था कि युद्ध और तनाव के बारे में ज्यादा सोचने के बजाय अपने काम पर फोकस किया। सवाल: क्या जहाज पर खाने-पीने या दूसरी जरूरतों की कोई समस्या हुई? जवाब: नहीं, जहाज में पर्याप्त राशन और जरूरी सामान मौजूद था। असली चुनौती मानसिक दबाव था। हर दिन इसी तनाव के बीच गुजर रहा था कि पता नहीं अगले पल क्या होगा और हालात कब सामान्य होंगे। सवाल: फिर आप वहां से बाहर कैसे निकले? जवाब: मेरा 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो चुका था। इसी दौरान कंपनी ने हमारे लिए खास व्यवस्था की। एक सर्विस बोट के जरिए हमें बंदरगाह तक पहुंचाया गया। मैं और मेरे साथ नौ अन्य क्रू मेंबर जहाज से उतरे। इसके बाद हम दुबई पहुंचे और वहां से हवाई मार्ग से अपने-अपने घरों के लिए रवाना हुए। सवाल: अब होर्मुज फिर से बंद हो गया है, जब आप वहां फंसे थे तो आपका कैसा एक्सपीरियंस रहा था? जवाब: वह एक ऐसा एक्सपीरियंस था जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता। उस भयानक संकट के बीच हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी पूरी टीम को सुरक्षित रखने की थी। जहाज पर खौफ का माहौल न बने, इसलिए हम लगातार एक-दूसरे से बात करते, सबका हौसला बढ़ाते और जैसे-तैसे घर पर भी संपर्क बनाए रखते थे। इसी मजबूत टीम वर्क के दम पर हम वहां से सही-सलामत निकल पाए। सवाल: घर पहुंचने पर परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी? जवाब: घर लौटने पर परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था। वे पल-पल मेरी सुरक्षा को लेकर डरे हुए थे, क्योंकि उस इलाके की खबरें लगातार मीडिया में आ रही थीं। मुझे सही-सलामत देखकर सबने राहत की सांस ली। माता-पिता को गर्व था कि उनका बेटा इतने बड़े संकट का बहादुरी से सामना करके लौटा है। इस मुश्किल दौर में परिवार का सपोर्ट और उनकी दुआएं ही मेरी सबसे बड़ी ताकत थीं।
……………………….. ईरान-अमेरिका वॉर से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… दुबई में फंसे बिलासपुर के 3 दोस्त लौटे:9 दिन बाद वापसी, तड़के 3 बजे दिल्ली पहुंची फ्लाइट, भारत सरकार से मांगी थी मदद दुबई में पिछले 9 दिन से फंसे बिलासपुर के 3 दोस्त सुरक्षित लौट आए हैं। उनकी फ्लाइट दुबई से तड़के 3 बजे दिल्ली पहुंची है। यहां से वे रायपुर आएंगे। तीनों दोस्त घूमने के लिए दुबई गए थे, लेकिन सुरक्षा को लेकर स्थिति साफ नहीं होने के कारण उनकी वापसी में देरी हो रही थी। पढ़ें पूरी खबर…



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DDU के 7 स्टूडेंट्स बने ‘इको नेटवर्क’ के जूनियर एम्बेसडर: बेंगलुरु में लेंगे ट्रेनिंग, मेधा संस्था और यूनिवर्सिटी के सहयोग से मिला मौका – Gorakhpur News




दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी के सात स्टूडेंट्स का सिलेक्शन ‘इको नेटवर्क’ के प्रोग्राम SAGE 2026 (सस्टेनेबिलिटी एम्बेसडर्स ग्लोबल एक्सचेंज) में जूनियर एम्बेसडर के रूप में हुआ है। चुने गए सभी स्टूडेंट्स बुधवार को बेंगलुरु के लिए रवाना हो गए हैं, जहां वे पूरी तरह से फंडेड ट्रेनिंग और वर्कशॉप में हिस्सा लेंगे। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद वे समाज के बीच जाकर अपने प्रोजेक्ट्स पर काम करेंगे। स्टूडेंट्स को यह बड़ा मौका सामाजिक संस्था ‘मेधा’ और यूनिवर्सिटी के एम्प्लॉयमेंट ब्यूरो, गाइडेंस एंड प्लेसमेंट सेल के सहयोग से मिला है। इस प्रोग्राम के लिए पूरे उत्तर प्रदेश से सिर्फ 15 स्टूडेंट्स चुने गए हैं। इनमें लखनऊ से छह, आगरा से दो और सबसे ज्यादा गोरखपुर के डीडीयू से सात स्टूडेंट्स शामिल हैं। इन स्टूडेंट्स का हुआ सिलेक्शन
यूनिवर्सिटी के इन 7 स्टूडेंट्स का सिलेक्शन कड़े कॉम्पिटिशन, आइडिया टेस्ट और पर्सनल इंटरव्यू के बाद किया गया है। जिनमें अंशिका त्रिपाठी (बीए ऑनर्स, थर्ड ईयर), अविनाश यादव (एमए, सेकेंड ईयर- इंग्लिश), मोहम्मद यूसुफ (बीएससी ऑनर्स, थर्ड ईयर- एग्रीकल्चर), मोहम्मद सादिक (बीकॉम, थर्ड ईयर), निर्मलेंदु (बीएससी एग्रीकल्चर, फोर्थ ईयर), प्रिया यादव (एमए, सेकेंड ईयर- ज्योग्राफी), सृष्टि जायसवाल (एमए, फर्स्ट ईयर- सोशियोलॉजी) शामिल हैं। क्या है इको नेटवर्क और SAGE प्रोग्राम?
इको नेटवर्क एक ग्लोबल प्लेटफॉर्म है, जो साइंस, समाज, सरकारी नीति बनाने वालों, कंपनियों और लोकल लोगों को एक साथ जोड़कर पर्यावरण और समाज से जुड़ी समस्याओं जैसे क्लाइमेट चेंज, खेती-बाड़ी, हेल्थ, पानी की देखरेख और साफ-सुथरे शहरों पर काम करता है। तीन हिस्सों में आयोजित होगा
SAGE इसी नेटवर्क का एक मुख्य प्रोग्राम है जो युवाओं को लीडरशिप सिखाता है। यह प्रोग्राम तीन हिस्सों में होगा। पहला हिस्सा- बुधवार से शुरू हो रहा है, जिसमें भारत और विदेशों के एक्सपर्ट्स स्टूडेंट्स को गहरी ट्रेनिंग देंगे। दूसरे हिस्से में स्टूडेंट्स अपने आइडियाज को जमीन पर उतारने के लिए कम्युनिटी बीच प्रोजेक्ट्स पर काम करेंगे।जबकि तीसरे हिस्से में प्रोजेक्ट के असर की जांच होगी, रिपोर्ट लिखी जाएगी और उसका प्रजेंटेशन दिया जाएगा। स्टूडेंट्स के अंदर लीडरशिप क्वालिटी डेवेलोप होगी
इस प्रोग्राम से स्टूडेंट्स के अंदर लीडरशिप क्वालिटी आएगी। उन्हें काम का असली एक्सपीरिएंस मिलेगा। बड़े एक्सपर्ट्स का मार्गदर्शन मिलेगा और देश-विदेश के लोगों से नेटवर्क बनाने का मौका मिलेगा। साथ ही उनकी बातचीत करने की कला (कम्युनिकेशन स्किल) और पर्सनालिटी भी निखरेगी। यह कामयाबी बच्चों के टैलेंट को दिखाती- वीसी
यूनिवर्सिटी की वीसी प्रो. पूनम टंडन ने स्टूडेंट्स को बधाई देते हुए कहा कि यह कामयाबी हमारे बच्चों के टैलेंट को दिखाती है। जागरूक और जिम्मेदार युवा ही भविष्य में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। वहीं, प्लेसमेंट सेल के डायरेक्टर प्रो. अजय कुमार शुक्ल ने भी स्टूडेंट्स को शुभकामनाएं दी और कहा कि ऐसे मौकों से स्टूडेंट्स का नजरिया बदलता है और वे अपने करियर में बहुत आगे जाते हैं।



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सुप्रीम कोर्ट बोला- महिलाओं को होममेकर नहीं नेशन बिल्डर कहें: वे परिवार की नींव मजबूत करती हैं; उनके काम की कीमत हर महीने ₹30000 जितनी


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नई दिल्ली5 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा परिवार में एक महिला के योगदान के कारण उनके लिए होममेकर (घर संभालने वाली) के बजाय राष्ट्र निर्माता (नेशन बिल्डर) शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक दुर्घटना में पत्नी की मौत के बाद उसके पति को अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर संभालना भर नहीं है। वह परिवार की नींव को मजबूत बनाती है, अगली पीढ़ी तैयार करती हैं। समाज के विकास में अप्रत्यक्ष लेकिन बेहद महत्वपूर्ण योगदान देती है।

कोर्ट ने एक गृहिणी के घर के काम की वैल्यू निकाली जाए तो उसकी अनुमानित आय 30 हजार रुपए प्रतिमाह बनती है। इसलिए मुआवजा तय करते समय उनके योगदान को केवल सांकेतिक या कम करके नहीं आंका जा सकता।

इस टिप्पणी और फैसले के मायने क्या…

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यदि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी घायल हो जाती है या उसकी मौत हो जाती है, तो परिवार को केवल उसकी आय न होने के आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता।

यानी सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम (एमवी एक्ट) के तहत दावों में पत्नी की घरेलू देखभाल के नुकसान को मुआवजे के एक अलग मद के रूप में मान्यता दे दी।

बेंच ने मुआवजा तय करने के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए। अदालत ने कहा कि गृहिणियों की आय का आकलन करते समय उनकी उम्र, एजुकेशन, स्किल, पारवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक हालात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 2024 में दिए गए एक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाया। यह मामला 2001 में दो जीपों के बीच हुई सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी। हाईकोर्ट ने पीड़ित के परिवार, जिसमें उसके पति और तीन बच्चे शामिल थे, को 8 लाख रुपए से ज्यादा का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

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