स्कूल में मेरे घुंघराले बाल और दांतों की बनावट का मजाक उड़ाया जाता था। कॉलेज में मेरे सपनों का मजाक बनाया गया। इसके बाद भी फैशन की ग्लैमरस दुनिया में आने से पीछे नहीं रही। पहली बार पांच इंच की हाई हील्स पहनकर रैंप वॉक करना बिल्कुल अनुभव था। मेडिकल की कठिन राह पार की, किसी ने सामाजिक बंदिशें तोड़ीं, किसी मॉडल ने विनर बनने के लिए सालों का इंतजार किया। मिस राजस्थान 2026 की टॉप-6 फाइनलिस्ट ने अपनी इस जर्नी के ऐसे ही कुछ एक्सपीरियंस को भास्कर के साथ शेयर किया। करीब 6500 प्रतिभागियों में से चयनित टॉप-28 फाइनलिस्ट ने एक महीने तक कड़ी ग्रूमिंग और ट्रेनिंग ली, जिसके बाद इन टॉप-6 विजेताओं ने अपनी जगह बनाई। इन विजेताओं ने अपने संघर्ष, परिवार के सहयोग, सामाजिक चुनौतियों और भविष्य के सपनों को साझा किया। पढ़िए- किसने क्या कहा- MBBS के साथ मॉडलिंग की, मां ने दी प्रेरणा मिस राजस्थान-2026 की 6th रनरअप लक्षिता गोदारा ने बताया कि उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा उनकी मां हैं। बचपन से मां ने आगे बढ़ने और समाज की अन्य लड़कियों के लिए प्रेरणा बनने की सीख देती रही हैं। इसी प्रेरणा से उन्होंने मेडिकल क्षेत्र चुना और NEET परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्तमान में वे SMS मेडिकल कॉलेज, जयपुर से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं। लक्षिता ने कहा कि मेडिकल और मॉडलिंग दोनों पूरी तरह अलग क्षेत्र हैं, लेकिन दोनों में एक चीज समान है, कड़ी मेहनत। मेडिकल की तैयारी के दौरान उन्होंने दिन-रात पढ़ाई की और अपने माता-पिता के विश्वास को कभी टूटने नहीं दिया। अब मिस राजस्थान के मंच के जरिए वे समाज की उन लड़कियों तक पहुंचना चाहती हैं, जिन्हें प्रेरणा और सही मार्गदर्शन की जरूरत है। क्रिमिनोलॉजी से फैशन की दुनिया तक, समाज ने दिया साथ सुहानी जैन थर्ड रनरअप रही। सुहानी ने बताया कि क्रिमिनोलॉजी की पढ़ाई के बाद हॉस्पिटैलिटी बिजनेस से जुड़ीं। अब पहली बार किसी ब्यूटी पेजेंट का हिस्सा बनीं। सुहानी ने बताया कि पहले लगता था कि दो अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने के बाद लोग शायद समर्थन नहीं करेंगे, लेकिन इसके उलट उन्हें परिवार और समाज से भरपूर प्यार मिला। सुहानी ने कहा कि वे जैन समाज से आती हैं और लोगों में यह धारणा रहती है कि यह समाज काफी सीमित सोच रखता है, लेकिन उन्हें अपने पूरे समाज का भरपूर सहयोग मिला। कई ऐसे लोगों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं, जिनसे उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी। उन्होंने मिस राजस्थान की ग्रूमिंग टीम की भी जमकर सराहना की। उनका कहना था कि योगेश मिश्रा और निमिषा मैम ने केवल रैंप वॉक ही नहीं, बल्कि स्किन केयर, स्माइल, कम्युनिकेशन और व्यक्तित्व विकास तक हर छोटी-बड़ी बात सिखाई। एक महीने के दौरान आयोजक उनके लिए परिवार जैसे बन गए। शारीरिक बनावट को लेकर असुरक्षा थी सेकेंड रनरअप शगुन राठौड़ ने कहा कि मिस राजस्थान उनके बचपन का सपना था, लेकिन अपनी शारीरिक बनावट को लेकर उनमें कई असुरक्षाएं थीं। उन्होंने बताया कि वे नागौर जिले के एक छोटे से गांव से आती हैं, जहां आज भी लड़कियों को खुलकर आगे बढ़ने की पूरी आजादी नहीं मिलती। जब उन्होंने कंटेंट क्रिएटर के रूप में सोशल मीडिया पर काम शुरू किया तो लोगों ने सवाल उठाए कि गांव की लड़की इंस्टाग्राम पर क्यों सक्रिय है। शुरुआत में उनके पिता भी इस फैसले के पक्ष में नहीं थे। धीरे-धीरे उनकी सफलता और बढ़ते फॉलोअर्स ने पूरे परिवार की सोच बदल दी। आज उनके पिता ही उन्हें सबसे ज्यादा प्रोत्साहित करते हैं। शगुन ने बताया कि अब उनके गांव और आस-पास की कई लड़कियां उन्हें मैसेज करती हैं और मॉडलिंग, कंटेंट क्रिएशन और सोशल मीडिया के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सलाह मांगती हैं। उनके अनुसार यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वे अन्य लड़कियों के लिए प्रेरणा बन सकी हैं। पहली बार पांच इंच की हाई हील्स पहनी थी फिफ्थ रनरअप कुसुम सोनी ने बताया कि वे सालासर बालाजी के पास स्थित चाड़वास गांव से हैं। हालांकि उनका बचपन नेपाल के काठमांडू में बीता क्योंकि उनके पिता का व्यवसाय वहां था। कोविड के बाद उनका परिवार राजस्थान लौटा और उन्होंने सुजानगढ़ से अपनी पढ़ाई पूरी की। बाद में वे जयपुर आईं और यहीं से मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने बताया कि उनके परिवार का इस इंडस्ट्री से कोई संबंध नहीं था, इसलिए उन्हें किसी तरह का मार्गदर्शन नहीं मिला। उन्होंने अपनी बहन के साथ मिस राजस्थान का ऑडिशन दिया और यहीं से उनकी नई यात्रा शुरू हुई। कुसुम ने बताया कि उन्होंने जीवन में पहली बार पांच इंच की हाई हील्स पहनी थीं और रैंप वॉक का उन्हें बिल्कुल अनुभव नहीं था। लेकिन ग्रूमिंग सेशन के दौरान लगातार अभ्यास, मेडिटेशन, जुम्बा, फिटनेस और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। उनका कहना था कि टॉप-7 तक पहुंचना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। घराले बाल और दांतों की बनावट का मजाक बना झुंझुनूं जिले के चिड़ावा क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाली फर्स्ट रनरअप वंशिका नूनिया ने कहा कि बचपन से उन्हें हमेशा यह सुनने को मिला कि सपने देखो, लेकिन सीमित देखो। उन्होंने कभी इस सोच को स्वीकार नहीं किया। उनका मानना रहा कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती। वंशिका ने बताया कि स्कूल के दिनों में उनके घुंघराले बाल और दांतों की बनावट का मजाक उड़ाया जाता था। कॉलेज पहुंचीं तो लोग उनके बड़े सपनों का मजाक बनाने लगे। उन्होंने कहा कि कई बार लोगों ने उन्हें नीचे खींचने की कोशिश की, लेकिन शिक्षकों और वरिष्ठों के सहयोग से उन्होंने खुद पर विश्वास बनाए रखा। आज मिस राजस्थान का फर्स्ट रनरअप बनने के बाद उन्हें लगता है कि उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर इंसान बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है, तो उन्हें पूरा भी कर सकता है। आठ साल तक किया इंतजार, फिर मिला सपनों का मंच फोर्थ रनरअप निहारिका माथुर ने बताया कि वे पिछले आठ सालों से ऐसे मंच का इंतजार कर रही थीं, जहां से वे अपने सपनों की शुरुआत कर सकें। उन्होंने कहा कि इन आठ सालों में उन्होंने केवल खुद को बाहरी रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और व्यक्तित्व के स्तर पर भी तैयार किया। हालांकि उनके माता-पिता हमेशा उनका समर्थन करते रहे, लेकिन एक अभिभावक होने के नाते उन्हें बेटी की सुरक्षा और भविष्य की चिंता भी रहती थी। निहारिका ने बताया कि उन्होंने इन सालों में खुद को एक बेहतर इंसान बनाने पर सबसे ज्यादा काम किया। उनका मानना है कि केवल सुंदर दिखना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि भीतर से भी मजबूत और संवेदनशील होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब उनका नाम विजेताओं में घोषित हुआ तो उन्हें महसूस हुआ कि सालों की मेहनत आखिरकार रंग लाई। राजस्थान की बेटियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना ही उद्देश्य मिस राजस्थान के आयोजक योगेश मिश्रा ने बताया कि इस साल प्रतियोगिता का 28वां सीजन आयोजित किया गया। उन्होंने बताया कि इस बार पूरे राजस्थान से करीब 6500 प्रतिभागियों ने रजिस्ट्रेशन कराया, जिनमें से 2500 ने ऑडिशन क्वालिफाई किए। इसके बाद 100 प्रतिभागियों का चयन हुआ और आखिरी 28 फाइनलिस्ट को एक महीने की विशेष ग्रूमिंग और स्कॉलरशिप दी गई। उन्होंने बताया कि पिछले सालों में मिस राजस्थान की प्रतिभागियों ने लगातार फेमिना मिस इंडिया, मिस यूनिवर्स सहित कई बड़े मंचों तक अपनी जगह बनाई है। वैष्णवी शर्मा, तरुशी रॉय और आकांक्षा चौधरी जैसी प्रतिभागियों ने राज्य का नाम देशभर में रोशन किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस साल की विजेता और फाइनलिस्ट भी आने वाले समय में राजस्थान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाएंगी।
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घुंघराले बाल और दांतों की बनावट का मजाक उड़ा: पहली बार 5 इंच की हाई हील पहनी; मिस राजस्थान-2026 की टॉप-6 फाइनलिस्ट ने बताए अपने एक्सपीरियंस – Jaipur News
उसूलों की पक्की थी ये हसीना, न पहने छोटे कपड़े, न बोल्ड सीन के लिए होती थी तैयार
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70-80 के दशक में एक एक्ट्रेस का बहुत बोलबाला था. उस दौर में जब एक्ट्रेस बिकिनी और शॉर्ट ड्रेसेस पहनने लगी थीं, तब वह अपनी सादगी से ही लोगों के दिलों पर राज किया करती थी. साल 1982 में तो इस एक्ट्रेस ने सादगी की मिसाल कायम कर दी थी.
नई दिल्ली. वो मासूम चेहरे वाली हसीना, जिसने अपने करियर में अनिल कपूर, ऋषि कपूर और राजेश खन्ना समेत सभी सुपरस्टार के साथ काम किया था. लेकिन अपने करियर में उन्होंने कई ऐसी फिल्में रिजेक्ट कर दी, जिनसे बाकी दूसरी हीरोइन का करियर चमक उठा. वजह थी, इंटीमेंट या बोल्ड सीन, जिनसे ये एक्ट्रेस परहेज किया करती थीं.

वो परमसुंदरी एक्ट्रेस कोई और नहीं पद्मिनी कोल्हापुरे हैं. अपने करियर की शुरुआत उन्होंने चाइल्ड आर्टिंस्ट के तौर पर की थी. वो भी राज कपूर की फिल्म से. बाद में वह आगे चलकर राज कपूर की फेवरेट एक्ट्रेस भी बनी थीं.

यूं तो पद्मिनी ने अपने हर रोल से ये साबित किया है कि किसी भी रोल के लिए परफेक्ट हैं. लेकिन साल 1982 में जब उनकी फिल्म प्रेम रोग रिलीज हुई तो उन्होंने ग्लैमर से परे एक ऐसा रोल निभाया जिसे लोगों ने काफी पसंद किया था.यही वजह रही कि उस दौर मेकर्स अपनी हर फिल्म में उन्हें कास्ट करना चाहते थे.
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साल 1982 में आई इस फिल्म में उनके अपोजिट ऋषि कपूर नजर आए थे. फिल्म में पद्मिनी ने एक विधवा लड़की मनोरमा का किरदार निभाया था. मनोरमा बहुत छोटी सी उम्र में ही शादी के दूसरे दिन विधवा हो जाती है. फिल्म के जरिए राज कपूर ने एक बड़ा मैसेज भी दिया था.

फिल्म रिलीज होते ही सुपरहिट साबित हुई थी. फिल्म के गानों ने तो लोगों को दीवाना ही बना दिया था. फिल्म में एक विदाई सॉन्ग भी शामिल किया गया. जिसे आज भीं शादियों में अक्सर सुना जाता है. प्यार बयां करने के गीत और जुदाई के गीत इस फिल्म में हर तरह के गाने शामिल हैं.

फिल्म में पद्मिनी की मासूमियत पर लोग फिदा हो गए थे. वह साल 1982 में इस सिंपल किरदार के जरिए भी काफी पॉपुलर हो गई थीं. फिल्म ने कमाई भी बहुत अच्छी की. ऋषि कपूर के करियर को भी फिल्म से नई दिशा मिली. लेकिन सबसे ज्यादा फायदा पद्मिनी कोल्हापुरे को मिला. इस फिल्म में भी एक किसिंग सीन राज कपूर शामिल करना चाहते थे. लेकिन एक्ट्रेस ने उसे करने से साफ इनकार कर दिया था.

इस फिल्म की अपार सफलता के बाद राज कपूर साल 1985 में एक और फिल्म राम तेरी गंगा मैली लेकर आए. यूं तो इस फिल्म में राज कपूर के बेटे राजीव कपूर और मंदाकिनी नजर आए थे. लेकिन फिल्म में राज कपूर पद्मिनी को ही लेना चाहते थे.

राज कपूर जब पद्मिनी को फिल्म की स्क्रिप्ट सुना रहे थे, तो उन्होंने इस फिल्म में काम करने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि अंकल ये मुझसे नहीं होगा. हालांकि उस वक्त फिल्म में मंदाकिनी शूटिंग कर रही थीं, लेकिन वह चाहते थे कि पद्मिनी फिल्म में काम करें. फिल्म इतनी बड़ी हिट साबित हुई थी कि इस फिल्म से मंदाकिनी को ताउम्र पहचान मिली. फिर भी पद्मिनी ने बोल्ड सीन की वजह से ऐसी फिल्मों को रिजेक्ट कर दिया था.
‘मैं विधायक, किसी भी स्कूल का निरीक्षण कर सकता हूं’: कानपुर में FIR दर्ज होने के बाद सपा MLA बोले- हेडमास्टर पर दबाव बनाया गया – Kanpur News
कानपुर में परमट प्राथमिक विद्यालय में अखिलेश यादव का जन्मदिन मनाने के मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद सपा विधायक अमिताभ बाजपेयी ने अपनी चुप्पी तोड़ी।
कहा कि मैं क्षेत्र का विधायक हूं। किसी भी स्कूल, अस्पताल और सरकारी संस्थान में जाकर औचक निरीक्षण कर सकता हूं। इसके लिए मुझे किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। खुशी बांटना अपराध नहीं है। जो भी किया, सरकारी नियम और अधिकार के तहत किया है। बुधवार शाम 7ः30 बजे दैनिक भास्कर से बातचीत में विधायक ने एफआईआर को राजनीतिक दबाव की कार्रवाई बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि निलंबित हेडमास्टर से दबाव में शिकायत कराई गई है। अमिताभ बाजपेयी ने कहा कि वह क्षेत्र के विधायक हैं और किसी भी सरकारी स्कूल या संस्थान का निरीक्षण कर सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि जो भी किया, वह शासन की गाइडलाइन और अपने अधिकारों के तहत किया है। अब पढ़िए पूरी बातचीत…. सवाल: आपके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, क्या कहेंगे?
जवाब: सत्ता के नेताओं ने अपने अहंकार की पुष्टि के लिए एफआईआर कराई है। शिकायत तो मैंने भी की थी, जब मुझे चप्पल दिखाई गई और गालियां दी गई थी। उस मामले में तो आज तक सिर्फ जांच ही चल रही है। एफआईआर तब हुई, जब प्रिंसिपल को सस्पेंड कर दबाव बनाया गया कि जाओ शिकायत करो, बहाल करके अच्छा स्कूल दे दिया जाएगा। वह भी बेचारा क्या करता, शिकायत कर दी। लेकिन उसमें एक शब्द लिखा गया ‘जबरिया’। आखिर कैसे जबरिया? क्या कोई फोटो है, कोई वीडियो है, जिसमें जबरदस्ती करते हुए दिखाया गया हो? विपक्ष पर मुकदमा लिखने के लिए कोई एविडेंस नहीं चाहिए। बड़े नेता अधिकारियों की बैठक में कहते हैं कि अगर किसी भाजपा नेता के खिलाफ तहरीर आए तो जिलाध्यक्ष से पूछकर एफआईआर लिखना। ये कौन-सा कानून चल रहा है? क्या किसी का जन्मदिन मनाना पाप है? पीएम पोषण योजना के तहत ‘तिथि भोजन’ की व्यवस्था है। इसके अंतर्गत पार्षद, प्रधान, विधायक या सांसद किसी भी अवसर पर सरकारी स्कूल में बच्चों को भोजन करा सकता है। बैग, ड्रेस और अन्य उपयोगी सामग्री भी वितरित कर सकता है। इसका अधिकार है। बीएसए का पत्र भी मौजूद है। इसमें हमने क्या गलत कर दिया? बस सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया कि ‘अ से आनंदेश्वर बाबा, अ से आर्यनगर, अ से अखिलेश और अ से अमिताभ’, तो लोगों को बुरा लग गया। प्रिंसिपल को बुलाकर नगद पैसे क्यों दिए गए? क्या इसका कोई कानून है? जब मैं उस स्कूल में काम करा रहा हूं, तो हर काम में टांग अड़ाने का क्या मतलब है? क्या इसे विकास कहते हैं? शहर में कई और स्कूल हैं, उन्हें बनवा देते। या फिर इस स्कूल का काम पूरा होने के बाद बनवा लेते। लेकिन शायद किसी का ईगो हर्ट हो गया। अपनी ताकत दिखाने के लिए मुकदमा लिखवा दिया गया, लेकिन हम लोग मजबूत हैं। सवाल: आरोप है कि आपने स्कूल में कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं ली थी?
जवाब: मैं इस क्षेत्र का विधायक हूं। किसी भी स्कूल, अस्पताल और सरकारी संस्थान में कभी भी औचक निरीक्षण कर सकता हूं। कहीं भी जा सकता हूं। इसके लिए मुझे किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। मुझे खुशी बांटने के लिए भी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। खुशी बांटना अपराध नहीं है। जो भी किया, शासन की गाइडलाइन और कानून के तहत किया। अगर आपको लगता है कि मैंने अपनी विधानसभा में छह स्कूल बनवा दिए हैं, तो आप भी हर विधानसभा में छह स्कूल बनवा दीजिए। सवाल: हेडमास्टर के लिए आपने कार्रवाई न करने का पत्र लिखा था, फिर उन्होंने ही आपके खिलाफ शिकायत कर दी?
जवाब: वह कर्मचारी हैं। सत्ता के दबाव में हैं। उनकी नौकरी दांव पर लगी है। अगर मैं चाहूं तो उनका पूरा चिट्ठा निकाल सकता हूं। उनके पिता कहां नौकरी करते हैं, उनके भाई कहां नौकरी कर रहे हैं, सब जानकारी मेरे पास है। लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहता। सभी शिक्षक मेरे परिवार का हिस्सा हैं। उन पर दबाव बनाया गया है। मुझे उम्मीद है कि जब मामला कोर्ट में जाएगा तो वे सच बोलेंगे। उस समय गीता पर हाथ रखकर बयान देंगे और उन पर किसी तरह का दबाव नहीं होगा।
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सिर्फ 2 चीजों से घर पर बनाएं बाजार जैसी काजू कतली, जानें आसान रेसिपी
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Kaju Katli Recipe: काजू कतली खाना हर किसी को पसंद है, लेकिन महंगी होने की वजह से अक्सर लोग इसे घर पर नहीं बनाते हैं. अब सिर्फ दो चीजों काजू और चीनी से बाजार जैसी स्वादिष्ट काजू कतली आसानी से तैयार की जा सकती है. ऐसे में आज हम आपको इसे बनाने के सरल तरीके के बार में बताएंगे. सबसे पहले काजू का बारीक पाउडर बनाएं, फिर चीनी की एक तार की चाशनी तैयार करें. इसमें काजू पाउडर मिलाकर मिश्रण को गूंधें, बेलें और डायमंड शेप में काट लें. कुछ ही मिनटों में स्वादिष्ट काजू कतली तैयार हो जाएगी.
काजू कतली हर उम्र के लोगों की पसंदीदा मिठाई है, लेकिन इसकी महंगी कीमत और मिलावट की चिंता अक्सर लोगों को परेशान करती है. ऐसे में आप इसे घर पर ही आसानी से बना सकते हैं. अगर आप इसे बनाना चाहते हैं तो काजू और चीनी से बाजार जैसी काजू कतली बनाने की आसान रेसिपी हम आपको बताने वाले हैं. इस विधि से आप बिना किसी मिलावट के मुलायम, स्वादिष्ट और हलवाई जैसी परफेक्ट काजू कतली तैयार कर सकते हैं. कुछ आसान टिप्स अपनाकर यह मिठाई पहली बार में ही बेहतरीन बन जाएगी. ( एआई फोटो )

सामग्री: काजू कतली बनाने के लिए 2 कप काजू लें। चाहें तो टूटे हुए काजू का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि स्वाद में कोई फर्क नहीं पड़ता है. इसके अलावा 1 कप चीनी, बटर पेपर या थाली को ग्रीस करने के लिए 1 छोटा चम्मच घी और सजावट के लिए वैकल्पिक रूप से चांदी का वर्क रखें. इन कुछ आसान सामग्रियों से आप घर पर ही मुलायम, स्वादिष्ट और बाजार जैसी काजू कतली तैयार कर सकते हैं. ( एआई फोटो )

बनाने की विधि: सबसे पहले काजू को पल्स मोड में पीसकर बारीक पाउडर तैयार करें और छलनी से छान लें. ध्यान रखें कि मिक्सर लगातार न चलाएं, वरना काजू से तेल निकल सकता है. अब एक नॉन-स्टिक कढ़ाई में चीनी और आधा कप पानी डालकर 3-4 मिनट तक पकाएं, जब तक चीनी पूरी तरह घुलकर हल्की चिपचिपी न हो जाए. इसके बाद आंच धीमी करें और काजू पाउडर थोड़ा-थोड़ा डालते हुए लगातार चलाएं ताकि गांठ न बने. चाहें तो स्वाद और स्मूद टेक्सचर के लिए थोड़ा देसी घी भी मिला सकते हैं. ( एआई फोटो )
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काजू कतली बनाने की विधि: काजू और चीनी का मिश्रण धीमी आंच पर तब तक पकाएं, जब तक वह कढ़ाई छोड़कर आटे जैसा गाढ़ा न हो जाए. इसकी जांच के लिए थोड़ा मिश्रण हाथ में लेकर गोली बनाएं, अगर वह चिपके नहीं तो मिश्रण तैयार है। गैस बंद कर इसे हल्का गुनगुना होने दें. फिर घी लगी थाली या बटर पेपर पर निकालकर अच्छी तरह मसलें ताकि मिश्रण चिकना हो जाए. ऊपर से दूसरा बटर पेपर रखकर बेलन से पतला बेलें. चाहें तो चांदी का वर्क लगाएं और डायमंड शेप में काटकर ठंडा होने दें. स्वादिष्ट काजू कतली तैयार है. ( एआई फोटो )

काजू कतली को और आकर्षक बनाने के लिए आप इसके ऊपर चांदी का वर्क लगा सकते हैं. इसके बाद मिठाई को 10-15 मिनट के लिए सेट होने दें, ताकि यह अच्छी तरह जम जाए. अब एक तेज चाकू की मदद से इसे पारंपरिक डायमंड शेप में काट लें. इस तरह आपकी घर पर बनी शुद्ध, मुलायम और स्वाद में बाजार जैसी काजू कतली तैयार हो जाएगी. यह मिठाई त्योहारों और खास मौकों के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. ( एआई फोटो )
अमेरिका ने ईरान पर फिर एयरस्ट्राइक की: बुशहर-चाबहार समेत कई शहर निशाने पर; ट्रम्प बोले- हर हमले का 20 गुना ताकत से जवाब देंगे
अमेरिका ने बुधवार देर रात ईरान पर फिर एयरस्ट्राइक की। हमलों में बुशहर, चाबहार, बंदर अब्बास, सीरिक और कोनारक समेत कई शहरों में सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि कार्रवाई का मकसद होर्मुज में ईरान की क्षमता को कमजोर करना है। हमलों के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, “वे हर बार हम पर हमला करेंगे तो हम 20 गुना जवाब देंगे।” ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान समझौता चाहता है, लेकिन उसे इस बात पर भरोसा नहीं कि तेहरान समझौते का पालन करेगा।
पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स मिडिल ईस्ट के हालात से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
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दुनिया को दीं कालजयी फिल्में, फिर भी अपनी जिंदगी की जंग हार गए थे गुरु दत्त
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Guru Dutt Birthday: 9 जुलाई भारतीय सिनेमा के उस महान कलाकार की जयंती है, जिसने फिल्मों को सिर्फ एंटरटेनमेंट तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें समाज और इंसानी भावनाओं का आईना बना दिया. गुरु दत्त का नाम आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे संवेदनशील निर्देशक, अभिनेता और निर्माता के तौर पर लिया जाता है. उनकी बनाई फिल्में दशकों बाद भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं.
गुरुदत्त ने कई कालजयी रचना की है.
नई दिल्ली. 9 जुलाई 1925 को जन्मे गुरु दत्त बचपन से ही कला और क्रिएटिविटी की ओर अट्रेक्ट होते थे.आगे चलकर उन्होंने अभिनय, निर्देशन और फिल्म निर्माण में ऐसी पहचान बनाई, जिसका सपना हर कलाकार देखता है. उनकी फिल्मों में इंसानी दर्द, अकेलापन, संघर्ष और रिश्तों की जटिलताओं को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया.
गुरु दत्त ने अपने करियर में कई ऐसी फिल्में दीं, जिन्हें आज भारतीय सिनेमा की धरोहर माना जाता है. ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया. उनकी फिल्मों की खासियत सिर्फ उनकी कहानी नहीं थी, बल्कि उनमें छिपी जिंदगी की गहरी सच्चाइयां थीं. उनके किरदार अक्सर समाज से लड़ते, अकेलेपन से जूझते और अपनी पहचान की तलाश करते नजर आते थे.
अलग तरह के फिल्ममेकर
गुरु दत्त ने हिंदी सिनेमा को एक नया नजरिया दिया. उनकी फिल्मों में शानदार निर्देशन, बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी, यादगार संगीत और भावनाओं की गहराई का अनोखा मेल देखने को मिलता है. उन्होंने ऐसे विषयों पर फिल्में बनाईं, जिन पर उस दौर में खुलकर बात नहीं होती थी. यही वजह है कि उन्हें अपने समय से काफी आगे का फिल्मकार माना जाता है.
फ्लॉप फिल्में भी बनी कल्ट
देखा जाए तो, इतनी बड़ी सफलता के बाद भी गुरु दत्त की राह आसान नहीं थी. उनकी कुछ फिल्मों को रिलीज के वक्त वह प्यार और सम्मान नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. खासकर ‘कागज के फूल’ बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही और आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा. लेकिन वक्त के साथ यही फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन क्लासिक फिल्मों में गिनी जाने लगी.जहां पर्दे पर उनकी कहानियां लोगों के दिल जीत रही थीं, वहीं निजी जिंदगी में वह लगातार मुश्किलों से जूझ रहे थे. रिश्तों में आई दूरियां, मानसिक तनाव और अकेलेपन ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया. कहा जाता है कि वह अपने दर्द को अक्सर अपनी फिल्मों के जरिए ही बयां करते थे.
बता दें कि देखते ही देखते वह शराब की लत के शिकार हो गए, जिसका असर उनकी सेहत और निजी जिंदगी दोनों पर पड़ा. 10 अक्टूबर 1964 को गुरु दत्त अपने घर में मृत पाए गए. माना जाता है कि उनकी मौत शराब और नींद की गोलियों के असर से हुई थी. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 39 साल थी. उनका यूं अचानक चले जाना भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका था.गुरु दत्त के निधन का सबसे गहरा असर उनकी पत्नी और मशहूर गायिका गीता दत्त पर पड़ा. पति की मौत के बाद वह गहरे सदमे में चली गईं. बाद के वर्षों में उनकी सेहत लगातार बिगड़ती रही और आखिरकार 1972 में लीवर सिरोसिस की वजह से उनका निधन हो गया.
गुरु दत्त भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है. जिन फिल्मों को उनके जीवनकाल में उतनी पहचान नहीं मिली, वही बाद में भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शामिल हो गईं. आज भी फिल्म प्रेमी और नए फिल्मकार उनकी फिल्मों से प्रेरणा लेते हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है.
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न्यूज 18 हिंदी में एंटरटेनमेंट सेक्शन में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार दिल्ली के रहने वाले हैं. डिजिटल मीडिया में उन्हें 10 साल का अनुभव है.राजधानी कॉलेज (DU) से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) की पढ…और पढ़ें
कैंसर संस्थान में लिम्फेडेमा के इलाज के लिए OPD शुरू: स्तन कैंसर मरीजों को निशुल्क प्रेशर स्टॉकिंग्स और ब्रेस्ट प्रोस्थेसिस भी मिलेंगे – Lucknow News
लखनऊ के कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग ने अस्तित्व फाउंडेशन के सहयोग से लिम्फेडेमा की रोकथाम और उपचार के लिए मुफ्त विशेष ओपीडी शुरू की है। संस्थान के निदेशक डॉ. एमएलबी भट्ट ने इसका उद्घाटन किया। पहले ही दिन 30 से अधिक स्तन कैंसर मरीजों का पंजीकरण कर उनका इलाज शुरू किया गया। मरीजों को मिलेंगी मुफ्त सुविधाएं विशेष ओपीडी में मरीजों को नि:शुल्क प्रेशर स्टॉकिंग्स और ब्रेस्ट प्रोस्थेसिस उपलब्ध कराए गए। संस्थान का उद्देश्य स्तन कैंसर की सर्जरी के बाद होने वाली जटिलताओं से मरीजों को समय पर राहत दिलाना है। क्या है लिम्फेडेमा? निदेशक डॉ.एमएलबी भट्ट ने बताया कि स्तन कैंसर की सर्जरी या रेडियोथेरेपी के बाद लिम्फेडेमा एक सामान्य जटिलता है। इसमें हाथ या शरीर के प्रभावित हिस्से में लिम्फ द्रव जमा होने से सूजन, दर्द, जकड़न और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। समय पर इलाज न मिलने पर मरीज की रोजमर्रा की गतिविधियां भी प्रभावित होने लगती हैं। समय पर इलाज से मिल सकती है राहत उन्होंने बताया कि नियमित व्यायाम, हाथ को चोट और संक्रमण से बचाना, वजन नियंत्रित रखना, समय-समय पर जांच कराना और शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ से परामर्श लेने से लिम्फेडेमा की गंभीरता को काफी हद तक रोका जा सकता है। जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने की पहल चिकित्सा अधीक्षक डॉ.वरुण विजय ने कहा कि यह विशेष ओपीडी मरीजों को बीमारी की पहचान, बचाव और आधुनिक उपचार की जानकारी देकर उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद करेगी। कार्यक्रम में डीन डॉ. प्रमोद गुप्ता सहित अन्य चिकित्सक भी मौजूद रहे।
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प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र मामले में नया मोड़: मुनादी कराने वाले अधिकारी पर कार्रवाई की मांग लेकर मुख्यमंत्री से मिले छह मंत्री – Bhopal News
नगरीय विकास एवं आवास राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र विवाद में जांच समिति की सुनवाई पूरी होने से पहले कराई गई मुनादी को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मामले में मुनादी का आदेश जारी करने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर प
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मंगलवार को कैबिनेट बैठक के बाद उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप जायसवाल, गौतम टेटवाल, लखन पटेल और राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की।
मंत्रियों ने सुनवाई पूरी होने से पहले मुनादी कराने के निर्णय पर आपत्ति जताते हुए संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग रखी।
दो सप्ताह में आ सकता है फैसला
सूत्रों के अनुसार, जाति प्रमाण-पत्र मामले की जांच कर रही छानबीन समिति ने 6 जुलाई को सभी पक्षों की सुनवाई पूरी कर ली है। अब समिति अगले दो सप्ताह में अपना निर्णय दे सकती है। माना जा रहा है कि समिति की रिपोर्ट के बाद पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्णय लिया जाएगा।
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मंत्री प्रतिमा बोलीं- मैं बागरी..मेरे पास 110 साल के दस्तावेज
मध्य प्रदेश की नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी की जाति प्रमाणपत्र विवाद मामले में राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने सुनवाई की। मंत्री प्रतिमा ने वंशावली से संबंधित दस्तावेज समिति को दिए। उन्होंने कहा कि वह बागरी समाज से हैं, जो प्रदेश में अनुसूचित जाति में शामिल है। जाति साबित करने के लिए गांव में मुनादी कराई गई। अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया।पूरी खबर पढ़ें
दादी-नानी का सीक्रेट! इस तरीके से बनाएं लसोड़े का अचार, सालभर रहेगा स्वाद बरकरार
लसोड़ा (Lasoda), जिसे कई जगह गोंदा (Gunda) या निसोरा भी कहा जाता है, एक जंगली पेड़ पर लगने वाला छोटा हरे रंग का फल है. इसका वैज्ञानिक नाम Cordia dichotoma है. यह मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. गर्मियों के मौसम में इस फल की अच्छी पैदावार होती है और इसी समय इससे स्वादिष्ट अचार तैयार किया जाता है.
लसोड़े के अचार की सबसे बड़ी खासियत इसकी बनावट है. इस फल के अंदर हल्का चिपचिपा गूदा होता है, जिसकी वजह से मसाले अच्छी तरह इसमें समा जाते हैं.
घर पर कैसे बनाएं स्वादिष्ट लसोड़े का अचार?
लसोड़े का अचार राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और गुजरात के कई घरों में बड़े चाव से बनाया जाता है. इसका स्वाद हल्का खट्टा, तीखा और मसालेदार होता है. अगर इसे सही तरीके से तैयार किया जाए, तो यह कई महीनों तक खराब नहीं होता.
सामग्री
500 ग्राम ताजे लसोड़े
200-250 मिली सरसों का तेल
2 बड़े चम्मच राई (दरदरी पिसी हुई)
1 बड़ा चम्मच मेथी दाना (हल्का भुना और दरदरा कुटा हुआ)
2 बड़े चम्मच सौंफ (दरदरी कुटी हुई)
2 बड़े चम्मच लाल मिर्च पाउडर
1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
2 बड़े चम्मच नमक (स्वादानुसार)
1 छोटा चम्मच हींग
1 बड़ा चम्मच साबुत कलौंजी (वैकल्पिक)
2 बड़े चम्मच सफेद सिरका या 2-3 बड़े चम्मच नींबू का रस (वैकल्पिक)
स्टेप 1: लसोड़े तैयार करें
सबसे पहले लसोड़ों को अच्छी तरह धो लें. इसके बाद इन्हें 5-7 मिनट तक हल्के नमक वाले पानी में उबाल लें. ज्यादा न उबालें, वरना ये बहुत नरम हो जाएंगे. अब इन्हें छलनी में निकालकर पूरी तरह ठंडा और सूखा होने दें. ध्यान रखें कि इनमें बिल्कुल भी पानी न रहे, क्योंकि नमी अचार को जल्दी खराब कर सकती है.
स्टेप 2: मसाला तैयार करें
एक बाउल में दरदरी राई, मेथी, सौंफ, लाल मिर्च, हल्दी, हींग, कलौंजी और नमक डालकर अच्छी तरह मिला लें. यही मसाला अचार का स्वाद तय करता है.
स्टेप 3: सरसों का तेल गर्म करें
सरसों के तेल को कड़ाही में तब तक गर्म करें, जब तक उसका कच्चापन खत्म न हो जाए. इसके बाद गैस बंद कर दें और तेल को पूरी तरह ठंडा होने दें.
स्टेप 4: अचार मिलाएं
अब सूखे लसोड़ों में तैयार मसाला डालें. ऊपर से ठंडा किया हुआ सरसों का तेल डालकर अच्छी तरह मिलाएं ताकि हर लसोड़े पर मसाले की परत चढ़ जाए. चाहें तो इस समय थोड़ा-सा सिरका या नींबू का रस भी मिला सकते हैं.
स्टेप 5: धूप दिखाएं
अचार को साफ और सूखे कांच के जार में भर दें. जार का ढक्कन बंद करके 4-5 दिनों तक रोज 3-4 घंटे धूप में रखें. बीच-बीच में साफ और सूखे चम्मच से अचार को हिलाते रहें. लगभग एक सप्ताह में अचार का स्वाद पूरी तरह विकसित हो जाएगा.
क्या लसोड़ा सेहत के लिए भी फायदेमंद है?
लसोड़ा केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि पोषण के लिहाज से भी अच्छा माना जाता है. इसमें प्राकृतिक फाइबर, विटामिन C और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है, जबकि एंटीऑक्सीडेंट शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में सहायक हो सकते हैं. हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अचार में नमक और तेल की मात्रा अधिक होती है. इसलिए हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी या कम नमक वाला आहार लेने वाले लोगों को इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए.
हर भोजन का स्वाद बढ़ा देता है
लसोड़े का अचार इतना बहुमुखी है कि इसे पराठे, पूरी, दाल-चावल, खिचड़ी, बाजरे की रोटी, मिस्सी रोटी और यहां तक कि सादी रोटी के साथ भी खाया जाता है. कई लोग इसे यात्रा के दौरान भी अपने साथ रखना पसंद करते हैं, क्योंकि यह लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और साधारण भोजन को भी स्वादिष्ट बना देता है.
वो एवरग्रीन सॉन्ग, डायरेक्टर ने 2 बार किया रिजेक्ट, लता मंगेशकर ने कर दिया अमर
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Lata Mangeshkar Songs : हिंदी सिनेमा की सुपरहिट फिल्मों के बनने की कहानियां-किस्से मूवी से भी ज्यादा रोचक होते हैं. इन किस्सों में ही फिल्म को बनाने के दौरान आई चुनौतियों, रोचक फैसलों की जानकारी छिपी होती है. यह भी सच है कि बॉलीवुड में ऐसा कई बार देखने को मिला है जिस गाने को डायरेक्टर-प्रोड्यूसर ने पहली नजर में रिजेक्ट कर दिया, वही फिल्म की पहचान बन गए. जिस स्क्रिप्ट को कई प्रोड्यूसर ने रिजेक्ट कर दिया, उसी पर बनी मूवी ने इतिहास रच दिया. 60-70 के दशक में दो ऐसी फिल्में रिलीज हुईं जिनके गाने सुनकर डायरेक्टर ने जूता उठा लिया था. जूता उठाने के मायने अलग-अलग जरूर थे. दोनों गाने कालजयी साबित हुए. दोनों फिल्में मैसिव हिट रहीं.
गीत-संगीत के बिना तो बॉलीवुड फिल्मों की कल्पना भी नहीं की जा सकती. प्यार-दर्द, प्रेम-विरह-वेदना को गीत के जरिये ही प्रभावी ढंग से व्यक्त किया जा सकता है. फिल्म में गाने की सिचुएशन बनाने के लिए डायरेक्टर कहानी में ट्विस्ट लाते हैं. फिर सिचुएशन के हिसाब से गीतकार गीत लिखते हैं. कई बार ऐसा होता है कि जो गाना संगीतकार सुनाते हैं, वो डायरेक्टर को पसंद नहीं आता है. 8 साल के अंतराल में बनीं दो फिल्मों के साथ ऐसा ही हुआ. दोनों फिल्मों में लता मंगेशकर ने दो ऐसे कालजयी गाने गाए जो इन फिल्मों की पहचान बन गए. एक गाना रिजेक्टेड था जबकि दूसरे गाने को सुनकर डायरेक्टर ने खुशी में जूता उठा लिया था. ये फिल्में थीं : वो कौन थी और पाकीजा. वो दो गाने कौन से थे, आइये जानते हैं…

मनोज कुमार-साधना और प्रेम चोपड़ा स्टारर एक फिल्म ‘वो कौन थी’ 1964 में रिलीज हुई थी. यह एक मिस्ट्री थ्रिलर फिल्म थी जिसका डायरेक्शन राज खोसला ने किया था. स्क्रीनप्ले ध्रुव चटर्जी ने लिखा था. फिल्म विल्की कॉलिन्स के नॉवेल ‘द वुमिन इन व्हाइट’ से इंस्पायर्ड थी. प्रोड्यूसर एनएन सिप्पी थे. संगीतकार मदन मोहन थे. गीतकार राजा मेहंदी अली खान थे.

फिल्म का म्यूजिक सुपरहिट था. इसी फिल्म का एक कालजयी गाना आज भी संगीत प्रेमियों के दिल में बसता है. गाने को लता मंगेशकर ने गाया था जिसके बोल ‘लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो’ हैं. गाना रोमांटिक जरूर है लेकिन दर्दभरा है. करोड़ों लोगों का यह पसंदीदा गाना है लेकिन पहली बार में इस गाने को डायरेक्टर राज खोसला ने रिजेक्ट कर दिया था.
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संगीतकार मदन मोहन ने मनोज कुमार से बात की. शूटिंग में कुछ ही दिन बचे थे और गाना फाइनल नहीं हुआ था. मनोज कुमार ने प्रोड्यूसर एनएन सिप्पी से बात की. मनोज कुमार ने गाना सुनने का अनुरोध किया. राज खोसला ने दोबारा गाना सुना लेकिन फिर से रिजेक्ट कर दिया. तीसरी बार जब धुन सुनी तो वो लज्जित हुए. उन्हें धुन बेहतरीन लगी. उन्होंने खुद को मारने के लिए जूता तक उठा लिया था. इस किस्सा का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘राज खोसला: द ऑथराइज्ड बायोग्राफी’ में भी किया.

‘वो कौन थी’ की मेकिंग में मनोज कुमार का बहुत बड़ा हाथ था. साधना की मौजूदगी ने फिल्म में चार चांद लगा दिए. फिल्म का एक और शानदार गाना ‘नैना बरसे रिमझिम’ था. साधना को ‘मिस्ट्री गर्ल’ का नाम इसी फिल्म से मिला. गुरुदत्त की ‘राज’ फिल्म ही आगे चलकर ‘वो कौन थी’ बनी. फिल्म का बजट 45 लाख के करीब था. मूवी ने 90 लाख की कमाई की थी. फिल्म हिट थी. इस फिल्म की सफलता के बाद राज खोसला ने साधना के साथ ‘मेरा साया’ और ‘अनीता’ जैसे दो और सस्पेंस थ्रिलर फिल्में बनाईं.

डायरेक्टर की ओर से जूता उठाने का एक और दिलचस्प किस्सा लता मंगेशकर के एक और सदाबहार गाने से जुड़ा हुआ है. गाना 1972 में ‘पाकीजा’ फिल्म में था जिसके बोल ‘चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था’ थे. ‘पाकीजा’ का निर्देशन-प्रोडक्शन कमाल अमरोही ने किया था. कहानी भी कमाल अमरोही ने ही लिखी थी. इस फिल्म को बनाने में 16 साल का लंबा वक्त लगा था. लंबी जद्दोजहद के बाद यह मूवी 4 फरवरी 1972 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी.

पाकीजा एक म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा फिल्म थी जिसमें मीना कुमारी-राज कुमार लीड रोल में नजर आए थे. कहानी लखनऊ की तवायफ साहिबजान की कहानी को पर्दे पर दिखाती है. म्यूजिक गुलाम मोहम्मद-नौशाद ने कंपोज किया था. इस फिल्म का हर गाना सुपरहिट था. कहते हैं कि ‘चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था’ गाने को सुनकर कमाल अमरोही ने जूता उठा लिया था और कहा था कि यह गाना बहुत पसंद है. कोई इस गाने की बुराई नहीं करेगा.

फिल्म का एक और गाना ‘मौसम है आशिकाना’ भी खूब मकबूल हुआ. आज भी लोकप्रिय है. गाना यमन कल्याण राग पर बेस्ड है. पाकीजा फिल्म की शूटिंग 1958 से शुरू हुई थी. कमाल अमरोही ने बड़ी मेहनत से फिल्म बनाई थी लेकिन दर्शकों को मूवी पसंद नहीं आ रही थी.

31 मार्च 1972 को मीना कुमारी की मौत हो गई. मीना कुमारी की मौत का फिल्म पर बहुत असर पड़ा. दर्शकों को लगा कि मीना कुमारी की वो फिर नहीं देख पाएंगे. फिल्म के प्रति लोगों का नजरिया बदला और सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ उमड़ने लगी. नतीजतन यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई.

