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पूर्वांचल और उत्तर भारत के कई हिस्सों में गमछा लंबे समय से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है. गाजीपुर, बलिया और बनारस जैसे इलाकों में यह सिर्फ गर्मी से बचाव का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी माना जाता है. अब समय के साथ इसमें नए डिजाइन, पैटर्न और ओडिशा मॉडल जैसी वैरायटी जुड़ने से यह युवाओं के बीच एक फैशन ट्रेंड के रूप में भी उभर रहा है.
गांवों में बुजुर्गों और किसानों की पहचान माना जाने वाला गमछा अब युवाओं के बीच भी फिर से ट्रेंड में लौट रहा है. हल्के सूती कपड़े और ढीली बुनाई की वजह से यह गर्मी में शरीर को हवा देता है और पसीना जल्दी सोख लेता है. इस गमछे का चेकर्ड डिजाइन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है. इसकी वैफल वीव बुनाई में छोटे-छोटे एयर गैप बनते हैं, जो कपड़े के अंदर हवा के प्रवाह को बेहतर बनाते हैं. यही वजह है कि गर्मी में यह गमछा ज्यादा आरामदायक महसूस होता है.

गर्मी में गहरे नीले और हरे रंग के प्रिंट आंखों को सुकून देते हैं. अजय बताते हैं कि अब लोग डार्क और लाइट शेड्स का कॉम्बिनेशन ज्यादा पसंद कर रहे हैं. अगर शर्ट डार्क है, तो लोग ऐसा लाइट बेस वाला गमछा चुन रहे हैं जो चेहरे को आकर्षक दिखाता है. लिनन और कॉटन का मिक्स फैब्रिक हवा को आसानी से आर-पार जाने देता है और डार्क शर्ट पर बेहतरीन कंट्रास्ट भी देता है. टेक्सटाइल विशेषज्ञ मानते हैं कि हल्के सूती और ढीली बुनाई वाले गमछे गर्म इलाकों के लिए ज्यादा आरामदायक होते हैं क्योंकि इनमें हवा का प्रवाह बेहतर रहता है. यही वजह है कि पूर्वांचल की गर्मी में आज भी गमछा ‘देसी एसी’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है.

गाजीपुर की तपती दुपहरी में जब सूरज आग उगलता है, तब यहाँ के लोगों का सबसे भरोसेमंद साथी बनता है यह गमछा. यह गमछा देखने में काफी अट्रैक्टिव है. कॉटन साइंस के अनुसार जब हवा गमछे के महीन रेशों से होकर गुजरती है, तो वह चेहरे को ठंडी हवा का अहसास कराती है. लू के थपेड़ों से बचने के लिए गाजीपुर के लोग इसे चेहरे पर लपेटना पसंद कर रहे हैं.
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सौरभ के मुताबिक, कुर्ते के साथ पहनने के लिए ये फूलदार गमछे आजकल काफी हिट हैं. साइंटिफिक नजरिए से देखा जाए तो हाई-क्वालिटी कॉटन सूरज की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों को कुछ हद तक सोख लेता है. यह फैशन और सेहत दोनों का परफेक्ट कॉम्बिनेशन माना जा रहा है. इस गमछे में पिक स्ट्रिप और मल्टी कलर फ्लोरल डिजाइन इसे दूर से ही आकर्षक बना देते हैं.

पूर्वांचल में गमछा सिर्फ पसीना पोंछने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माना जाता है. गाजीपुर, बलिया, बनारस और आसपास के इलाकों में दशकों से किसान, मजदूर और यात्री सूती गमछा इस्तेमाल करते आए हैं क्योंकि इसका कपड़ा गर्मी में हवा पास होने देता है और पसीना जल्दी सोख लेता है. समय के साथ इसकी बुनाई और डिजाइन में बदलाव आया है. अब फूलदार प्रिंट, ओडिशा मॉडल, चेकर्ड पैटर्न और वैफल वीव जैसे नए डिजाइन युवाओं को भी आकर्षित कर रहे हैं.

सफेद रंग पर नारंगी और पीले फूलों की हल्की छपाई वाला यह गमछा इस समय गाजीपुर के बाजारों में सबसे अलग नजर आ रहा है. सफेद आधार वाले गमछे सूरज की रोशनी को रिफ्लेक्ट (परावर्तित) करते हैं, जिससे शरीर ज्यादा गर्म नहीं होता. अजय के अनुसार, अब लोग धूप से बचाव के साथ-साथ यह भी देख रहे हैं कि गमछा उनके पैंट-शर्ट के साथ मैच कर रहा है या नहीं.

हरे और क्रीम रंग के पारंपरिक डिजाइन वाला यह ओडिशा मॉडल गमछा अपनी बारीक बुनाई और कलात्मक पैटर्न की वजह से अलग पहचान बना रहा है. इस तरह के गमछों में सिर्फ धूप से बचाव ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है. हल्का सूती कपड़ा गर्मी में आराम देता है, जबकि इसकी पारंपरिक बॉर्डर डिजाइन इसे सामान्य गमछों से अलग बनाती है. दुकानदारों के मुताबिक अब युवा सिर्फ साधारण गमछा नहीं, बल्कि अलग-अलग राज्यों के डिजाइन वाले गमछे भी पसंद कर रहे हैं.














