Mainak Debnath, Nadia (West Bengal)
नई दिल्ली. सफलता एक दिन में नहीं मिलती है, लेकिन जज्बा और जुनून है तो एक दिन जरूर मिलती है. इस बात को पश्चिम बंगाल के एक युवक ने बखूबी साबित कर दिखाया है. यह कहानी है पश्चिम बंगाल के चकदहा में रहने वाले सूरज विश्वास की. उनका संघर्ष और सफलता किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. गंगा की बाढ़ में उनका घर बह गया तो पूरे परिवार ने मामा के घर में शरण ली. शुरुआती पढ़ाई सरकारी स्कूल में पूरी हुई तो पेट पालने के लिए डिलीवरी पार्टनर तक बनना पड़ा. लेकिन, उनकी मेहनत और जिद ने सूरज के सितारे बुलंद कर दिए और आज वह एक एआई स्टार्टअप के मालिक हैं.
सूरज का जन्म रानाघाट के एक सामान्य परिवार में हुआ था. गंगा की बाढ़ में उनका घर बह गया तो पूरे परिवार ने बालागढ़ स्थित उनके मामा के घर में शरण ली. यहीं पर सूरज की शुरुआती पढ़ाई हुई और बिना बिजली वाले गांव में रहकर उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की. बाद में चकदहा स्थित बापूजी विद्यामंदिर से 9वीं तक पढ़ाई की, जहां उनके मामा शिक्षक थे. हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए सूरज बंगाल के मेदिनीपुर स्थित स्कूल में आ गए. हालांकि, सूरज स्कूली पढ़ाई नहीं करना चाहते थे, लेकिन उन्हें पता था कि आगे बढ़ने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है. हालांकि, बाद में वह बापूजी विद्यामंदिर वापस आकर अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी की.
सूरज ने अपने दोस्त के साथ मिलकर एआई स्टार्टअप बनाया.
2017 से ही मिल गया रास्ता
कहते हैं जिंदगी में दबलाव अक्सर हादसे ही लाते हैं. सूरज के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. साल 2017 में उनके छोटे चचेरे भाई को सिस्टिक फाइब्रोसिस नामक एक जेनेटिक बीमारी हो गई और महज 3 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई. इस घटना ने सूरज पर गहरा असर डाला और तभी उन्होंने मेडिकल साइंस, खासकर जेनेटिक्स में रिसर्च करने का मन बना लिया. बस, यहीं से सूरज के जीवन का संघर्ष और सफलता दोनों रास्ता शुरू हो गया.
नीट में आए 601 नंबर
सूरज को पता था कि मेडिकल क्षेत्र का रास्ता नीट के जिरये ही गुजरता है. उन्होंने साल 2019 में राजस्थान के कोटा शहर में जाकर नीट की तैयारी की और साल 2020 में 601 नंबर के साथ परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली. हालांकि, उनके पास प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे. साथ ही उनका सपना भी डॉक्टर बनने का नहीं था. लिहाजा उन्होंने डॉक्टर बनने के बजाय रिसर्च की तरफ जाने का रास्ता चुना.
पहले ही बना चुके थे खुद का एनजीओ
सूरज ने नीट क्लीयर करने से पहले अपने दोस्त के साथ मिलकर एक गैर-लाभकारी संगठन यानी एनजीओ बना चुके थे. अर्नब फाउंडेशन के नाम से चलने वाले इस एनजीओ के तहत माइग्रेंट होकर आए बच्चों की पढ़ाई में मदद की जाती थी. हालांकि, सूरज को यह आभास हो गया था कि सामाजिक दायित्वों को पूरा करने के लिए आर्थिक रूप से मजबूत होना बेहद जरूरी है. यही वजह रही कि उन्होंने सोदेपुर के गुरु नानक इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मा साइंस एंड टेक्नोलॉजी में एडमिशन ले लिया.
सूरज का एआई स्टार्टअप स्कूली बच्चों को रिसर्च में मदद करता है.
कोरोनाकाल ने दिलाया बड़ा अवसर
कोविड महामारी सभी के लिए तो आपदा लेकर आई लेकिन सूरज ने इसमें अपने लिए अवसर खोज लिया. सारी क्लासेज ऑनलाइन होने लगी तो सूरज बैंगलुरु जा पहुंचे. वहां अपने खर्चे उठाने के लिए जोमैटो के साथ डिलीवरी पार्टनर के तौर पर काम किया. सूरज ने बैंगलुरु के एक स्कूल में दाखिला भी लिया और जब लॉकडाउन खत्म हो गया तो सूरज साल 2022 में वापस कोलकाता लौट गए. यहां आकर अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर स्टार्टअप शुरू किया. बस यहीं से सूरज के कारोबारी जीवन की शुरुआत हो गई.
एआई से लैस स्टार्टअप बनाया
सूरज ने शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने और तकनीक के जिरये रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए दो ब्रांड बनाए. Assessli and Dotsin—with के जिरये उन्होंने सरकारी स्कूलों के बच्चों को रिसर्च की तरफ बढ़ाने में मदद करना शुरू कर दिया. इस स्टार्टअप को रूस में भारत की ओर से प्रदर्शित किया गया और इसे पेटेंट भी मिल गया. उनके स्टार्टअप को भारत सरकार की ओर से भी निधि प्रयास प्रोग्राम के जरिये सपोर्ट किया जा रहा है.
30 हजार छात्रों को मिल रही मदद
सूरज की एआई कंपनी में आज 25 से ज्यादा प्रोफेशनल काम करते हैं और इसके जिरये सरकारी स्कूलों के 30 हजार से ज्यादा बच्चों को मदद दी जा रही है. उनका स्टार्टअप Assessli एक एआई प्लेटफॉर्म है जो हाईपर-पर्सनलाइज्ड इंटेलीजेंट से बना है. इस एआई प्लेटफॉर्म को एलबीएम से लैस किया गया है, जो बिना भाषाई बाधा के इंटीग्रेटेड जीनोमिक, न्यूरोसाइकोलॉजिकल, साइकोलॉजिकल और बिहैवरल आंकड़ों को जुटाता है और इस पर शोध के लिए छात्रों की मदद करता है. यह हर यूजर को रियल टाइम में जानकारी उपलब्ध कराता है. एक डिलीवरी ब्वॉय से एआई स्टार्टअप के फाउंडर बनने तक का सफर सूरज के लिए आसान नहीं था, लेकिन उनके निरंतर प्रयासों और लक्ष्य पर फोकस ने आखिरकार सफलता दिला ही दी.

