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UP Assembly Elections 2027 : यूपी चुनाव से पहले राहुल गांधी और अखिलेश यादव अपनी-अपनी रस्सी और खूंटा मजबूत करने में लग गए हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने ‘मिशन 2027’ के लिए हाथ मिला लिया है. इस बार न तो चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन का इंतजार किया जाएगा और न ही बिहार की तरह फ्रेंडली फाइट के नाम पर वोट कटेंगे. अखिलेश यादव ने समय से पहले 200 जिताऊ चेहरे छांट लिए हैं. जानिए इस बार यूपी के ‘दो लड़के’ बीजेपी के ‘चाणक्य’ और ‘बुलडोजर बाबा’ के गर्जना का सामना कैसे करेंगे.
राहुल-अखिलेश इस बार यूपी में कौन सी गलती नहीं दोहराएंगे?
लखनऊ. बंगाल चुनाव में कांग्रेस को लगे झटके के बाद राहुल गांधी ने यूपी चुनाव 2027 में इज्जत बचाने के लिए अपने आपको अखिलेश यादव के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. अब पूरी तरह से साफ हो गया है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस यूपी विधानसभा का चुनाव मिलकर ही लड़ेगी. ऐसे में राहुल गांधी और अखिलेश यादव बिहार वाली वह गलती नहीं दोहराना चाहते हैं, जिससे आरजेडी और कांग्रेस की दुर्गति हुई थी. सपा ने इस बार यूपी में चुनाव लड़ने का फॉर्मूला बदल दिया है. सपा इस बार चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन का इंतजार नहीं करेगी. नोटिफिकेशन से पहले ही दोनों पार्टियां अपने कैंडिडेट का ऐलान कर देगी, जिससे क्षेत्र में जनता के बीच काम करने का मौका मिल जाए. दोनों के बीच टिकट बंटवारे का फार्मूला भी तय हो गया है. सपा ने सर्वे के आधार पर करीब 200 सीटों पर प्रत्याशियों का नाम भी तय कर लिया है. कहा जा रहा है कि सबसे पहले नामों का ऐलान भी सपा ही कर देगी.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय जो खिचड़ी पक रही है, उसकी खुशबू दिल्ली तक आने लगी है. लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग से लेकर दिल्ली के लुटियंस जोन तक एक बात बिल्कुल साफ हो चुकी है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पूरी ताकत से मिलकर लड़ने जा रहे हैं. लेकिन इस बार का यह गठबंधन साल 2017 की तरह सिर्फ ‘यूपी के लड़कों’ का पोस्टर लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बार अखिलेश यादव ने अपनी पूरी रणनीति ही बदल दी है. ग्राउंड जीरो पर काम कर रहे सपा और कांग्रेस के नेताओं से जब न्यूज-18 हिंदी ने बात की, तो एक बहुत दिलचस्प बात सामने आई. समाजवादी पार्टी इस बार ‘बैकसीट’ पर बैठकर चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन का इंतजार करने के मूड में कतई नहीं है.
यूपी में कांग्रेस और एसपी की तैयारी शुरू.
राहुल-अखिलेश कर रहे हैं खूंटा मजबूत
अमूमन देखा जाता है कि जब तक चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान नहीं करता, तब तक पार्टियों में टिकट को लेकर सिर-फुटौव्वल चलती रहती है. ऐन वक्त पर टिकट बंटने से उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में जाने और जनता के बीच पैठ बनाने का समय ही नहीं मिल पाता. लेकिन सपा सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव ने अंदरूनी सर्वे और लोकल फीडबैक के आधार पर करीब 200 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम लगभग तय कर लिए हैं. अब इस नई रणनीति के तहत, दोनों पार्टियां औपचारिक अधिसूचना जारी होने से काफी पहले ही अपने-अपने उम्मीदवारों की लिस्ट धीरे-धीरे जारी करना शुरू कर देंगी. इससे कैंडिडेट को जमीन पर जाकर कार्यकर्ताओं को एक्टिव करने और वोटरों के बीच सत्ता विरोधी लहर का माहौल बनाने के लिए पूरा 4-5 महीने का वक्त मिल जाएगा.
बिहार वाली गलती यूपी में नहीं दोहराई जाएगी
यूपी के इस गठबंधन में इस बार सबसे बड़ा फोकस इस बात पर है कि किसी भी कीमत पर बिहार वाली गलती नहीं दोहरानी है. पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच कई सीटों पर पेंच फंसा रह गया था, जिसका नतीजा यह हुआ कि कई महत्वपूर्ण सीटों पर दोनों दलों के बीच फ्रेंडली फाइट देखने को मिला, जिसमें एनडीए ने बाजी मार ली.
नोटिफिकेशन से पहले ही एक्शन में सपा-कांग्रेस
यूपी की राजनीति को करीब से जानने वाले संजीव पांडेय कहते हैं, ‘राजनीति में फ्रेंडली फाइट जैसा कोई शब्द नहीं होता. जब दो सहयोगी दल एक ही सीट पर आमने-सामने लड़ते हैं, तो उनका कैडर आपस में ही भिड़ जाता है. इसका सीधा फायदा तीसरी पार्टी उठा ले जाती है. लेकिन अखिलेश यादव ने बिहार वाली भूल को शायद इस बार यूपी में न दोहराएं. लेकिन जब एक टेबल पर सीटों के बंटवारे का खाका तैयार किया जाता है, तो स्थिति बदल जाती है. कैडर वोट और कार्यकर्ताओं के प्रेशर के सामने बड़े नेताओं को झुकना पड़ता है, जिसका नतीजा बिहार में लोग देख चुके हैं. इसलिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने काफी सोच समझकर यह पैसला लिया है. ‘
यूपी चुनाव 2027 में अखिलेश यादव कांग्रेस नेता के किस बयान को रखेंगे याद?
इस नई जुगलबंदी से सपा-कांग्रेस को कितना फायदा?
वोटों का बिखराव रुकेगा:मुस्लिम और दलित-पिछड़ा (PDA) वर्ग का वोटर जो अक्सर इस असमंजस में रहता था कि सपा को दें या कांग्रेस को, उसके सामने अब तस्वीर बिल्कुल साफ होगी.
बीजेपी के ‘सरप्राइज एलिमेंट’ की काट: बीजेपी हमेशा आखिरी वक्त पर चौंकाने वाले फैसले लेती है. अगर सपा-कांग्रेस के उम्मीदवार पहले से मैदान में डटे होंगे, तो उन्हें घेरना सत्ता पक्ष के लिए आसान नहीं होगा.
भीतरघात की गुंजाइश खत्म: समय रहते टिकट तय होने से जो बागी या असंतुष्ट नेता होंगे, उन्हें मनाने या शांत करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा, जिससे ऐन चुनाव के दिन भीतरघात का खतरा न्यूनतम हो जाएगा.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का अब एक ही नारा है-“सवाल सीटों का नहीं, सवाल जीत का है.” यही वजह है कि कांग्रेस भी इस बार ज्यादा नखरे दिखाने के मूड में नहीं है और व्यावहारिक होकर सीटों की मांग कर रही है. ग्राउंड की हकीकत यही कहती है कि अगर यह फॉर्मूला जमीन पर शत-प्रतिशत उतर गया, तो यूपी की चुनावी लड़ाई बेहद दिलचस्प और कांटे की होने वाली है.

