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विदेशी निवेशकों का भारत से पैसा निकालना पिछले कुछ समय से चिंता का विषय बना हुआ था. लेकिन जून में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कुछ बड़े फैसले किए, जिनका असर अब दिखने लगा है. SBI रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, इन कदमों के बाद सिर्फ एक महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारत में करीब 7 अरब डॉलर यानी लगभग ₹60,000 करोड़ का निवेश किया है. इससे रुपये को भी मजबूती मिली है और विदेशी पूंजी का भरोसा फिर से भारत की ओर लौटता दिख रहा है.
RBI के नए नियमों के बाद बैंकों को इस योजना के जरिए ज्यादा जमा जुटाने में मदद मिल रही है.
नई दिल्ली. पिछले कुछ महीनों से विदेशी निवेशक (FII) भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे थे. इससे शेयर बाजार के साथ साथ रुपये पर भी दबाव बढ़ रहा था. ऐसे में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जून में कुछ ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने विदेशी निवेशकों का नजरिया बदल दिया. अब इसका असर भी दिखने लगा है. SBI रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, इन फैसलों के बाद भारत में करीब 7 अरब डॉलर यानी लगभग ₹60,000 करोड़ की विदेशी पूंजी आई है. इसका फायदा सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहा. डॉलर के मुकाबले रुपये में भी मजबूती देखने को मिली. 20 मई को रुपया जहां 1 डॉलर के मुकाबले 96.80 रुपये तक पहुंच गया था, वहीं जून के आखिर तक इसमें करीब 2.2 फीसदी की रिकवरी दर्ज की गई.
जून में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगी थीं. इससे रुपये पर दबाव आने लगा. ऐसे में सरकार और RBI ने विदेशी निवेशकों और एनआरआई (NRI) का पैसा भारत लाने के लिए कई अहम फैसले किए. इनमें सबसे बड़ा फैसला था कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को सरकारी बॉन्ड में निवेश पर टैक्स में राहत दी गई. इसके अलावा विदेशी मुद्रा गैर निवासी बैंक जमा (FCNR-B) योजना को और आकर्षक बनाया गया. RBI ने बैंकों की हेजिंग लागत खुद उठाने का फैसला किया, जिससे विदेशी मुद्रा जमा पर बैंकों का खर्च कम हो गया. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए रियायती डॉलर स्वैप विंडो भी शुरू की गई.
FCNR-B स्कीम से कैसे आया पैसा?
FCNR-B ऐसी जमा योजना है, जिसमें विदेश में रहने वाले भारतीय (NRI) डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा में भारत के बैंकों में पैसा जमा कर सकते हैं. RBI के नए नियमों के बाद बैंकों को इस योजना के जरिए ज्यादा जमा जुटाने में मदद मिल रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक बैंकों ने इस योजना के जरिए 3 से 4 अरब डॉलर यानी करीब ₹26,000 करोड़ से ₹34,000 करोड़ जुटा लिए हैं. बैंकिंग सेक्टर को उम्मीद है कि आने वाले समय में इस स्कीम के जरिए 40 से 50 अरब डॉलर यानी लगभग ₹3.4 लाख करोड़ से ₹4.3 लाख करोड़ तक की नई विदेशी जमा आ सकती है. खासकर खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों से इसमें अच्छी भागीदारी की उम्मीद है.
रुपये को कैसे मिला सहारा?
जब किसी देश में ज्यादा विदेशी डॉलर आते हैं तो डॉलर की उपलब्धता बढ़ जाती है. इससे स्थानीय करेंसी पर दबाव कम होता है. यही वजह रही कि जून के दौरान रुपये में मजबूती देखने को मिली. हालांकि, हाल में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से रुपये पर फिर कुछ दबाव बना है. इसके बावजूद SBI रिसर्च का मानना है कि अगर भारत के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल यानी करीब ₹6,900 प्रति बैरल या उससे नीचे रहती है तो देश का तेल आयात बिल पिछले अनुमान की तुलना में 30 से 35 अरब डॉलर यानी लगभग ₹2.6 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ तक कम हो सकता है.
विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़ा
रिपोर्ट के अनुसार, जून के आखिर तक समाप्त पखवाड़े में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4.4 अरब डॉलर यानी करीब ₹38,000 करोड़ बढ़ा है. वहीं बैंकों की लिक्विडिटी भी बेहतर हुई है. सिर्फ जून के आखिर तक के पखवाड़े में बैंकों में करीब ₹7 लाख करोड़ की नई जमा आई है.
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अच्छी खबर?
विदेशी निवेश बढ़ने से शेयर बाजार को सहारा मिलता है, रुपये में स्थिरता आती है और कंपनियों के लिए पूंजी जुटाना आसान होता है. साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने से भारत बाहरी झटकों का बेहतर तरीके से सामना कर सकता है. SBI रिसर्च का मानना है कि अगर वैश्विक हालात ज्यादा नहीं बिगड़ते, तो आने वाले महीनों में विदेशी निवेश का यह सिलसिला और मजबूत हो सकता है.

