छिंदवाड़ा जिले के तामिया स्थित चौरा पठार और पातालकोट व्यू पॉइंट की करोड़ों रुपए की बेशकीमती जमीन सरकारी अधिकारियों और उनके परिजनों को महज 6 लाख रुपए में बेच दी गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिसकी जमीन थी, उसे पता ही नहीं चला कि जमीन किसी और को बेची जा चुकी है। दरअसल, पुश्तैनी जमीन के बंटवारे को लेकर परिवार में लंबे समय से विवाद चल रहा था। आरोप है कि तत्कालीन पटवारी लेखराम नदवंशी ने ई-केवाईसी के नाम पर उनसे कोरे कागजों पर हस्ताक्षर कराए, जिसके बाद उनका वहां से स्थानांतरण भी हो गया। उन्हीं हस्ताक्षरों का उपयोग कर जमीन अधिकारियों के परिजनों को बेच दी गई। आदिवासी परिवार की जमीन की इस तरह से हुई खरीद-फरोख्त में प्रशासनिक अधिकारियों, राजस्व अमले और अन्य लोगों की भूमिका सवालों के घेरे में है। मामले में जुन्नारदेव एसडीएम के पिता, तामिया में पदस्थ बीएमओ और तामिया के तत्कालीन प्रभारी तहसीलदार उमराज वालरे का नाम सामने आया है। इन्हीं के नाम पर जमीन खरीदी गई। दैनिक भास्कर ने इसकी पड़ताल की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… अब सिलसिलेवार तरीके से पूरी कहानी समझें
जिस जमीन को लेकर विवाद है, वह तामिया रेस्ट हाउस और प्रसिद्ध पातालकोट व्यू पॉइंट के आसपास स्थित है, जहां से पातालकोट की खूबसूरत वादियां दिखती हैं। यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी क्षेत्र की करीब 11 एकड़ जमीन को मात्र 6 लाख रुपए में रजिस्टर्ड कराने का आरोप है। दरअसल, यह जमीन नान्हो और सिमीना नाम की दो बहनों के परिवार की पुश्तैनी संपत्ति थी। परिवार के पास कुल 22 एकड़ जमीन थी। दोनों बहनों की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति उनके बेटों (दोनों मौसियों के परिवारों) के पास गई। जमीन का बंटवारा विप्पा भारती और अन्य वारिसों के बीच होना था। लंबे समय से परिवार के भीतर सीमांकन और बंटवारे को लेकर विवाद चल रहा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि आम आदमी वर्षों तक तहसीलों और राजस्व कार्यालयों के चक्कर काटता रहता है, लेकिन उसका सीमांकन और बंटवारा समय पर नहीं हो पाता। यहां भी यही स्थिति थी और मामला लंबित था, लेकिन अचानक एक महीने के भीतर पूरी प्रक्रिया तेजी से पूरी कर दी गई। कीमती हिस्सों को अलग किया
आरोप है कि राजस्व अमले ने सुनियोजित तरीके से जमीन के सबसे कीमती हिस्से को अलग करवाया। पातालकोट व्यू पॉइंट और मुख्य सड़क से लगा हुआ हिस्सा, जिसकी बाजार कीमत सबसे ज्यादा मानी जा रही थी, उसे कागजों में रामदास भारती के हिस्से में दर्ज कर दिया गया। इसके बाद उसी हिस्से की 11 एकड़ जमीन को तीन अलग-अलग लोगों के नाम रजिस्टर्ड करा दिया गया। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जमीन की कीमत को लेकर खड़ा हो रहा है। जिस जमीन की बाजार कीमत 60 लाख रुपए प्रति एकड़ से ज्यादा बताई जा रही है (इस हिसाब से 11 एकड़ जमीन 6 करोड़ 60 लाख रुपए की हुई) और जिसका शासकीय मूल्य (गाइडलाइन वैल्यू) 27 लाख रुपए है, उसे मात्र 6 लाख रुपए में रजिस्टर्ड कराया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जमीन की खरीदी-बिक्री में रजिस्ट्री मूल्य सामान्यतः गाइडलाइन वैल्यू से कम नहीं होता। ऐसे में करोड़ों की संभावित व्यावसायिक जमीन को सिर्फ 6 लाख रुपए में रजिस्टर्ड किया जाना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। महीने भर में प्रक्रिया पूरी रजिस्ट्री दस्तावेजों के अनुसार, ई-केवाईसी का झांसा देकर अंगूठा लगवाने का आरोप पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया है कि राजस्व अमले ने उन्हें सरकारी प्रक्रिया और ई-केवाईसी का झांसा देकर कोरे कागजों पर अंगूठे और हस्ताक्षर करवा लिए। परिवार के सदस्य बिसन लाल भारती का कहना है कि पटवारी लेखराम नदवंशी और कोटवार उनके घर पहुंचे थे। बिसन, विप्पा भारती के पोते हैं। विप्पा के तीन बेटे थे, जिनमें से सबसे बड़े बेटे का निधन हो चुका है और बिसन उन्हीं के बेटे हैं, जबकि अन्य दो भाई जीवित हैं। बिसन ने बताया कि पटवारी ने उनसे कहा था कि सरकारी योजना और दस्तावेजों के लिए हस्ताक्षर जरूरी हैं। परिवार पढ़ा-लिखा नहीं था, इसलिए उन्होंने भरोसा कर दस्तखत कर दिए। बाद में पता चला कि उन्हीं कोरे कागजों का इस्तेमाल जमीन के बंटवारे और रजिस्ट्री में कर लिया गया। परिवार का कहना है कि उन्हें लंबे समय तक यह जानकारी ही नहीं थी कि उनकी पुश्तैनी जमीन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा किसी और के नाम हो चुका है। व्यक्ति बोला- एसडीएम मैडम खुद जमीन मांगने आई थीं
मामले में सबसे सनसनीखेज आरोप जुन्नारदेव एसडीएम कामिनी ठाकुर को लेकर लगाए गए हैं। पीड़ित परिवार के सदस्य बिसन लाल भारती का कहना है कि कुछ समय पहले एसडीएम कामिनी ठाकुर स्वयं उनके घर पहुंची थीं और जमीन बेचने की बात कह रही थीं। परिवार ने साफ मना कर दिया था, क्योंकि यही जमीन उनके जीवनयापन और खेती का मुख्य साधन थी। परिवार का आरोप है कि जमीन बेचने से इनकार करने के बाद पूरी साजिश रची गई और बाद में प्रशासनिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए जमीन का बंटवारा और रजिस्ट्री करवा दी गई। हालांकि, इन आरोपों को लेकर संबंधित अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पूरे मामले में उठ रहे गंभीर सवाल
यह मामला सामने आने के बाद कई बड़े सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित अधिकारियों और उनके परिजनों ने जमीन खरीदी से पहले शासन से अनुमति ली थी? नियमों के मुताबिक कोई भी अधिकारी अपने पदस्थ क्षेत्र में सीधे या परोक्ष रूप से जमीन खरीदने से पहले शासन को जानकारी देने और अनुमति लेने के लिए बाध्य होता है। इसके अलावा यह भी सवाल उठ रहा है कि अलग-अलग स्थानों से जुड़े तीन लोगों ने एक साथ एक ही जमीन खरीदने में इतनी रुचि क्यों दिखाई? परिवार का यह भी आरोप है कि जब वे शिकायत लेकर परासिया तहसीलदार के पास पहुंचे, तो उन्होंने सुनवाई से ही इनकार कर दिया। एक अन्य बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन ने जांच तो शुरू की, लेकिन जांच का दायरा केवल रजिस्ट्री तक सीमित रखा गया, जबकि परिवार का दावा है कि असली फर्जीवाड़ा बंटवारे और सीमांकन की प्रक्रिया में हुआ है। प्रशासन की जांच में क्या सामने आया?
मामला कलेक्टर की जनसुनवाई तक पहुंचने के बाद प्रशासन हरकत में आया। छिंदवाड़ा एडीएम एवं जांच अधिकारी धीरेंद्र सिंह को मामले की जांच सौंपी गई। धीरेंद्र सिंह ने स्वीकार किया कि प्रारंभिक जांच में बीएमओ जितेंद्र शाह और तत्कालीन प्रभारी तहसीलदार की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। उन्होंने बताया कि दोनों को शासकीय अनुमति से संबंधित नोटिस जारी किए गए हैं। हालांकि, एसडीएम को नोटिस नहीं दिए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि जमीन उनके पिता के नाम खरीदी गई है, इसलिए सीधे तौर पर नोटिस जारी नहीं किया गया। लेकिन यदि जांच में प्रभाव या भूमिका सामने आती है तो आगे कार्रवाई संभव है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी हुआ सक्रिय
यह मामला अब जिला स्तर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। दैनिक भास्कर द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के वरिष्ठ सलाहकार प्रकाश उइके ने इसे बेहद गंभीर मामला बताया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के एक सदस्य को बुलाया गया है, जिनकी बाइट (प्रतिक्रिया) भी रिपोर्ट में शामिल की गई है। उन्होंने कहा कि यह प्रकरण सीधे तौर पर आदिवासी समाज के शोषण और प्रशासनिक प्रभाव के दुरुपयोग से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। आयोग जल्द ही इस मामले पर उच्च स्तरीय चर्चा कर जांच के आदेश जारी कर सकता है। आयोग ने संकेत दिए हैं कि यदि आरोप सही पाए गए तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में जब जमीन खरीदने वाले दिलीप सिंह की बेटी और वर्तमान एसडीएम जुन्नारदेव से बात करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कैमरे के सामने आने से इनकार कर दिया। वहीं, ग्वालियर में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे जितेंद्र शाह से संपर्क नहीं हो सका। इधर प्रियंका वालरे के पति और प्रभारी तहसीलदार उमराज वालरे का कहना है कि जमीन खरीदने की पूरी प्रक्रिया नियमानुसार और वैधानिक तरीके से की गई थी। न्याय की आस में आदिवासी परिवार
फिलहाल पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है। परिवार ने मुख्यमंत्री, राज्यपाल और जिला प्रशासन को शिकायत भेजी है। परिवार का कहना है कि उनकी पुश्तैनी जमीन छल और दबाव के जरिए उनसे छीनी गई है और उन्हें अब भी उम्मीद है कि प्रशासन उन्हें न्याय दिलाएगा।
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6.60 करोड़ की बेशकीमती जमीन महज 6 लाख में बिकी: SDM, BMO और तहसीलदार के रिश्तेदारों ने ई-केवाईसी के नाम पर किया ‘खेला’ – Chhindwara News
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