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OPEC+ ने अगस्त 2026 से लगातार तीसरे महीने रोजाना 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त कच्चा तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है. इस फैसले के बाद कच्चे तेल की कीमतों में हल्की गिरावट देखने को मिली है. भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह राहत की खबर हो सकती है, क्योंकि लंबे समय तक कीमतें कम रहने पर महंगाई और पेट्रोल-डीजल की लागत पर असर पड़ सकता है. हालांकि, आगे तेल की कीमतें ग्लोबल मांग, सप्लाई और पश्चिम एशिया की जियो-पॉलिटिकल स्थिति पर निर्भर करेंगी.
रविवार को हुई OPEC+ देशों की बैठक में यह फैसला लिया गया है.
दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों के ग्रुप OPEC+ ने एक बार फिर तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है. ग्रुप ने तय किया है कि अगस्त 2026 से रोजाना 1.88 लाख बैरल (1,88,000 बैरल प्रति दिन) अतिरिक्त कच्चा तेल बाजार में लाया जाएगा. यह लगातार तीसरा महीना है, जब OPEC+ ने उत्पादन बढ़ाने का फैसला लिया है. इससे दुनिया में तेल की सप्लाई बढ़ने की उम्मीद है, जिसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है.
रविवार को हुई OPEC+ देशों की बैठक में यह फैसला लिया गया है. इससे पहले जून और जुलाई में भी उत्पादन को इसी मात्रा यानी 1.88 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ाया गया था. इस फैसले को सऊदी अरब, रूस और समूह के अन्य सदस्य देशों का समर्थन मिला. OPEC+ का कहना है कि ग्लोबल बाजार की जरूरत को देखते हुए उत्पादन बढ़ाया जा रहा है. हालांकि, जरूरत पड़ने पर भविष्य में उत्पादन घटाने का फैसला भी लिया जा सकता है.
तेल की कीमतों में आई हल्की गिरावट
उत्पादन बढ़ाने के फैसले के बाद सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में हल्की गिरावट दर्ज की गई. ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 71.88 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि WTI (वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट) की कीमत करीब 68.58 डॉलर प्रति बैरल रही. एक्सपर्ट्स का मानना है कि बाजार में ज्यादा तेल आने की उम्मीद से कीमतों पर दबाव बना है. हालांकि, पश्चिम एशिया में तनाव और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों की वजह से कीमतों में बड़ा बदलाव अभी नहीं दिख रहा है.
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का सीधा फायदा देश को मिल सकता है. अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल की लागत पर भी असर पड़ सकता है. इससे महंगाई को कंट्रोल रखने में मदद मिल सकती है. हालांकि, पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर ही निर्भर नहीं करतीं. टैक्स, रुपये-डॉलर की विनिमय दर और सरकारी नीतियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं.
आगे क्या रह सकता है रुख?
हाल के महीनों में खाड़ी देशों और रूस से तेल की सप्लाई बढ़ी है. हालांकि, कुछ क्षेत्रों में जियो-पॉलिटिकल टेंशन और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण उत्पादन और निर्यात अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं. मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि उत्पादन बढ़ाने की घोषणा के बावजूद वास्तविक ग्लोबल बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी. अगर ग्लोबल मांग कमजोर रहती है और उत्पादन बढ़ता है, तो आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है.
फिलहाल OPEC+ ने साफ किया है कि वह बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखेगा और जरूरत के मुताबिक उत्पादन बढ़ाने या घटाने का फैसला करेगा. ऐसे में आने वाले महीनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक ग्लोबल मांग और सप्लाई पर निर्भर करेगी.
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यशस्वी यादव एक अनुभवी बिजनेस राइटर हैं, जिन्हें मीडिया इंडस्ट्री में दो साल का अनुभव है। ये नेटवर्क18 के साथ मनी सेक्शन में सब-एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। यशस्वी का फोकस बिजनेस और फाइनेंस से जुड़ी खबरों को रिस…और पढ़ें

