Sunday, June 14, 2026
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लाल चीटियों की चटनी… भारत की ये पारंपरिक डिश कहां खाई जाता है?


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भारत की पारंपरिक रेसिपीज में लाल चीटियों की चटनी एक ऐसी डिश है, जिसका नाम सुनकर लोग हैरान रह जाते हैं. इसे छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में खाया जाता है. कई आदिवासी समुदायों में यह चटनी सदियों से बनाई जाती रही है. अपने अनोखे खट्टे-तीखे स्वाद और सांस्कृतिक महत्व की वजह से यह आज देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के फूड लवर्स का ध्यान आकर्षित कर रही है.

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लाल चींटियों की चटनी.

भारत के अलग-अलग राज्यों में कई ऐसी पारंपरिक रेसिपीज हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. ऐसी ही एक अनोखी डिश है लाल चीटियों की चटनी, जिसे खासतौर पर छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के कुछ आदिवासी समुदायों में बनाया और खाया जाता है. यह चटनी अपने खट्टे-तीखे स्वाद और सांस्कृतिक महत्व के कारण वर्षों से स्थानीय खानपान का हिस्सा रही है. यह चटनी आज फूड ट्रैवलर्स और सोशल मीडिया के कारण दुनिया भर में चर्चा का विषय बन रही है.

इस चटनी को बनाने के लिए लाल चींटियों और उनके अंडों का इस्तेमाल किया जाता है. सबसे पहले इन्हें सावधानी से इकट्ठा कर साफ किया जाता है. इसके बाद लहसुन, अदरक, हरी मिर्च, नमक और स्थानीय मसालों के साथ पीसकर चटनी तैयार की जाती है. तैयार चटनी का स्वाद खट्टा, तीखा और हल्का चटपटा होता है. इसका खट्टापन मुख्य रूप से चींटियों में पाए जाने वाले प्राकृतिक अम्लीय तत्वों से आता है, जो इसे अन्य चटनियों से अलग बनाता है.

सिर्फ स्वाद नहीं, सांस्कृतिक पहचान भी
आदिवासी समुदायों में यह चटनी केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों के उपयोग का उदाहरण मानी जाती है. पीढ़ियों से लोग इसे अपने भोजन का हिस्सा बनाते आए हैं. कई क्षेत्रों में त्योहारों, मेलों और सामुदायिक आयोजनों में भी इसका विशेष महत्व देखा जाता है. स्थानीय लोगों के लिए यह डिश उनकी पहचान और परंपरा से जुड़ी हुई है, इसलिए इसे केवल “अजीब खाना” कहकर समझना सही नहीं होगा.

क्या कहती है वैज्ञानिक जानकारी?
कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि लाल चींटियों में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, जिंक और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व मौजूद हो सकते हैं. इसके अलावा इनमें कुछ जैव सक्रिय यौगिक (Bioactive Compounds) भी पाए जाते हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इनके स्वास्थ्य लाभों को लेकर अभी और व्यापक रिसर्च की जरूरत है. इसलिए इसे किसी चिकित्सा उपचार या चमत्कारी खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

GI टैग मिलने से बढ़ी पहचान
ओडिशा की प्रसिद्ध लाल चींटी चटनी ‘काई चटनी’ को 2024 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला. इससे इस पारंपरिक डिश को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली. GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान और पारंपरिक महत्व को मान्यता देता है. सोशल मीडिया और फूड ट्रैवल कंटेंट के दौर में लोग नई और अनोखी डिशेज के बारे में जानना चाहते हैं. लाल चीटियों की चटनी इसी वजह से कई बार चर्चा का विषय बन चुकी है.

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Vividha SinghSub Editor

विविधा सिंह इस समय News18 हिंदी के डिजिटल मीडिया में सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं. वह लाइफस्टाइल बीट में हेल्थ, फूड, ट्रैवल, फैशन और टिप्स एंड ट्रिक्स जैसी स्टोरीज कवर करती हैं. कंटेंट लिखने और उसे आसान व …और पढ़ें



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