Tuesday, May 26, 2026
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ट्रम्प मुस्लिम देशों से बोले- इजराइल से दोस्ती करें: पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ेंगी, वह इजराइल को देश भी नहीं मानता


वॉशिंगटन डीसी6 घंटे पहले

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ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ रिश्ते बेहतर करने को कहा है। उन्होंने शनिवार को सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन के नेताओं के साथ वर्चुअल मीटिंग की।

ट्रम्प ने सोमवार को सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए लिखा कि अमेरिका ने ईरान संकट को सुलझाने के लिए बहुत मेहनत की है। अब जरूरी है कि ये सभी देश अब्राहम अकॉर्ड्स (समझौते) में शामिल हों। यानी इजराइल के साथ रिश्ते बेहतर करें।

ट्रम्प ने कहा कि UAE और बहरीन पहले से अब्राहम समझौते का हिस्सा हैं। कुछ देशों के पास इसमें शामिल न होने की ‘एक-दो वजहें’ हो सकती हैं, लेकिन ज्यादातर देशों को इसके लिए तैयार होना चाहिए।

दरअसल, पाकिस्तान समेत इन मुस्लिम देशों ने अभी तक इजराइल को मान्यता नहीं दी है। ये देश इजराइल के साथ व्यापारिक और डिप्लोमेटिक से लेकर किसी भी तरह का रिश्ता भी नहीं रखते हैं।

ट्रम्प बोले- इजराइल से रिश्ते सुधारने पर फायदा होगा

ट्रम्प ने कहा कि अगर ये देश इजराइल के साथ रिश्ते बनाते हैं तो यह समझौता इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में बदल सकता है। उन्होंने दावा किया कि अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़े देशों को आर्थिक, व्यापारिक और सामाजिक स्तर पर बड़ा फायदा हुआ है।

उन्होंने कहा कि UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान को इससे खूब फायदा मिला है। उन्होंने इसे दुनिया का सबसे सम्मानित और सबसे महत्वपूर्ण समझौता बताया।

ट्रम्प ने दावा किया कि अब्राहम अकॉर्ड्स पश्चिम एशिया को 5000 साल में पहली बार असली ताकत, शांति और आर्थिक मजबूती दे सकता है। सऊदी अरब और कतर को अब्राहम अकॉर्ड्स साइन करके इसकी शुरुआत करनी चाहिए। बाकी देशों को भी ऐसा करना चाहिए।

ट्रम्प की सलाह पर मीटिंग में चुप्पी छाई

इससे पहले अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस ने ट्रम्प की मुस्लिम देशों के नेताओं के साथ मीटिंग का दावा किया था। रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने शनिवार को मोहम्मद बिन सलमान (सऊदी), मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (UAE), तमिम बिन हमद अल थानी (कतर), आसिम मुनीर (पाकिस्तान), रजब तैयब एर्दोआन (तुर्किए), अब्देल फतह अल-सिसी(मिस्र) समेत कई नेताओं से बातचीत की।

ट्रम्प ने जब इन नेताओं से इजराइल के साथ रिश्ते सुधारने को कहा तो कॉल पर कुछ सेकेंड के लिए चुप्पी छा गई। खासकर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की तरफ से कोई तत्काल प्रतिक्रिया नहीं आई।

माहौल इतना शांत हो गया था कि ट्रम्प ने मजाक में पूछ लिया, “क्या आप लोग अभी भी फोन लाइन पर हैं?” आखिर में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को निर्देश दिया है कि वे इन देशों को अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल करने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करें और सफलतापूर्वक पूरी करें।

ट्रम्प बोले- ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़ सकता है

ट्रम्प के पोस्ट की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उन्होंने इसमें ईरान को भी जोड़ लिया। ट्रम्प ने कहा कि अगर ईरान उनके साथ समझौता करता है, तो उसे भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनाना ‘सम्मान’ की बात होगी। ट्रम्प ने रविवार को भी कहा था कि हो सकता है कि ईरान भी अब्राहम समझौते का हिस्सा बन जाए।

ईरान दशकों से इजराइल को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। ईरान उन अरब देशों का भी विरोध करता रहा है जिन्होंने इजराइल के साथ रिश्ते बनाए। इसलिए ट्रम्प का यह सुझाव बेहद विवादित माना जा रहा है।

अमेरिकी समर्थक गठबंधन बनाना चाहते हैं ट्रम्प

एक्सियोस के मुताबिक ट्रम्प की सबसे बड़ी रणनीतिक कोशिश यह है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद पश्चिम एशिया में एक नया अमेरिकी समर्थक गठबंधन तैयार किया जाए, जिसमें इजराइल और प्रमुख अरब देश एक साथ हों।

दशकों तक अरब देशों की नीति थी कि फिलिस्तीन मुद्दा सुलझे बिना इजराइल को मान्यता नहीं दी जाएगी। ट्रम्प की कोशिशों के बाद 2020 में अब्राहम समझौते ने उस पुरानी नीति को तोड़ दिया। इसके तहत UAE, बहरीन और मोरक्को जैसे देशों ने इजराइल के साथ आधिकारिक संबंध बनाए।

गाजा जंग के बाद इजराइल के खिलाफ नाराजगी बढ़ी

अब्राहम समझौते का मकसद सिर्फ राजनयिक संबंध नहीं है। इसके पीछे सुरक्षा, व्यापार, तकनीक, रक्षा सहयोग और सबसे बढ़कर ईरान को लेकर साझा चिंता है। ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में इसे पश्चिम एशिया में नई रणनीतिक व्यवस्था के रूप में पेश किया था।

अब ट्रम्प चाहते हैं कि इस समझौते का दायरा और बढ़े। इसमें सबसे बड़ी बाधा सऊदी अरब और पाकिस्तान हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले इजराइल के साथ बेहतर रिश्ते को लेकर लगभग तैयार हो चुके थे, लेकिन गाजा युद्ध के बाद हालात बदल गए।

अरब देशों में इजराइल के खिलाफ गुस्सा बढ़ा है और फिलिस्तीन का मुद्दा फिर केंद्र में आ गया है। सऊदी अरब ने साफ कहा है कि वह तभी इजराइल से रिश्ते सामान्य करेगा जब फिलिस्तीनी राष्ट्र बनाने की दिशा में स्पष्ट और स्थायी कदम उठेंगे। इजराइल इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं दिखता।

पश्चिम एशिया की जमीन पर स्थिति बेहद जटिल है। यह इलाका राजनीतिक और धार्मिक तनाव से भरा हुआ है। गाजा युद्ध ने अरब दुनिया में भारी गुस्सा पैदा किया है। ऐसे माहौल में किसी भी अरब सरकार के लिए इजराइल से खुले रिश्ते बनाना आसान नहीं है।

मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने 1979 में इजराइल को मान्यता दी थी। इसके बाद सादात को अरब दुनिया में भारी आलोचना झेलनी पड़ी। कई अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार कर दिया था। दो साल बाद 1981 में उनकी हत्या कर दी गई।

मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने 1979 में इजराइल को मान्यता दी थी। इसके बाद सादात को अरब दुनिया में भारी आलोचना झेलनी पड़ी। कई अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार कर दिया था। दो साल बाद 1981 में उनकी हत्या कर दी गई।

पाकिस्तान के लिए अब्राहम समझौते में शामिल होना मुश्किल

पाकिस्तान के लिए भी अब्राहम समझौते में शामिल होने का मामला बेहद संवेदनशील और राजनीतिक रूप से मुश्किल है। पाकिस्तान लंबे समय से खुद को फिलिस्तीन के समर्थक देश के तौर पर पेश करता रहा है। वहां आम जनता के बीच फिलिस्तीन का मुद्दा भावनात्मक और धार्मिक दोनों स्तर पर बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है।

ऐसे में अगर पाकिस्तान बिना फिलिस्तीनी राष्ट्र के स्पष्ट समाधान के इजराइल को मान्यता देता है, तो यह देश के अंदर भारी राजनीतिक विस्फोट का कारण बन सकता है। पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर कहता रहा है कि फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान से पहले वह इजराइल को मान्यता नहीं देगा।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने 25 सितंबर 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में मुलाकात की थी।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने 25 सितंबर 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में मुलाकात की थी।

इमरान खान ने शामिल होने से इनकार किया था

ट्रम्प ने पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान को अब्राहम समझौते से जोड़ने की कोशिश हुई थी। लेकिन तब के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि ऐसा करना पाकिस्तान की पुरानी दो-राष्ट्र समाधान नीति के खिलाफ होगा।

अब्राहम समझौते पर दस्तखत के कुछ महीने बाद इमरान खान ने दावा किया था कि उनकी सरकार पर अमेरिका और दूसरे ‘मित्र’ देशों की तरफ से इजराइल से संबंध सामान्य करने का दबाव डाला गया। लेकिन वे जायनिस्टों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। तब यह माना गया था कि वे मित्र देश सऊदी अरब और UAE हैं। हालांकि इमरान ने कभी उन देशों का नाम नहीं लिया।

इससे बाद साल 2022 में सत्ता से हटाए जाने के बाद इमरान खान ने आरोप लगाया था कि अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत लाई गई शहबाज शरीफ सरकार को इजराइल को मान्यता देने का काम सौंपा गया है।

इजराइल को मान्यता देने के खिलाफ थे जिन्ना

पाकिस्तान में यह धारणा भी मजबूत है कि इजराइल को मान्यता देना देश की स्थापना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने कभी इजराइल के गठन का विरोध करते हुए उसे अरब दुनिया के दिल में घोंपा गया खंजर कहा था।

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान फिलिस्तीन और कश्मीर के मुद्दों को अक्सर एक-दूसरे से जोड़कर देखता रहा है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना करता है और फिलिस्तीन के समर्थन को भी उसी नैरेटिव का हिस्सा बनाता है। ऐसे में अगर वह फिलिस्तीन मुद्दे पर अपना रुख बदलता है तो कश्मीर पर उसका नैतिक तर्क कमजोर पड़ सकता है।

इजराइल को मान्यता देना राजनीतिक आत्महत्या जैसा

पाकिस्तान की सेना और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार दोनों यह अच्छी तरह समझते हैं कि इजराइल से औपचारिक संबंध बनाना राजनीतिक आत्महत्या जैसा कदम साबित हो सकता है।

इमरान खान की गिरफ्तारी के बावजूद उनकी पार्टी पाकिस्तान की सबसे लोकप्रिय विपक्षी ताकत बनी हुई है। यही वजह है कि शहबाज सरकार किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहती है जिससे विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल जाए।

हालांकि हाल के महीनों में पाकिस्तान धीरे-धीरे अमेरिका के साथ कुछ संवेदनशील पहलों में शामिल होता दिखा है। 2026 की शुरुआत में पाकिस्तान ट्रम्प के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल हुआ था, जिसका काम गाजा में युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और प्रशासनिक व्यवस्था पर काम करना था।

इस फैसले के बाद पाकिस्तान में काफी आलोचना हुई। तब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने तुरंत सफाई दी कि इसका अब्राहम समझौते से कोई लेना-देना नहीं है और यह केवल मानवीय सहायता से जुड़ी पहल है।

पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा रहे ट्रम्प

अब ट्रम्प के ताजा दबाव ने पाकिस्तान की मुश्किल और बढ़ा दी है। पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में वह अमेरिकी प्रस्ताव को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकता।

स्थिति और ज्यादा गंभीर तब हो गई जब अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और दूसरे मुस्लिम देशों को खुली चेतावनी दे दी। ग्राहम ने कहा कि अगर ये देश ट्रम्प के बताए रास्ते पर नहीं चलते तो भविष्य के रिश्तों पर गंभीर असर पड़ सकता है और शांति प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाएगा। यानी पाकिस्तान अब ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर रास्ता मुश्किल दिखाई देता है।

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