Friday, May 15, 2026
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धवन ही सुनाते थे इंदिरा के तमाम निर्देश, कैसे बन गए थे स्टेनो टाइपिस्ट से PM के ताकतवर सिपहसालार


आर.के. धवन को सियासी हलकों में आर.के.डी. नाम से जाना जाता था. वे नेहरू-गांधी परिवार के एक ऐसे विश्वस्त सहयोगी थे, जो हर काम को बखूबी अंजाम दे सकते थे, फिर वह काम चौकीदारी का हो या किसी को किनारे लगाने का. इसी वजह से उन्होंने इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया तक, गांधी परिवार के हर सदस्य का भरोसा अर्जित कर रखा था.

1970 के दशक की शुरुआत में धवन जब इंदिरा गांधी के स्टेनो टाइपिस्ट हुआ करते थे, तभी प्रधानमंत्री के संदेशवाहक के तौर पर ख्यात हो गए थे. इंदिरा गांधी अपने मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्य के पार्टी प्रमुखों को सीधे निर्देश देने से बचती थीं और उनके अप्रिय तथा कभी-कभी बेहद अजीब फैसलों को उन तक पहुंचाने का काम धवन ही किया करते थे. इसके पीछे रणनीति यह थी कि अगर कुछ गलत हुआ तो दोष धवन अपने सिर पर ले लेंगे. हालांकि इस व्यवस्था ने उन्हें बेहद ताकतवर बना दिया था, इतने ताकतवर कि कांग्रेस शासित कई राज्यों के विधिवत निर्वाचित मुख्यमंत्रियों का कुर्सी पर बने रहना या जाना उनकी मर्जी पर निर्भर करता था.

संजय के लिए लगवाई थी विशेष हॉटलाइन

संजय गांधी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पहचानने का श्रेय धवन को ही जाता है. युवा संजय के रोल्स रॉयस में इंटर्नशिप पूरी करके लौटने के बाद इंदिरा गांधी के निजी सहायक के तौर पर धवन ने उन्हें कांग्रेस के दिग्गजों से मिलवाना शुरू कर दिया. उन्होंने कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह सलाह भी दी कि इंदिरा गांधी की उपस्थिति में वे संजय की प्रशंसा किया करें. इमरजेंसी लागू होने के समय तक तो धवन पूरी तरह से संजय का भरोसा जीत चुके थे. आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आवास पर संजय के कमरे में एक विशेष टेलीफोन लाइन लगाई गई थी. इसे लगवाने में भी धवन का ही हाथ था. धवन उस विशेष टेलीफोन लाइन के जरिए कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, पुलिस कमिश्नरों, दिल्ली के उपराज्यपाल तथा पार्टी के प्रभावी पदाधिकारियों व सरकारी अधिकारियों के संपर्क में रहते थे.

राजीव ने पहले हटाया, फिर बुलाया

इंदिरा गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले ठक्कर आयोग की जांच रिपोर्ट की आंच धवन तक भी पहुंची थी. दरअसल, धवन उस समय इंदिरा गांधी से महज एक कदम पीछे थे, जब दो सुरक्षाकर्मियों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने प्रधानमंत्री को गोलियों से छलनी कर दिया था. एक अखबार में प्रकाशित एक लीक रिपोर्ट के मुताबिक शक की सुई धवन की तरफ इशारा कर रही थी. इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने धवन को सभी प्रमुख पदों से हटाने में जरा भी देर नहीं लगाई. यह संभवत: पहला मौका था, जब धवन गांधी परिवार से दूर हुए थे. हालांकि 1988 में बोफोर्स विवाद और वी.पी. सिंह की बगावत ने राजीव गांधी की मुश्किलें बढ़ा दीं. तब एक दिन राजीव ने उन्हें बुलाया. अरुण नेहरू का साथ छोड़ने से सियासी तौर पर कमजोर पड़े राजीव गांधी को सहारा देने के लिए धवन फिर सक्रिय हो गए.

सोनिया भी रहीं उनकी ‘ऋणी’!

परिवार के प्रति धवन के सेवाभाव की गवाह रहीं सोनिया गांधी के पास उनकी ‘ऋणी’ होने के और भी कारण थे. 15 मई 1999 को जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई तो उसमें शरद पवार और पी.ए. संगमा की बगावत ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया. विदेशी मूल के मुद्दे पर संगमा के सुर धीरे-धीरे तेज होते गए. उस समय बैठक में प्रणब मुखर्जी, मनमोहन सिंह, जितेंद्र प्रसाद, माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, अर्जुन सिंह, अंबिका सोनी और अन्य तमाम ‘वफादार’ संगमा की कड़वी बातें सुनते रहे. कोई एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. इसी बीच धवन ने संगमा से कहा, ‘भाई, आप भाजपा-आरएसएस का एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं.’ इस बगावत के सूत्रधार रहे पवार के बगल में बैठे धवन ने सोनिया गांधी से कहा, ‘मैडम, इस लड़ाई में आप अकेली नहीं हैं. हम सब आपके साथ हैं.’ कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने उस समय ही इस लेखक को बताया था कि धवन की निष्ठा ने सोनिया पर गहरी छाप छोड़ी. वह सोचती रहीं कि संगमा का विरोध कर उन्हें चुप कराने का जो काम धवन ने किया, वो सिंधिया, मुखर्जी और सोनी क्यों नहीं कर पाए.

कभी छुट्‌टी नहीं ली…

कांग्रेस के भीतर ही कई लोगों को धवन की प्रतिष्ठा और पहुंच से रश्क होता था, लेकिन इस मुकाम को हासिल करने के लिए उन्होंने जितनी मेहनत की और जितना त्याग किया, उसकी दाद देने वाले भी कम नहीं थे. इंदिरा गांधी के करीबी सहयोगी रहे यशपाल कपूर अपने रिश्तेदार धवन को 1963 में प्रधानमंत्री आवास लेकर आए थे. उसके बाद से धवन ने एक भी दिन छुट्टी नहीं ली. वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार जनार्दन ठाकुर से बात करते हुए धवन ने कहा था, ‘मैं साल के सभी 365 दिन सुबह आठ बजे से लेकर रात को प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) के सोने जाने तक उनके साथ ही रहता हूं… कोई आकस्मिक अवकाश नहीं, कोई अर्जित अवकाश नहीं, कोई छुट्टी नहीं….’

निजी जिंदगी में भी पूरी वफादारी

निजी जिंदगी में भी धवन ने पूरी तरह वफादारी निभाई. 74 साल की उम्र तक कुंवारे रहे धवन ने अक्टूबर 2011 में लंबे समय से अपनी दोस्त रहीं 59 वर्षीया अचला मोहन से शादी की. वे और अचला 1970 के दशक से एक-दूसरे को जानते थे. अचला की शादी एक पायलट के साथ हुई थी और वह कनाडा चली गई थीं, लेकिन 1990 में उनका तलाक हो गया. तलाक के बाद से ही कांग्रेस पार्टी के कई लोग अचला और धवन को एक जोड़े के तौर पर ही देखते थे. कोई विवाह समारोह हो या कोई सामाजिक कार्यक्रम, दोनों एक साथ ही आते-जाते थे. इस उम्र में अचला से शादी करने की वजह के बारे में धवन ने पत्रकार सरीन को बताया था कि एक बार वे वायरल बुखार से पीड़ित थे. अचला उनकी देखभाल कर रही थीं, लेकिन उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई. अस्पताल में जोर दिया गया कि कोई नजदीकी रिश्तेदार ही आवश्यक सहमति-प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर सकता है. बकौल धवन, ‘मुझे ये बहुत बुरा लग रहा था कि उन्होंने मेरा इतना ख्याल रखा, लेकिन फॉर्म पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती थीं.’

वो ‘सूची’ जारी करने की देते रहे धमकी

21 महीनों तक आपातकाल लागू रहने के दौरान जब कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया, तब धवन ने बुजुर्ग और बीमार नेताओं को कुछ रियायतें दिलाने में अहम भूमिका निभाईं. हालांकि, यह सब उन्होंने किसी मानवता के नाते नहीं किया था, बल्कि राहत के इच्छुक लोगों से एक कागज पर हस्ताक्षर कराए, जिसमें यह वाक्य लिखा हुआ था: ‘हमें बीस सूत्रीय कार्यक्रम पर विश्वास है.’ बीस सूत्रीय कार्यक्रम को स्वीकार करना एक तरह से राजनीतिक नजरिये से इंदिरा गांधी के आगे समर्पण करने जैसा था. संसद के अंदर और बाहर धवन अक्सर ऐसा ‘समझौता’ करने वाले लोगों को सूची सार्वजनिक करने की धमकी भी देते रहते थे. उन्होंने इस लेखक से भी सूची साझा करने का वादा किया था. लेकिन नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था. उससे पहले ही धवन का 6 अगस्त 2018 को निधन हो गया.



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