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भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा है कि बाहरी दबावों से निपटने के लिए आरबीआई को रुपये में कुछ और गिरावट आने देनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर ब्याज दर बढ़ाने के बजाय पहले नकदी प्रबंधन जैसे कदम उठाने चाहिए. उनका मानना है कि विनिमय दर को बचाने के लिए मौद्रिक नीति का इस्तेमाल सिर्फ आखिरी विकल्प होना चाहिए. पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रुपया लगातार दबाव में है, ऐसे में आरबीआई के सामने महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बन गया है.
उन्होंने कहा कि फिलहाल आरबीआई को जल्दबाजी में दरें बढ़ाने के बजाय महंगाई के रुझान पर नजर रखनी चाहिए. (File Photo: PTI)
नई दिल्ली. भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा है कि मौजूदा वैश्विक हालात में आरबीआई को रुपये को बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से थोड़ा और कमजोर होने देना चाहिए. उन्होंने कहा कि कमजोर रुपया कई बार बाहरी आर्थिक झटकों को झेलने में मदद करता है और हर हाल में किसी तय स्तर को बचाने की कोशिश करना सही रणनीति नहीं होती. उनके मुताबिक केंद्रीय बैंक को विनिमय दर को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल केवल आखिरी विकल्प के तौर पर करना चाहिए.
सुब्बाराव ने समाचार एजेंसी भाषा से बातचीत में कहा कि इस समय आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कैसे बनाए. अगर आरबीआई बहुत आक्रामक तरीके से ब्याज दर बढ़ाता है, तो इससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है. वहीं लगातार दर कटौती करने से महंगाई और रुपये दोनों पर दबाव बढ़ सकता है. उन्होंने कहा कि फिलहाल आरबीआई को जल्दबाजी में दरें बढ़ाने के बजाय महंगाई के रुझान पर नजर रखनी चाहिए.
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा दबाव
भू राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया संकट के कारण रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है. इस महीने की शुरुआत में रुपया डॉलर के मुकाबले 97.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था. संकट शुरू होने के बाद से रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब पांच प्रतिशत कमजोर हुआ है. वहीं साल 2026 की शुरुआत से अब तक इसमें 6.1 प्रतिशत और पिछले एक साल में 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है.
लिक्विडिटी मैनेजमेंट को बताया बेहतर विकल्प
डी सुब्बाराव का मानना है कि अगर महंगाई तेजी से बढ़ती भी है, तब भी आरबीआई को सीधे रेपो रेट बढ़ाने के बजाय पहले लिक्विडिटी मैनेजमेंट यानी नकदी नियंत्रण जैसे कदमों पर जोर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करके भी महंगाई के दबाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. इससे आर्थिक विकास पर भी उतना नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा जितना सीधे ब्याज दर बढ़ाने से पड़ता है.
तीन से पांच जून के बीच होगी अहम बैठक
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक 3 से 5 जून के बीच होने वाली है. इस बैठक में रेपो रेट समेत कई अहम नीतिगत फैसले लिए जाएंगे. फिलहाल रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर है. केंद्रीय बैंक पिछले साल से अब तक इसमें कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती कर चुका है. ऐसे में बाजार की नजर अब इस बात पर टिकी है कि बढ़ते वैश्विक दबाव और कमजोर रुपये के बीच आरबीआई आगे क्या रुख अपनाता है.
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मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…और पढ़ें

