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बॉलीवुड में जब बड़े बजट, वीएफएक्स और विदेशी लोकेशन्स का चलन नहीं था, तब एक निर्देशक ने जुनून और जज्बे के दम पर इतिहास रच दिया. सीमित संसाधनों के बावजूद एक ऐसे एक्शन सीन को अंजाम दिया गया, जिसके लिए करीब 50 हजार लोगों की असली भीड़ जुटाई गई. सीन को रियल दिखाने के लिए हीरो पर सच में पत्थर फिंकवाए गए, बिना किसी बॉडी डबल या खास तकनीक के. यह रिस्क भरा फैसला रंग लाया और कम बजट में बनी यह फिल्म दर्शकों के दिलों पर छा गई. नतीजा ये हुआ कि देशभर में तूफानी कमाई और 132 करोड़ का आंकड़ा पार किया.
नई दिल्ली. बॉलीवुड की कल्ट क्लासिक फिल्मों की लिस्ट में सनी देओल की 2001 की पीरियड एक्शन ड्रामा का नाम हमेशा ऊपर आता है. यह फिल्म न केवल रिलीज के समय कमर्शियल रूप से सुपरहिट साबित हुई, बल्कि जून 2023 में री-रिलीज होने पर भी थिएटर्स में दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी. लोग इस एक्शन से भरपूर फिल्म को बड़े पर्दे पर दोबारा देखने के लिए उत्साहित थे, खासकर इसके सीक्वल की रिलीज से पहले. क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि हम किस फिल्म की बात कर रहे हैं?

बात कर रहे हैं सनी देओल और अमीषा पटेल की 2001 की पीरियड एक्शन रोमांटिक ड्रामा ‘गदर: एक प्रेम कथा’ की. रिलीज के दो दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह फिल्म अपनी ड्रामैटिक इंटेंसिटी, एक्शन सीक्वेंस और परफॉर्मेंस के लिए याद की जाती है. फिल्म में लीड पेयर के अलावा अमरीश पुरी, विवेक शौक, लिलेट दुबे और उत्कर्ष शर्मा जैसे कलाकारों ने सपोर्टिंग रोल्स निभाए थे. 18 से 19 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने वर्ल्डवाइड 132 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की और इसे ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर बनी.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि फिल्म के एक्शन सीक्वेंस, खासकर जहां दंगे या हमले दिखाए गए हैं, वे असली भीड़ के साथ शूट किए गए थे और कोई वीएफएक्स इस्तेमाल नहीं किया गया? गदर और गदर 2 के डायरेक्टर अनिल शर्मा ने हाल ही में फिल्म की मेकिंग के बारे में एक दिलचस्प बीटीएस डिटेल शेयर की. उन्होंने बताया कि फिल्म के बड़े-बड़े क्राउड सीन बिना किसी स्पेशल इफेक्ट्स के शूट किए गए थे और इसमें करीब 50,000 असली लोग शामिल थे.
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निर्देशक अनिल शर्मा ने ‘डिजिटल कमेंट्री’ नामक एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में यह हैरान कर देने वाला खुलासा किया. उन्होंने फिल्म निर्माण के पीछे की उन चुनौतियों और जुनून का जिक्र किया, जिसके आगे आज का वीएफएक्स युग भी फीका पड़ जाता है.

फिल्म का बजट मात्र 18-19 करोड़ रुपये था, लेकिन निर्देशक का सपना बहुत बड़ा था. 1947 के बंटवारे के दौर के उस माहौल को पर्दे पर जीवंत करने के लिए उन्हें हजारों लोगों की भीड़ चाहिए थी. आज के जमाने में ऐसे सीन कंप्यूटर ग्राफिक्स से बनाए जाते, लेकिन अनिल शर्मा ने असली रास्ता चुना.

उन्होंने बताया, ‘जब मैं गदर में बंटवारे का सीन कर रहा था तो 40-50 हजार का क्राउड लाना आसान काम नहीं था. यह क्राउड एक्चुअल था, कोई वीएफएक्स नहीं.’ इतनी बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा करना और उन्हें मैनेज करना आर्थिक और लॉजिस्टिक दोनों ही दृष्टि से असंभव सा लगता था. अनिल शर्मा ने इसका अनोखा तरीका निकाला। उन्होंने फिरोजपुर (पंजाब) के स्थानीय विधायक से संपर्क किया और उनकी मदद से आसपास के 25-30 गांवों के सरपंचों की एक बैठक बुलाई.

निर्देशक ने हर सरपंच से एक अपील की. ‘आप अपने गांव से लगभग 2,000 लोग लेकर आइए. हम 1947 की उस दर्दनाक त्रासदी पर फिल्म बना रहे हैं. यह हमारे दिलों के बहुत करीब की कहानी है. हम इन एक्स्ट्रा कलाकारों को पैसे नहीं दे सकते.’ हैरानी की बात यह हुई कि देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत सभी सरपंच और ग्रामीण इसके लिए तैयार हो गए.

अनिल शर्मा के मुताबिक, ‘लोगों ने खुशी-खुशी हां कह दी. शूटिंग के दिन 50-60 हजार लोग जमा हो गए. माहौल ऐसा था जैसे कोई मेला लगा हो. हर सरपंच अपने घर से खाना लेकर आया, लेकिन तापमान इतना ज्यादा था कि मैं सब नहीं खा पाया.’ सीन को फिल्माने के लिए उन्होंने एक्स्ट्रा स्पॉट बॉयज और असिस्टेंट्स बुलाए और एक ही दिन में शूट पूरा कर लिया.

अनिल शर्मा ने गदर के स्टोन-पेल्टिंग सीन के बारे में भी बात की. उन्होंने बताया कि सीन के लिए फैक्ट्री वर्कर्स को बुलाया गया था. टीम ने हजारों डमी स्टोन्स (रबर/फोम) तैयार किए थे, लेकिन जल्दी ही वे खत्म हो गए. उसके बाद चीजें अनएक्सपेक्टेड टर्न ले लीं, क्योंकि लोगों ने असली पत्थर फेंकने शुरू कर दिए, जिससे सेट पर मौजूद लोगों को छाते के पीछे छिपना पड़ा.

सनी देओल समेत सभी इस असली पत्थरबाजी का शिकार हुए. यह सीन एक ही दिन में पूरा किया गया और इसमें नौ कैमरों का इस्तेमाल किया गया ताकि कोई भी एंगल मिस न हो. लगभग 19 करोड़ रुपये के बजट पर बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में 132 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की और इसे ‘ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर’ घोषित किया गया. 2023 में इसकी री-रीलिज भी जबर्दस्त सफल रही, जो इसकी लोकप्रियता का सबूत है.

यह फिल्म न केवल एंटरटेनमेंट का माध्यम बनी, बल्कि पार्टिशन की दर्दनाक यादों को भी जीवंत किया. अनिल शर्मा की मेहनत और क्रिएटिविटी ने इसे एक आइकॉनिक फिल्म बना दिया. आज भी दर्शक इसके डायलॉग्स और सीन्स को याद करते हैं. री-रिलीज में मिली सक्सेस से साबित होता है कि अच्छी कहानियां समय की सीमाओं से परे होती हैं.

