दस दिनों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार केरलम की जनता को अपना खेवनहार मिल गया है. कांग्रेस नेतृत्व ने अंदरूनी तौर पर हुई भारी मशक्कत के पश्चात वी.डी. सतीशन को राज्य का अगला मुख्यमंत्री चुना है. सतीशन का मुख्यमंत्री के रूप में चयन केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि प्रत्येक पार्टी के लिए एक अहम सियासी सबक है. सबक यह कि मुख्यमंत्री जैसे उच्च पद के लिए किसी व्यक्ति का चयन करते वक्त क्या देखा जाना चाहिए. हो सकता है किसी शख्स पर पार्टी नेतृत्व मेहरबान हो या संगठन के भीतर का गणित किसी के पक्ष में हो, लेकिन अंतत: मोहर उसी पर लगनी चाहिए जो जमीनी तौर पर लगातार सक्रिय हो और जिसकी जनता के बीच विश्वसनीयता व कार्यकर्ताओं के मध्य स्वीकार्यता हो. सतीशन के मामले में यही हुआ.
पिछले पांच साल के दौरान उन्होंने जमीन पर जो भारी मेहनत की थी, उन्हें उसका ईनाम मिला है. हाईकमान को उन लोगों की राय के आगे झुकना पड़ा, जो केरलम की सियासी नब्ज को समझते हैं. इसलिए यह केवल सतीशन की जीत नहीं है, के.सी. वेणुगोपाल की हार भी है.
वेणुगोपाल कोई साधारण दावेदार नहीं थे. वे एआईसीसी में संगठन महासचिव हैं, जो स्वाभाविक तौर पर सबसे ताकतवर पद समझा जाता है. फिर उन्हें राहुल गांधी की पसंद भी माना जा रहा था. खबरों की मानें तो कांग्रेस के नवनिर्वाचित विधायकों का एक बड़ा खेमा उनके समर्थन में था. 63 में से 47 विधायक उनके साथ थे. इसके बावजूद वे अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंच सके.
माना जाता है कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनवाने में दिग्विजय सिंह ने तो राजस्थान में अशोक गहलोत को सत्ता की चौखट पर पहुंचाने में अहमद पटेल ने अहम भूमिकाएं निभाईं. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल कथित ढाई-ढाई साल के सत्ता-साझेदारी समझौते के आगे झुकने को तैयार नहीं हुए. कर्नाटक में सिद्धारमैया भी नेतृत्व परिवर्तन के दबावों का लगातार सामना करते हुए टिके हुए हैं. अतीत के इन अनुभवों की पृष्ठभूमि में केरलम का मामला इन सबसे अलग दिखाई देता है. इन उक्त राज्यों में राहुल गांधी अपनी मनवाने में सफल रहे थे, जबकि केरलम में ऐसा नहीं कर सके. अपने पसंदीदा शख्स यानी वेणुगोपाल के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज रखवाने में कामयाब नहीं हो पाए.
कैसे केरलम ने दिल्ली को पीछे हटने पर मजबूर किया?
यूडीएफ की जोरदार जीत (140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटें, जिसमें कांग्रेस को 63 सीटें मिलीं) के बाद पार्टी को तेजी से सरकार गठन की ओर बढ़ना चाहिए था. लेकिन इसके बजाय राज्य में नेतृत्व के सवाल पर सहमति बनाने में उसे 10 दिन लग गए. मौका राजनीतिक मजबूती दिखाने का था, लेकिन दुविधा सिर उठाती नजर आई. किंतु इस देरी ने दो प्रमुख दावेदारों के बीच के अंतर को और स्पष्ट कर दिया.
जहां वेणुगोपाल के पास संगठनात्मक ताकत, दिल्ली तक पहुंच और विधायकों का समर्थन था, वहीं सतीशन के पक्ष में था केवल जनादेश. वे बतौर नेता प्रतिपक्ष वाममोर्चा की पिनराई विजयन सरकार पर लगातार हमले करके एलडीएफ विरोधी नैरेटिव को धार देते रहे. इसलिए सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच ही नहीं, सहयोगी दलों की नजरों में भी यूडीएफ की जीत का मतलब सतीशन के राजनीतिक परिश्रम की जीत से था.
फैसले में देरी होने पर यूडीएफ के सबसे अहम सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता भी खुलकर उनके समर्थन में उतर आए. वायनाड और कोझिकोड में तो ऐसे पोस्टर भी चस्पां हो गए थे, जिनमें राहुल और प्रियंका गांधी को राज्य पर वेणुगोपाल को थोपने के खिलाफ स्पष्ट चेतावनी दी गई थी.
प्रियंका की जीत, राहुल के लिए झटका!
केरलम के इस सियासी फैसले ने गांधी परिवार के भीतर भी शक्ति-संतुलन की नई इबारत लिख दी है. राहुल गांधी जहां वेणुगोपाल के साथ खड़े थे, वहीं सोनिया की सहानुभूति अनुभवी चेन्निथला के प्रति थी. जबकि प्रियंका केरल के जनादेश को समझ रही थीं और उसके अनुरूप सतीशत के पक्ष में डटी रहीं. इस त्रिकोणीय शक्ति संघर्ष में अंततः प्रियंका की राजनीतिक समझदारी भारी पड़ी.
इससे पहले वायनाड की जीत से प्रियंका को संसदीय पहचान मिली थी, लेकिन अब लगता है कि केरल में मुख्यमंत्री के चयन में उनकी भूमिका ने संगठन के भीतर उन्हें ‘किंगमेकर’ वाली जगह पर पहुंचा दिया है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब कांग्रेस में प्रियंका की ताकत राहुल गांधी से अधिक हो रही है? अगर पार्टी के नेतागण उन्हें राज्यों की नब्ज को समझने में राहुल से बेहतर मानने लगे तो भविष्य में बड़ी भूमिका के लिए उनके दावे और मजबूत होंगे.
क्या केरलम से आगे जाएगा सतीशन मॉडल?
माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री के पद पर सतीशन के चयन को अब केरलम के बाहर भी एक राजनीतिक मॉडल या उदाहरण के रूप में देखा जाएगा. ‘सतीशन मॉडल’ बताता है कि अगर किसी नेता के पीछे जनता की ताकत, सहयोगी दलों का भरोसा और मजबूत जमीनी विश्वसनीयता हो तो वह हाईकमान की नापसंद के बावजूद टिका रह सकता है. यह भी दिखाता है कि क्षेत्रीय नेता और गठबंधन सहयोगी लगातार दबाव बनाकर उन फैसलों को भी बदल सकते हैं, जो दिल्ली में पहले से ही तय माने जा रहे हों.
इससे यह संकेत भी मिलते हैं कि भविष्य में कांग्रेस राहुल गांधी की मौजूदा ‘कमान-एंड-कंट्रोल’ वाली शैली से बाहर निकल सकती है. लेकिन यह दुधारी तलवार भी साबित हो सकती है. इससे एक तरफ पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र तो मजबूत हो सकता है, लेकिन वहीं दूसरी ओर अराजकता भी बढ़ सकती है.
मगर इस पूरे प्रसंग का लब्ब-ओ-लुबाब यही निकलता है कि राजनीति में कृत्रिम तरीके से जुटाए गए आंकड़े और समर्थन भले ही पार्टी नेतृत्व को प्रभावित कर दें, लेकिन अंततः इतिहास वही शख्स लिखता है, जिसे वास्तव में जनता का आशीर्वाद मिलता है. सबसे बड़ा संदेश है – जनता के बीच जाइए. जनादेश हमेशा उसी नेता के पीछे चलता है, जो जनता का होकर रहता है.

