रूस और भारत के रिश्तों की बात होती है तो सबसे पहले तेल, गैस, मिसाइल और न्यूक्लियर एनर्जी का जिक्र आता है. लेकिन अब दोनों देशों की दोस्ती एक ऐसे सेक्टर में प्रवेश कर रही है, जिसे आने वाले दशक की असली आर्थिक ताकत माना जा रहा है- स्टील. ऐसा स्टील, जिससे पुल बनेंगे, बुलेट ट्रेन दौड़ेगी, नई फैक्ट्रियां खड़ी होंगी, रक्षा उपकरण बनेंगे और भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना आगे बढ़ेगा.
लेनिनग्राद में रूस और भारत के बीच स्टील सेक्टर में बड़े निवेश, कोकिंग कोल सप्लाई, स्पेशल स्टील, क्रिटिकल मिनरल्स और लो-कार्बन टेक्नोलॉजी पर गंभीर चर्चा हुई है. सोमवार को हुई इस मीटिंग का सबसे बड़ा संकेत यह है कि भारत अब सिर्फ रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदना चाहता, बल्कि अपनी औद्योगिक रीढ़ मजबूत करने के लिए लंबे समय का साझेदार बनाना चाहता है.
आखिर भारत को रूस की जरूरत क्यों पड़ रही है?
- भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है. हाईवे, रेलवे, मेट्रो, डिफेंस कॉरिडोर, सेमीकंडक्टर प्लांट और स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स तेजी से बढ़ रहे हैं. इसका सीधा मतलब है स्टील की भारी मांग.
- भारत ने 2030 तक अपनी स्टील उत्पादन क्षमता 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 300 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है. लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती है कोकिंग कोल और हाई-ग्रेड स्टील के लिए आयात पर निर्भरता.
- कोकिंग कोल स्टील उद्योग की जान माना जाता है. इसके बिना बड़े पैमाने पर स्टील उत्पादन संभव नहीं. अभी भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों से खरीदता है. ऐसे में रूस एक बड़ा विकल्प बनकर उभर रहा है.
- रूस के पास विशाल कोकिंग कोल भंडार हैं. पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद मॉस्को भी नए बाजार तलाश रहा है. भारत को सस्ता और स्थिर सप्लाई चाहिए, जबकि रूस को बड़ा खरीदार. दोनों की जरूरतें यहां एक-दूसरे से मेल खा रही हैं.
चीन क्यों रखेगा नजर?
दुनिया के स्टील बाजार में चीन का दबदबा लंबे समय से रहा है. चीन सिर्फ सबसे बड़ा स्टील उत्पादक ही नहीं, बल्कि सप्लाई चेन, मेटल प्रोसेसिंग और रेयर मिनरल्स में भी बड़ी ताकत है. लेकिन भारत अब इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है.
अगर रूस के साथ भारत का यह सहयोग मजबूत होता है, तो नई सप्लाई चेन तैयार हो सकती है. इसका मतलब होगा कि भारत स्टील और क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. यही वजह है कि इस सहयोग को सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है.
सिर्फ स्टील नहीं, फ्यूचर इंडस्ट्री पर नजर
- इस बातचीत में सिर्फ सामान्य स्टील की बात नहीं हुई. स्पेशल स्टील, लो-कार्बन टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स पर भी फोकस रहा. स्पेशल स्टील का इस्तेमाल रक्षा उपकरण, युद्धपोत, फाइटर जेट, हाई-स्पीड रेलवे और भारी मशीनरी में होता है. भारत अभी इस क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है. रूस के साथ सहयोग से इस गैप को कम करने की कोशिश होगी.
- इसके अलावा दुनिया अब ग्रीन स्टील और लो-कार्बन इंडस्ट्री की तरफ बढ़ रही है. यूरोप और अमेरिका लगातार कार्बन उत्सर्जन पर सख्त नियम ला रहे हैं. अगर भारत को भविष्य में वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करनी है, तो उसे पर्यावरण-अनुकूल स्टील उत्पादन की तरफ जाना ही होगा. रूस के साथ टेक्नोलॉजी और संयुक्त निवेश पर चर्चा इसी दिशा का हिस्सा मानी जा रही है.
बंदरगाह से फैक्ट्री तक, बड़ा खेल
रूस के लेनिनग्राद ओब्लास्ट प्रशासन ने बातचीत में पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स सहयोग पर भी जोर दिया. इसका मतलब यह है कि दोनों देश सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं, बल्कि एंड-टू-एंड इंडस्ट्रियल नेटवर्क बनाना चाहते हैं. यानी खदान से लेकर शिपिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग तक पूरा सिस्टम एक साथ विकसित करने की योजना बन सकती है. अगर ऐसा होता है तो भारत के स्टील सेक्टर की लागत कम हो सकती है और सप्लाई ज्यादा सुरक्षित बन सकती है.
पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस की नई रणनीति
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों ने भारी आर्थिक प्रतिबंध लगाए. यूरोप ने रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करनी शुरू कर दी. ऐसे में मॉस्को तेजी से एशियाई देशों की तरफ झुक रहा है. भारत पहले ही रूस से रिकॉर्ड मात्रा में सस्ता तेल खरीद रहा है. अब स्टील और मिनरल सेक्टर में सहयोग यह दिखाता है कि दोनों देश अपने रिश्तों को सिर्फ ऊर्जा व्यापार तक सीमित नहीं रखना चाहते. रूस के लिए भारत एक भरोसेमंद और विशाल बाजार है. वहीं भारत के लिए रूस ऐसा साझेदार है, जो पश्चिमी दबाव के बावजूद रणनीतिक सहयोग जारी रखता है.
भारत का बड़ा सपना
भारत आने वाले वर्षों में खुद को सिर्फ उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहता है. इसके लिए स्टील सबसे अहम बुनियादी ताकत है. अगर देश को लाखों करोड़ रुपये की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं पूरी करनी हैं, रक्षा उत्पादन बढ़ाना है और दुनिया की फैक्ट्री बनने की दिशा में आगे बढ़ना है, तो मजबूत स्टील सप्लाई जरूरी होगी. यही वजह है कि रूस के साथ यह नई साझेदारी सिर्फ एक कारोबारी समझौता नहीं लगती. यह उस बड़े खेल का हिस्सा दिखाई देती है, जिसमें भारत अपनी औद्योगिक ताकत बढ़ाकर वैश्विक सप्लाई चेन में नई जगह बनाना चाहता है. और अगर यह योजना सफल हुई, तो आने वाले वर्षों में सिर्फ तेल और गैस ही नहीं, बल्कि स्टील की भट्टियों में भी भारत-रूस दोस्ती की गर्मी दिखाई दे सकती है.

