Sunday, May 17, 2026
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पेट्रोल की ऊंची कीमतों के लिए ऑयल बॉन्ड आज कितना जिम्मेदार?


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पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर चर्चा होते ही ऑयल बॉन्ड का मुद्दा फिर सामने आ जाता है. अक्सर यह दावा किया जाता है कि आज भी जनता महंगे पेट्रोल डीजल के जरिए पुराने ऑयल बॉन्ड का बोझ चुका रही है. लेकिन असली आंकड़े कहानी कुछ और बताते हैं. 2005 से 2010 के बीच सरकार ने तेल कंपनियों के घाटे को छिपाने के लिए करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे. इन पर ब्याज और मूलधन मिलाकर कुल देनदारी करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंची. दूसरी तरफ 2014 से 2023 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स से 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर ली. ऐसे में सवाल यही है कि क्या आज भी महंगे ईंधन की सबसे बड़ी वजह ऑयल बॉन्ड हैं या फिर सरकारों के लिए पेट्रोल डीजल सबसे भरोसेमंद कमाई का जरिया बन चुका है.

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2008 के बाद लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर रही थीं. (AI)

नई दिल्ली. भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ते ही राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा मुद्दा ऑयल बॉन्ड बन जाता है. एक पक्ष कहता है कि पिछली सरकारों ने जो बोझ छोड़ा था, उसकी कीमत आज देश चुका रहा है. दूसरी तरफ कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि अब ऑयल बॉन्ड का असर बेहद सीमित रह गया है और मौजूदा महंगे पेट्रोल डीजल की असली वजह सरकारों की टैक्स कमाई है. यही वजह है कि ऑयल बॉन्ड को समझना जरूरी हो जाता है क्योंकि इसी के जरिए यह साफ होता है कि आखिर भारत में ईंधन इतना महंगा क्यों है. 2005 से 2010 के बीच दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं. उस समय केंद्र में यूपीए (UPA) सरकार थी.

अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाए जाते तो देश में महंगाई बेकाबू हो सकती थी और जनता पर भारी बोझ पड़ता. इसलिए सरकार ने तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल (Indian Oil), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL) को बाजार भाव से कम कीमत पर पेट्रोल डीजल बेचने के लिए कहा. इससे तेल कंपनियों को भारी नुकसान होने लगा. इस नुकसान को अंडर रिकवरी कहा गया. सामान्य स्थिति में सरकार सीधे नकद सब्सिडी देकर यह घाटा भरती, लेकिन उस समय सरकार के पास इतना पैसा नहीं था. अगर सीधे नकद भुगतान किया जाता तो राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ जाता और भारत की क्रेडिट रेटिंग पर असर पड़ सकता था.

सरकार ने कैसे निकाला रास्ता?

सरकार ने नकद भुगतान करने के बजाय ऑयल बॉन्ड जारी किए. ये असल में सरकारी उधारी के कागज थे जिनमें सरकार ने वादा किया कि वह भविष्य में मूलधन और ब्याज दोनों लौटाएगी. इन बॉन्ड की अवधि 15 से 20 साल तक की थी और इन पर लगभग 7 से 8 प्रतिशत ब्याज दिया जाता था. तेल कंपनियां इन बॉन्ड को अपने पास रख सकती थीं या फिर बाजार में बेचकर तुरंत पैसा जुटा सकती थीं. इससे सरकार को तत्काल नकद भुगतान से राहत मिल गई लेकिन भविष्य के लिए बड़ा कर्ज खड़ा हो गया.

कितना था ऑयल बॉन्ड का कुल बोझ?

2005 से 2010 के बीच सरकार ने करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए. लेकिन असली बोझ केवल मूलधन तक सीमित नहीं था. इन पर वर्षों तक ब्याज भी देना पड़ा. ब्याज और मूलधन को मिलाकर कुल देनदारी करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई. 2014 के बाद धीरे धीरे इन बॉन्ड की मियाद पूरी होने लगी. 2021, 2023, 2024 और 2026 में कई बड़े बॉन्ड मैच्योर हुए जिन्हें सरकार ने चुकाया. सरकार को इन वर्षों में भारी ब्याज भुगतान भी करना पड़ा. हालांकि अब ज्यादातर बॉन्ड का भुगतान हो चुका है और केवल कुछ हिस्से ही बाकी बचे हैं.

फिर पेट्रोल डीजल पर इतना टैक्स क्यों?

यहीं से असली बहस शुरू होती है. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि पेट्रोल डीजल पर भारी टैक्स इसलिए लगाया जा रहा है ताकि पुराने ऑयल बॉन्ड का पैसा चुकाया जा सके. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि वास्तविकता इससे काफी अलग है. 2014 से 2023 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी और सेस के जरिए 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की. अगर इसकी तुलना ऑयल बॉन्ड की कुल 2.4 लाख करोड़ रुपये की देनदारी से की जाए तो यह रकम उसके मुकाबले 10 गुना से भी ज्यादा बैठती है.

आंकड़ा अनुमानित रकम
ऑयल बॉन्ड की कुल देनदारी करीब ₹2.4 लाख करोड़
2014-2023 के बीच पेट्रोल डीजल से टैक्स कमाई ₹25 लाख करोड़ से ज्यादा

यानी सरकार ने केवल कुछ वर्षों में पेट्रोल डीजल से जितना टैक्स जुटाया, वह ऑयल बॉन्ड के कुल बोझ से कई गुना ज्यादा है.

आज के महंगे पेट्रोल डीजल के पीछे ऑयल बॉन्ड हैं?

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक अब ऑयल बॉन्ड का मौजूदा ईंधन कीमतों पर लगभग कोई सीधा असर नहीं बचा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें वर्षों पहले डीरेगुलेट हो चुकी हैं. पेट्रोल 2010 में और डीजल 2014 में बाजार आधारित मूल्य प्रणाली में आ गए थे. सैद्धांतिक रूप से अब ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव और टैक्स ढांचे के हिसाब से तय होती हैं, न कि पुराने सरकारी कर्ज के आधार पर. ऐसे में अगर सरकार चाहे तो बाकी बचे ऑयल बॉन्ड का भुगतान सामान्य टैक्स आय से कर सकती है और पेट्रोल डीजल पर टैक्स कम करके जनता को राहत दे सकती है.

फिर सरकारें कीमतें कम क्यों नहीं करतीं?

इसका सबसे बड़ा कारण राजस्व है. पेट्रोल और डीजल भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए सबसे स्थिर और भरोसेमंद कमाई का जरिया बन चुके हैं. सड़क निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं और बजट घाटे को संभालने के लिए सरकारें इसी टैक्स आय पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद कई बार जनता को उतनी राहत नहीं मिलती जितनी उम्मीद होती है. सरकारें टैक्स घटाने के बजाय उस अतिरिक्त कमाई का इस्तेमाल अपने बजट संतुलन के लिए करती हैं. हालांकि, पिछले कुछ समय से एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर के ऊपर बनी हुई हैं. ऐसे में पेट्रोल की कीमतें घटाना तो दूर अब खबरें हैं कि दाम उल्टा बढ़ाए जा सकते हैं.

असली तस्वीर क्या कहती है?

ऑयल बॉन्ड भारत की आर्थिक नीति का एक बड़ा अध्याय जरूर रहे हैं और उन्होंने सरकार पर वित्तीय बोझ भी डाला. लेकिन आज पेट्रोल डीजल की ऊंची कीमतों की पूरी जिम्मेदारी केवल उन्हीं पर डालना सही तस्वीर नहीं दिखाता. असलियत यह है कि ईंधन अब सरकारों के लिए सबसे बड़ा टैक्स इंजन बन चुका है. ऐसे में ऑयल बॉन्ड एक राजनीतिक तर्क जरूर हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा कीमतों के पीछे सबसे बड़ी ताकत सरकारों की राजस्व जरूरतें ही हैं.

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जय ठाकुरSenior-Sub Editor

मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…और पढ़ें



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