अवामी लीग की ज़बरन बांग्लादेश से रुखसती होने के बाद ड्रैगन को क्षेत्र में पांव पसारने का खासा मौका मिला. शेख हसीना की बर्खास्तगी और मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार का पर्दापण, इस अध्याय का पहला हिस्सा रहा. बावजूद इसके सीधे तौर पर बांग्लादेश के तख्तापलट प्रकरण से बीजिंग और इस्लामाबाद ने दूरी कायम की. पिछले दरवाज़े से पाक और चीन दोनों ने ही फंडिंग और नैरेटिव बिल्डिंग के लिए अपने संसाधन बांग्लादेश में झोकें. भारत ने इस मसले पर अपनी चिंता ज़ाहिर की, क्योंकि भारत बांग्लादेश के साथ करीब 4000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करता है.
मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश के रहनुमा हैं, ऐसे में चीन और पाकिस्तान की निशानदेही पर वो सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के तर्ज पर नई तंजीमी मजलिस सजाने की फिराक में हैं. इसी मंशा के साथ बीते कुछ दिन के दौरान तीनों मुल्कों के बीच आधारिक संरचना विकास, आर्थिक सहयोग, सड़क सम्पर्क और विभिन्न साझा परियोजनाओं जैसी कवायदों में तेजी देखी गयी. बकौल चीन, बीजिंग का ढ़ाका और इस्लामाबाद के साथ बढ़ता साझा सहयोग आपसी निष्ठा, विश्वास और खुलेपन की बुनियाद पर टिका है. साथ ही ये तीन तरफा तालुक्कात किसी मुल्क के खिलाफ लामबंदी नहीं है. कारोबार, इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट और तालीम समेत कई मसलों पर चीन बांग्लादेश की मदद करने के लिए तैयार खड़ा है. स्पष्ट है इस राह में आगे बढ़ने का मंत्र पाकिस्तान की ओर से दिया गया. इस फेहरिस्त में सियासी तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने जमात-ए-इस्लामी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग के साथ अपनी समझ को बढ़ाने की कोशिशें तेज की.
भारत के खिलाफ हुई विदेश सचिव स्तरीय अनौपचारिक त्रिपक्षीय बैठक
करीब एक महीने पहले विदेश सचिव स्तर की अनौपचारिक त्रिपक्षीय बैठक हुई. उस दौरान चीनी उप विदेश मंत्री सुन वेइदोंग की मेजबानी में पाकिस्तान के अतिरिक्त विदेश सचिव इमरान अहमद सिद्दीकी और बांग्लादेश के पूर्व कार्यवाहक विदेश सचिव मोहम्मद रुहुल आलम सिद्दीकी ने न्यूनतम साझा कार्यक्रमों के तहत कुछ परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए साझा सहमति जाहिर की. तीनों देशों के प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने आने वाले वक्त में कुछ नए क्षेत्रों की तलाश कर आपसी सहयोग को बढ़ाने पर हामी भरी.
सार्वजनिक नहीं हुआ कार्यक्रम का एजेंडा
दिलचस्प है कि इस कथित विदेश सचिव स्तरीय अनौपचारिक त्रिपक्षीय बैठक के बिंदुओं को खुले तौर पर पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया. कार्यक्रम को लेकर बैठक में शामिल तीनों हितधारक देशों ने प्रेसवार्ता करने में परहेज बरता. साफ है कि जिस तरह की मुस्तैदी बरती जा रही है, उससे इस ओर इशारा जाता है कि इस बैठक में नई दिल्ली के खिलाफ कुछ संवेदनशील षड़यंत्र रचा गया. ऑप्रेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के नापाक इरादे और तख्तापलट के बाद बनी बांग्लादेश की भू-रणनीतिक स्थिति दोनों ही नई दिल्ली के लिए भारी चिंता का सब़ब है. ऊपर से ड्रैगन के साथ हमारी पुरानी अदावत इस गठजोड़ को पैनापन दे रही है. चीन के इशारे पर जिस तरह से रावलपिंडी के जनरल और बांग्लादेशी नीति नियंता रणनीतिक फैसले ले रहे है, उससे भारत की चिंतायें बढ़ी है. इस कवायद से पैदा हुआ असर लंबे समय तक अपनी छाप छोड़े रखेगा.
जिस राह पर तीनों मुल्क आगे बढ़ रहे है, उससे भारत की सुरक्षा को तयशुदा खतरा है. नई दिल्ली के लिए ये खतरनाक सामरिक तस्वीर पेश करेगा. रक्षा सहयोग, नदी परियोजना और सड़क सम्पर्क सेवाओं के नाम पर पीएलए की पहुंच ढाका के बंदरगाहों तक आसान होती दिख रही है. पाकिस्तान भी इसी मौके के तलाश में है, ऐसे में बीजिंग और इस्लामाबाद का भारत के खिलाफ सैन्य संचालन आसान होता दिख रहा है. ये स्थिति नई दिल्ली के लिए भू-रणनीतिक हितों और सुरक्षा से जुड़ी पेचीदगी भरी चुनौतियां पेश करेगा.
त्रिपक्षीय खेमे का दायरा बढ़ाने की जुगत में तीनों मुल्क
भारत के खिलाफ ये त्रिपक्षीय लामबंदी और भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है, अगर इस खेमे में कोलंबो, माले और काबुल शामिल होगें. बीजिंग की निशानदेही पर पाकिस्तानी हुक्मरान अंदरखाने इस समीकरण को बैठाने की भरसक कोशिश कर रहे है. चीनी नेतृत्व ये अच्छे से जानता है कि अगर उसके खेमे में पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलावा श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल होते है तो भारत को भारी दबाव में लाया जा सकता है. हंबनटोटा बंदरगाह में चीनी बैंक एक्ज़िम का वित्तपोषण इसी सोच का आईना है. इस कथित क्षेत्रीय व्यवस्था को मूर्त रूप देकर चीन अपने विस्तारवादी रवैए को मजबूती देगा. जबकि बांग्लादेश और पाकिस्तान इसे साझा हित, संपर्क, आर्थिक और आपसी सहयोग के चश्मे से देख रहे हैं. इससे भारत के खिलाफ दोनों के भू-रणनीतिक हित मजबूत होंगे. तीनों जिस तरह के फैसले ले रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि तीनों ही भारत के सामरिक हितों को कमतर आंक रहे है.
कथित त्रिपक्षीय सहयोग के नाम पर पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वी सीमा पर सामरिक घेरेबंदी साफ देखी जा रही है. हाल ही में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने इस तिकड़मी घेरेबंदी को देश के लिए बड़ा खतरा बताया. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार जिस तरह से इस खेमे में शामिल हुई है, उससे भारत की पूर्वी सीमा खासतौर से सिलीगुड़ी कॉरिडोर की हिफाज़त को भारी खतरा है. ड्रैगन ने बांग्लादेश के जर्जर पड़े एयरबेस की बहाली का जिम्मा उठाया, यानी कि जो मिलिट्री बेस भविष्य में चीन ढाका को बनाकर देगा, उसका सीधा निशाना हिंदुस्तानी सरजमीं होगी. ढाका को अहसानों के बोझ तले दबाने के लिए बीजिंग ने कर्ज कूटनीति का सहारा लिया हुआ है. इसके तहत चीनी कंपनियां पाकिस्तान के तर्ज पर बांग्लादेश में अंधाधुंध निवेश कर रही हैं. बांग्लादेश में तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना में भी चीनी कंपनियों का सीधा दखल है. इसका असर भारत की पूर्वी सीमा से लगी क्षेत्रीय परियोजनाओं पर पड़ेगा.
वजूद में आ सकता है नया क्षेत्रीय संगठन
इस खेमेबंदी का अगला चरण साउथ एशिया-चाइना अलायंस की ओर बढ़ता दिख रहा है. इस नए क्षेत्रीय संगठन की चर्चाएं दक्षिण-एशिया में भारत की चिंता को पुख्ता तौर पर बढ़ाएंगी. सार्क की निष्क्रियता और इस नए संगठन का अभ्युदय क्षेत्रीय सहयोग में नई दिल्ली की भूमिका को कमजोर करेगा. जिस कथित सम्पर्क, सहयोग और समन्वय की बात तीनों देश कर रहे हैं, अगर वो सैन्य गठजोड़ और सामरिक सहयोग की ओर बढ़ता है तो ये दक्षिण-एशिया में जंगी तनाव बढ़ाएगा. मुमकिन तौर पर नई दिल्ली को तीन मोर्चों पर जूझना पड़ेगा, इससे क्षेत्रीय स्थिरता सीधे तौर पर प्रभावित होगी.
ये कथित बैठक चीन के विस्तारवादी प्रभाव को बढ़ाने की कवायद लगती दिखाई दे रही है. ऐसे में भारत को दक्षिण-एशिया को केंद्र में रखते हुए अपनी कूटनीति, सामरिक तैयारी और आर्थिक नीतियों को पुर्नपरिभाषित करना होगा. पाकिस्तान के साथ नई दिल्ली के द्विपक्षीय संबंध जगजाहिर हैं. दूसरी ओर बांग्लादेश में चुनी हुई सरकार नहीं है, उस पर जनमत का कोई दबाव नहीं है. ऐसे में वो भू-रणनीतिक बदलाव से जुड़े संजीदा कदम बेतकल्लुफ तौर पर उठा सकता है. ये भारी चिंता का मसला है, इससे क्षेत्रीय सामरिक गणित के समीकरण पूरी तरह बदलेंगे. नई दिल्ली को पीछे धकेलने कि ये त्रिपक्षीय कोशिशें गंभीर नतीज़े पैदा करेंगी. इसका असर दक्षिण-एशिया से बाहर निकलकर दूसरे क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव दिखायेगा.
(इस आर्टिकल के लेखक राम अजोर वरिष्ठ पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं.)

