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कॉस्टिक सोडा की कीमतों का असर केवल भारी उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपकी रसोई और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंच सकता है. यह साबुन और डिटर्जेंट बनाने का मुख्य आधार है. इसकी लागत बढ़ने से साबुन और डिटर्जेंट के दाम बढ़ सकते हैं.
कास्टिक सोडा महंगा होने का असर रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों पर होगा. (Photo : AI)
नई दिल्ली. कॉस्टिक सोडा (Caustic Soda) की कीमतों में आई अचानक तेजी ने देश के एल्युमीनियम उद्योग से लेकर एफएमसीजी (FMCG) और टेक्सटाइल सेक्टर तक की नींद उड़ा दी है. घरेलू बाजार में कॉस्टिक सोडा के दाम 15% से 20% तक उछल गए हैं. यह एक ऐसा केमिकल है जिसका इस्तेमाल एल्युमीनियम रिफाइनिंग, कागज, वस्त्र, साबुन, डिटर्जेंट और पानी के शोधन जैसे दर्जनों उद्योगों में होता है. कॉस्टिक सोडा की कीमतों में बढ़ोतरी एल्युमीनियम स्मेल्टर्स के लिए ‘दोहरी मार’ की तरह आई है. एल्युमीनियम बनाने की प्रक्रिया में बॉक्साइट अयस्क से एल्युमिना निकालने के लिए कॉस्टिक सोडा एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है.
उद्योग के अनुमान के अनुसार, 1 टन एल्युमीनियम तैयार करने के लिए लगभग 170-200 किलोग्राम कॉस्टिक सोडा की जरूरत होती है. चूंकि इसका रेट बढ़ गया है इसलिए हिंडाल्को (Hindalco) और वेदांता (Vedanta) जैसी बड़ी कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट में इजाफा हो गया है. वैश्विक एल्युमीनियम कीमतें पहले ही $3,370 प्रति टन के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी हैं और अब घरेलू लागत बढ़ने से मेटल के दाम लंबे समय तक ऊंचे रहने की आशंका गहरा गई है.
आप पर कैसे होगा असर
कॉस्टिक सोडा की कीमतों का असर केवल भारी उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपकी रसोई और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंच सकता है. एल्युमीनियम के महंगे होने से ‘बेवरेज कैन’ की लागत बढ़ेगी, जिससे सॉफ्ट ड्रिंक्स और जूस महंगे हो सकते हैं. कॉस्टिक सोडा साबुन और डिटर्जेंट बनाने का मुख्य आधार है. इसकी लागत बढ़ने से साबुन और डिटर्जेंट के दाम बढ़ सकते हैं. टेक्सटाइल और पेपर इंडस्ट्री में भी कॉस्टिक सोडा का इस्तेमाल होता है. इनपुट कॉस्ट बढ़ने से आने वाले दिनों में नोटबुक से लेकर रेडीमेड कपड़ों तक की कीमतों में इजाफा हो सकता है.
ऑटोमोबाइल और निर्माण क्षेत्र की बढ़ी टेंशन
एल्युमीनियम की ऊंची कीमतों का सीधा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ रहा है, जहां गाड़ियों के इंजन, बॉडी और अन्य कंपोनेंट्स में इस मेटल का खूब इस्तेमाल होता है. इसके अलावा, कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में खिड़कियों, दरवाजों और अन्य फिटिंग्स के लिए एल्युमीनियम खूब इस्तेमाल होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते असंतुलन और कॉस्टिक सोडा की महंगाई के कारण ऑटोमोबाइल और रियल्टी सेक्टर पर दबाव आ सकता है.

