Friday, May 8, 2026
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‘आधार निवास का प्रमाण, नागरिकता…, SIR पर सिब्‍बल की दलीलों पर CJI की दो टूक


नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर को लेकर आज सुनवाई बेहद तीखी रही. कपिल सिब्बल ने दलील दी कि आधार निवास का वैध प्रमाण है और बिना प्रक्रिया अपनाए किसी नागरिक को संदिग्ध मानना असंवैधानिक है. वहीं न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट कहा कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, इसलिए चुनाव आयोग को फॉर्म-6 की जांच का संवैधानिक अधिकार है. सिब्बल ने एसआईआर को “हड़बड़ी और बहिष्करणकारी” बताया, जबकि CJI ने कहा कि “पहले कभी नहीं हुआ” किसी प्रक्रिया को असंवैधानिक नहीं बनाता. बहस तब और तेज हुई जब सिब्बल ने बोझ नागरिक पर डालने का विरोध किया और कोर्ट ने नोटिस प्रक्रिया का बचाव किया.

आधार-कार्ड होने पर वोटर बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती: CJI
मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड मूलतः एक क़ानूनी दस्तावेज़ है, जिसका उद्देश्य लाभ और कल्याणकारी योजनाओं का वितरण सुनिश्चित करना है. उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पड़ोसी देश से है और मजदूरी जैसे असंगठित क्षेत्रों में काम करता है, तो मानवीय आधार पर उसे राशन या अन्य सुविधाओं के लिए आधार दिया जा सकता है. यह भारत की संवैधानिक भावना का हिस्सा है. लेकिन केवल इसलिए कि किसी के पास आधार है, उसे मतदाता बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. नागरिकता और मतदान अधिकार के मानदंड अलग हैं और इन्हें आधार से नहीं जोड़ा जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट में SIR पर सुप्रीम कोर्ट में सिब्‍बल-जज साहब की जोरदार बहस

सिब्बल: आधार मेरे निवास का प्रमाण है. अगर आपको इसे नकारना है, तो वैधानिक प्रक्रिया अपनाइए. बिना उचित कारण नागरिक को संदिग्ध मानना ठीक नहीं.

न्यायमूर्ति बागची: लेकिन आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है. इसलिए इसे हम केवल दस्तावेज़ों की सूची में एक विकल्प के रूप में देखते हैं, निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं.

सिब्बल: लेकिन चुनाव आयोग फॉर्म-6 को ऐसे क्यों नहीं स्वीकारता जैसा दिया गया है? आयोग किसी पोस्ट ऑफिस की तरह इसे स्वीकार करे—जब तक कोई ठोस विरोध सामग्री न हो.

न्यायमूर्ति बागची: आयोग केवल पोस्ट ऑफिस नहीं है. उसे संवैधानिक अधिकार है कि वह दस्तावेज़ों की शुद्धता की जांच करे. अगर फॉर्म-6 में कुछ गलत है, तो उसे परखने की शक्ति आयोग के पास है.

सिब्बल: मगर एसआईआर जिस तरीके से चल रही है, वह हड़बड़ी में और बहिष्करणकारी है. नागरिक पर सबूत का बोझ डालना उचित नहीं.

CJI (हस्तक्षेप करते हुए): “पहले कभी नहीं हुआ” यह तर्क किसी भी प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को नहीं गिराता.

सिब्बल: लेकिन आधार देकर आपने व्यक्ति को लाभ दिया है, फिर उसे संदेह के दायरे में क्यों ला रहे हैं? अगर हटाना है, तो साबित कीजिए.

न्यायमूर्ति बागची: मृत और अनुपस्थित लोगों की सूची पंचायतों और वेबसाइट पर प्रकाशित की गई थी. नोटिस न मिलने की बात सही नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर मामले में 23 बीएलओ की मौत के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई. पश्चिम बंगाल की ममता सरकार की ओर से पेश वकील ने इस संबंध में जानकारी दी, जिसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्रीय चुनाव आयोग को एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के एसआईआर मामलों की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी. मामला मतदाता सुरक्षा और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा है.

संबंधित राज्य चुनाव आयोगों को एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने बेंच को बताया कि मद्रास उच्च न्यायालय में यह याचिका पहले ही दायर की जा चुकी है. राज्य चुनाव आयोग ने कहा कि उन्हें कोई समस्या नहीं आ रही है और आयोग एवं राज्य आयोग मिलकर समन्वय कर रहे हैं. 99 प्रतिशत मतदाताओं को फॉर्म मिल चुके हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक डिजिटल रूप में हैं. सीजेआई ने केरल एसआईआर मामले के लिए अलग से स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील ने दावा किया कि एसआईआर के दबाव में 23 बीएलओ की मौत हो चुकी है. पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वकील ने भी इस बात की पुष्टि की. इस गंभीर मामले में कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है. चुनाव आयोग ने कहा कि वे केरल राज्य चुनाव आयोग को भी जवाब दाखिल करने की अनुमति देंगे.



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