अरावली को लेकर कुछ लोग झूठ बोल रहे हैं और भ्रम फैला रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने परिभाषा स्वीकृत करने के साथ ही कहा है कि अरावली में कोई नई माइनिंग लीज नहीं दी जाएगी।
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पहले मैनेजमेंट साइंटिफिक प्लान बनेगा, फिर ICFRE उसका इवेल्युएशन करेगी। माइनिंग देते समय सस्टनेबिलिटी को देखा जाएगा। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने ये बातें दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान कहीं।
दरअसल, अरावली पर्वतमाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा को स्वीकृति देने के बाद से सियासत चरम पर है, जिसके अनुसार 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को ही ‘अरावली’ माना जाएगा।
कई पर्यावरण प्रेमी इसका विरोध कर रहे हैं। नई परिभाषा में ऐसा क्या है? क्या इससे अरावली क्षेत्र में बस रहे लोगों को चिंता करनी चाहिए?
पहाड़ियों की ऊंचाई की 100 मीटर की गणना कैसे होगी, इसे कैसे नापा जाएगा? ऐसे कई सवालों के जवाब हमने केंद्रीय मंत्री से लिए।
भास्कर : राजस्थान की सियासत में आवाज गूंज रही है कि ‘अरावली खतरे में है।’ आम जनता आंदोलन की राह पर है, पर्यावरण मंत्री होते हुए आप इसे कैसे देखते हैं?
भूपेंद्र यादव : कुछ लोग इसको लेकर झूठ बोल रहे हैं और भ्रम फैला रहे हैं। कांग्रेस सरकार के समय से अरावली का ये विषय सर्वोच्च न्यायालय में पेंडिंग था।
मूल विषय था अवैध खनन। अवैध खनन होने का ये अर्थ है कि जिले में अरावली के आइडेंटिफिकेशन को लेकर कोई एक सार नहीं था कि अरावली किसे कहें?
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद उस समय की कांग्रेस सरकार अरावली की एक परिभाषा लेकर आई। उन्होंने अरावली को चिह्नित किया और उसके आधार पर माइनिंग लीज के पट्टे दे दिए।
जो आज भी हैं। बाद में सर्वोच्च न्यायालय में ये विषय आया कि अरावली एक राज्य में नहीं है, ये चार राज्यों में हैं। ऐसे में अरावली की चारों राज्यों में एक जैसी परिभाषा होनी चाहिए।
भास्कर : क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सरकार अरावली रेंज में 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों पर खनन की अनुमति देने वाली है?
भूपेंद्र यादव : सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली की परिभाषा देने के साथ ही कहा कि अरावली में कोई नई माइनिंग लीज नहीं दी जाएगी।
पहले जिला अनुसार मैनेजमेंट साइंटिफिक प्लान बनेगा, दूसरा साइंटिफिक प्लान बनने के बाद जो ICFRE हैं, वो उसका इवेल्युएशन करेगी।
फिर माइनिंग देते समय सस्टनेबिलिटी को देखा जाएगा।
यादव ने कहा कि- हमने पहले देखा है कि अरावली में पूर्व में जो माइंस दी गई थी वो अब बेकार पड़ी हुई हैं, तो उसका रेस्टोरेशन भी होना चाहिए।
आप धरती से अगर खनिज निकाल रहे हो उसकी क्षतिपूर्ति मतलब उसको हरित करके तो वापस दो। बहुत क्रिटिकल मिनरल की माइनिंग को भी बहुत एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी तरीके से दिया जाएगा।
- अरावली क्षेत्र में जो रिजर्व फॉरेस्ट, सेंचुरी, टाइगर रिजर्व हैं, वहां पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। केवल यही नहीं वहां के जो कोर एरिया से ईको सेंसेटिव जोन (ESZ) आएगा। वहां एक किलोमीटर की दूरी तक माइनिंग प्रतिबंधित है।
- जहां से जल स्त्रोत निकलते हैं, जैसे- अरावली में आनासागर व फायसागर अजमेर में हैं। उदयपुर की झीलें हैं। माउंट आबू झील है या जो रामसर साइट है। जैसे अपनी सिलीसेढ़ है, जो सांभर झील है। यहां से 500 मीटर तक माइनिंग प्रतिबंधित रहेगी।
- जहां से पानी स्त्रोत निकलते हैं जैसे- लूणी का, माही का और बनास का जल सोर्स, उन एरिया में भी माइनिंग पूरी तरह से प्रतिबंधित होगी। इसके साथ ही साथ अरावली में जो माइनिंग चल रही है, उसे व्यवस्थित किया जाएगा।

भास्कर : अरावली रेंज में पहाड़ियों की ऊंचाई की ये 100 मीटर की गणना कैसे होगी, इसे कैसे नापा जाएगा?
भूपेंद्र यादव : नहीं, कोई भी पहाड़ी कैसे चिह्नित करोगे? एक पर्वत मतलब सिंगल यूनिट अगर है तो 100 मीटर की ऊंचाई होनी चाहिए, लेकिन ऊपर से नहीं होनी चाहिए।
उसका नीचे तक का धरातल होना चाहिए। ऐसे में उसके फैलाव में पूरा आ जाएगा और उसके आस-पास की सभी छोटी-मोटी पहाड़ियां आ जाएंगी। नीचे वहां होगा, जो उसके लैंडफॉर्म का सबसे नीचे होगा।
अब फिर अरावली रेंज किसे कहेंगे? तो 200 मीटर की जो पहाड़ियां हैं, उसके बीच का जितना भी भू भाग है, छोटी-बड़ी जो भी पहाड़ियां हैं, वो सब अरावली रेंज है। तो इससे तो 90 प्रतिशत भाग स्वयं अरावली और अरावली रेंज में आ जाता है।
भास्कर : अशोक गहलोत का आरोप है कि उनकी सरकार में जो परिभाषा तय की गई थी, उस रिपोर्ट को कोर्ट ने तब खारिज कर दिया था। अब उसी को आधार बनाकर फैसला आया है?
भूपेंद्र यादव : उनकी कोई रिपोर्ट खारिज भी नहीं हुई और स्वीकार भी नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई जिसमें पर्यावरण मंत्रालय के सेक्रेटरी को रखा।
साथ ही जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट की अपनी सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी और चारों राज्यों दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के सचिव को इसमें शामिल किया गया था।
ऐसे में ये इन चारों राज्यों की एक वृहद कमेटी बनी। अब इसमें अशोक गहलोत कहां फिट होते हैं। उन्होंने जो माइनिंग दी है, वो तो इसी आधार पर दी है। वो ये क्यों नहीं कहते हैं कि उन्होंने माइनिंग किस आधार पर दी है?

भास्कर : अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब राजस्थान के कितने क्षेत्र में खनन की अनुमति मिलने वाली है?
भूपेंद्र यादव : देखिए, अरावली में दिल्ली में तो खनन हो ही नहीं सकता है। वहां बैन है। केवल 2 प्रतिशत में ही माइनिंग हो सकती है। इससे ज्यादा तो हो ही नहीं सकता है।
जब साइंटिफिक मैनेजमेंट प्लान बना लोगे तो टाइगर रिजर्व, वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में सब छोटी-बड़ी पहाड़ियां बैन हैं। जलाशय के आस-पास भी ऐसा ही नियम है। जहां शहर आ गए हैं, वहां तो माइनिंग हो ही नहीं सकती है।
अब जहां पर 100 मीटर के बीच का जितना भी क्षेत्र है वो सब श्रृंखला के रूप में चिह्नित होगा। इसके बाद भी माइनिंग तब तक नहीं होगी, जब तक एक साइंटिफिक मैनेजमेंट प्लान न बन जाए और ICFRE की स्वीकृति न मिल जाए।
हमारी मुख्य समस्या अवैध खनन है। पुलिस अगर केस भी दर्ज कराना चाहेगी तो जो चिह्नित ही नहीं है तो उसे अवैध खनन में कैसे कहोगे? इसलिए अरावली को पूरी तरह से आइडेंटिफाई करने का प्रयास है।
भास्कर : विपक्ष आरोप लगाता है कि सरिस्का में क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट इसलिए बदला गया कि वहां बंद पड़ी खानों काे चालू कराया जा सके?
भूपेंद्र यादव : नहीं, सरिस्का में एक तो सीटीएच पूरा नहीं हुआ है। किसी भी टाइगर सेंचुरी में दो तरीके से होता है। एक तो कोर हैबिटेट है। कोर हैबिटेट वहीं होता है कि जिसमें कुछ हो ही नहीं सकता है तो वहां तो कोई माइनिंग हो ही नहीं सकती है, क्योंकि वो तो कोर है।
कोर के बाद दूसरा जो होता है वो सेंचुरी का निर्माण होता है, उसमें इसके लिए पब्लिक हियरिंग की जाती है। कोर और बफर को लेकर पब्लिक हियरिंग की प्रोसेस सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार चल रही है।
ऐसे में जब उसकी ये हियरिंग होगी और उसकी जो रिपोर्ट बनेगी तभी हो सकता है। अभी वहां पर भी कुछ फाइनल नहीं है।

भास्कर : अरावली की तलहटी में अजमेर जैसे शहर और कई गांव बसे हैं। उन लोगों की इस फैसले के बाद अपनी चिंताएं हैं। ऐसे में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के नाते उन्हें क्या सन्देश देंगे?
भूपेंद्र यादव : ये केवल माइनिंग के लिए है…इट्स ओनली फॉर माइनिंग। भ्रम तो अब लगभग साफ हो गया है, मेरे कहने के बाद काफी चीजें अब क्लियर हो गई हैं।
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