Saturday, May 9, 2026
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Explainer: कैसे बिल्डर-बैंक में होती है सांठगांठ और फंसता है होम बॉयर…बुरी तरह ठगा जाता है


सुप्रीम कोर्ट ने बैंक और बिल्डर के बीच सांठगांठ के मामलों में सीबीआई को 6 और एफआईआर दर्ज करने की इजाजत दी है. दरअसल ये बहुत बड़ा घोटाला है, जिसमें हजारों खरीदारों को धोखा दिया गया. ये मामला रियल एस्टेट सेक्टर में बैंकों और बिल्डरों की मिलीभगत से जुड़ा है. यह पूरा मामला “सबवेंशन स्कीम” से जुड़ा है, जिसमें बैंक, बिल्डर को सीधे फ्लैट की रकम देते हैं. खरीददारों को कब्जा मिलने तक ईएमआई नहीं चुकानी होती. कई बिल्डरों ने इस नियम का गलत इस्तेमाल किया. अधिकांश बिल्डरों ने EMI भरना बंद कर दिया, जिसके बाद बैंक घर खरीददारों से किश्त मांगने लगे, भले ही उन्हें फ्लैट का पजेशन नहीं मिला था.

दिल्ली-एनसीआर के 1200 से अधिक घर खरीदारों की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट में यह मामला आया, जिसमें कहा गया कि घर न मिलने के बावजूद खरीदारों से किश्त ली जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिल्ली-एनसीआर में सुपरटेक जैसी कंपनियों समेत 22 केसों की सीबीआई जांच का आदेश दिया था. अब देश के अन्य बड़े शहरों में भी ऐसे घोटालों की शुरुआती जांच में ‘सांठगांठ’ के प्रमाण मिले तो सुप्रीम कोर्ट ने 6 नए मुकदमे दर्ज करने को कहा. इस गठजोड़ की वजह से खरीदारों को न घर मिला न पैसा लौटा और मजबूरी में ईएमआई भी भरनी पड़ी.

एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में पाया गया कि सुपरटेक ने अकेले 5000 करोड़ रुपये से ज्यादा लोन लिए थे. कॉरपोरेशन बैंक ने बिल्डरों को हजारों करोड़ अग्रिम दिए थे. इसमें बैंक और बिल्डर मिलकर खरीदारों को नुकसान पहुंचा रहे थे. अब इस पूरे मामले को समझते हैं कि ये पूरा मामला क्या है, इसमें कैसे ये दोनों मिलकर बायर्स को चूना लगाते हैं. इसमें हम सबवेंशन स्कीम की बात भी करेंगे और किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए बैंकों द्वारा खरीदारों को लोन जारी करके बिल्डर्स को फायदा पहुंचाने और ग्राहकों को चूना लगाने की भी. दोनों ही तरीकों में बायर्स अब फंस रहा है.

सवाल – आखिर बैंक–बिल्डर की सांठगांठ का मतलब क्या है?

– सांठगांठ का अर्थ है दो पक्षों का छुपकर आपसी फायदे के लिए नियमों और पारदर्शिता की अनदेखी करना. बिल्डर को फायदा चाहिए कि उसकी अधूरी या संदिग्ध परियोजना के लिए भी ग्राहक को आसानी से लोन मिले. बैंक अधिकारी को फायदा चाहिए कि वह अपने पद का दुरुपयोग करके रिश्वत या कमीशन कमा सके.

नतीजा यह होता है कि जिस प्रोजेक्ट पर सामान्य स्थिति में बैंक फाइनेंस नहीं करता, उसे भी मंजूरी मिल जाती है. बीच में पिसता है ग्राहक, जो अपनी मेहनत की कमाई लगाकर फंस जाता है.

सवाल – ये खेल शुरू कैसे होता है?

– सबसे पहला झांसा प्रोजेक्ट अप्रूवल का दिया जाता है. बिल्डर ग्राहक से कहता है कि उसकी परियोजना “बैंक अप्रूव्ड” है. इसका मतलब यह दिखाया जाता है कि बैंक ने पूरी जांच कर ली है और प्रोजेक्ट सुरक्षित है. बैंक के कुछ अधिकारी बिना गहरी जांच किए या जानबूझकर कमियों को नज़रअंदाज़ करते हैं. क्योंकि इसके बदले उन्हें बिल्डर से लाभ मिलता है – कमीशन, फ्लैट या दूसरी सुविधाएं. आम खरीदार को लगता है कि जब बैंक ने प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है तो धोखा नहीं होगा. वह आसानी से होम लोन लेने के लिए तैयार हो जाता है.

सवाल – ग्राहक को ठगा कैसे जाता है?

– या तो ग्राहक किस्तें भरता रहता है या ग्राहक के नाम से बिल्डर पहले एक मोटी रकम बैंक से जारी करा लेता है. इसके बाद बिल्डर बीच में ही निर्माण रोक देता है, प्रोजेक्ट अधूरा छोड़ देता है. बॉयर्स को न तो फ्लैट मिलता है और न ही पैसा वापस. बिल्डर और बैंक अधिकारी मिलकर संपत्ति का दाम असल से ज्यादा दिखाते हैं. ग्राहक को लगता है कि वह बाजार भाव पर खरीद रहा है, लेकिन हकीकत में वह महंगे सौदे में फंस चुका होता है.
कई बार नकली नक्शे, अवैध जमीन या अधूरे कागजों पर बैंक लोन पास कर देता है. ग्राहक बाद में जब रजिस्ट्री कराने जाता है तो पता चलता है कि जमीन विवादित है. एक ही प्रॉपर्टी को अलग-अलग ग्राहकों को बेचकर या कई बैंकों से फाइनेंस करवा लिया जाता है. ग्राहक को घर कभी मिलता ही नहीं.

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सवाल – इसमें बैंक कौन से नियमों की अनदेखी करता है?

– भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB) ने लोन वितरण और प्रोजेक्ट अप्रूवल के लिए स्पष्ट गाइडलाइंस दी हैं. मगर सांठगांठ में इनकी अनदेखी होती है.
– बैंक को हर प्रोजेक्ट की कानूनी और तकनीकी जांच करनी होती है. लेकिन बिल्डर से मिलीभगत कर अधिकारी जांच रिपोर्ट को सकारात्मक बना देते हैं.
– लोन की राशि धीरे-धीरे निर्माण की प्रगति के हिसाब से जारी होनी चाहिए. लेकिन बिल्डर के दबाव में बैंक पूरा लोन पहले ही रिलीज कर देते हैं, चाहे साइट पर काम न हुआ हो.
– बैंक को देखना चाहिए कि लोन असली खरीदार को मिल रहा है, न कि निवेशकों या फर्जी नामों को. लेकिन फर्जी अकाउंट खोलकर या बोगस खरीदार दिखाकर भी लोन पास कर दिए जाते हैं.
– खरीदार और बिल्डर दोनों की साख की जांच जरूरी है लेकिन अधिकारी रिश्वत लेकर इन औपचारिकताओं को नजरअंदाज कर देते हैं.

सवाल – बिल्डर को इससे क्या फायदा मिलता है?

– अधूरे प्रोजेक्ट के लिए भी लोन मिल जाता है. ग्राहक को “बैंक अप्रूवल” का झांसा देकर बिक्री आसान हो जाती है. ओवरप्राइसिंग से अतिरिक्त मुनाफा.
फर्जी खरीदारों के जरिए ब्लैक मनी को व्हाइट करने का मौका मिलता है.

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सवाल – बैंक अधिकारियों को कैसे फायदा मिलता है?

– बिल्डर से नकद कमीशन या फ्लैट की डील. प्रमोशन और टारगेट पूरा करने का दबाव कम करना, क्योंकि इससे ज्यादा लोन वितरित हुआ दिखता है.
बिल्डर से निजी फायदे लेना.

सवाल – सबवेंशन स्कीम क्या है?

– सबवेंशन स्कीम में तीन पक्ष होते हैं – बिल्डर, बैंक (लेंडर) और खरीदार. परंपरागत तौर पर खरीदार बैंक से लोन लेकर समय-समय पर ईएमआई चुकाता है. सबवेंशन मॉडल में बिल्डर यह वादा करता है कि वह खरीदार की ओर से पहले के कुछ वर्षों के EMI या इंटरेस्ट भरेगा – ताकि खरीदार को शून्य या कम ब्याज दर का लाभ दिखे और बिक्री आसान हो जाए. बैंक अक्सर लोन की स्वीकृत राशि बिल्डर के अकाउंट में सीधे ट्रांसफर कर देता है और निर्माण पूरा होने तक बिल्डर ईएमआई का बोझ उठाता दिखता है. यह व्यवस्था ट्रिपर्टाइट एग्रीमेंट में लिखी जाती है.

सवाल – यह स्कीम क्यों आकर्षक दिखती है?

– खरीदार को ‘0% इंटरेस्ट’ या कम ईएमआई का ऑफर मिलता है – इसलिए खरीद तेज़ी से होती है. बिल्डर के लिए यह सेल-बूस्टर है – ग्राहक जल्दी खींचे चले आते हैं. बैंक के लिए बिक्री बढ़ती है.
बैंक स्वीकृत रकम को बिल्डर के अकाउंट में सीधे दे देता है; बिल्डर को बड़ा कैश-फ्लो मिल जाता है. अगर बिल्डर परियोजना पूरा न करे या पैसे डायवर्ट कर दे, तो निर्माण रुक जाता है, ऐसे में अगर बिल्डर बैंक को ईएमआई के नाम पर दी जाने वाली राशि नहीं चुकाता तो बैंक वो बायर से वसूल करने लगता है. खरीदार पर ही लोन-बोझ और क्रेडिट-स्कोर पर असर पड़ता है. इस तरह की स्कीमों से हजारों ग्राहक ठगे जाते हैं.

सवाल – ग्राहक को लगता है कि ट्रिपार्टाइट एग्रीमेंट उसको बचाएगा लेकिन असल में ये एग्रीमेंट क्या होता है?

– ट्रिपार्टाइट एग्रीमेंट खरीदार, बिल्डर और बैंक के बीच समझौता है, जिसमें बिल्डर प्री ईएमआई या इंटरेस्ट देने का वादा करता है लेकिन असल बारोवक अक्सर खरीदार ही बना रहता है.
जब बिल्डर ईएमआई रोक देता है तो बैंक, दस्तावेजों के आधार पर, बायर को भुगतान के लिए नोटिस भेजता है. उससे बैंक वसूली करने लगता है.
सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि सबवेंशन-मॉडल के कई मामलों में पैटर्न-आधारित फ्रॉड दिखता है. ये मामला संगठित रूप में फैल चुका पैटर्न है. ऐसे में बायर्स को ट्रीपार्टाइट एग्रीमेंट का क्लॉज़ जरूर पढ़ना चाहिए कि किसे असल बॉरोवर दिखाया गया है; बिल्डर के क्या दायित्व हैं.

सवाल – ग्राहक के लिए नुकसान कितना बड़ा है?

– घर नहीं मिलता, लोन चुकाना पड़ता है. कोर्ट–कचहरी के चक्कर में सालों लग जाते हैं. बिल्डर पर केस डालने में ग्राहक का समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं. ईएमआई और किराया दोनों देना पड़ सकता है -क्योंकि घर अभी मिला नहीं है, और रहना तो कहीं पड़ेगा ही.



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