राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने 22 साल पुराने एक मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए एक दुर्लभ फैसला सुनाते हुए 55 वर्षीय आदिवासी महिला को दोबारा जेल भेजने से इनकार कर दिया है। मामला 2011 के एक फैसले में हुई बड़ी तथ्यात्मक भूल से जुड़ा है, जिसमें
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जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस आनंद शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि सिस्टम की गलती का खामियाजा एक गरीब महिला को भुगतने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि महिला को बची हुई सजा के लिए अब जेल नहीं भेजा जाएगा और उसकी 2 साल की सजा को ही पर्याप्त माना जाएगा।
चिकन और शराब को लेकर झगड़ा, पति को मारी कुल्हाड़ी
घटना वर्ष 2003 की है और बांसवाड़ा के एक सुदूर पहाड़ी इलाके से जुड़ी है। काली नामक महिला का पति कांति बाजार से चिकन और शराब लेकर घर आया था। जब काली खाना बना रही थी, पति आंगन में शराब पी रहा था। देर से खाना परोसने को लेकर दोनों में कहासुनी और हाथापाई हो गई। गुस्से में काली ने पास रखी कुल्हाड़ी से पति पर वार कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।
ट्रायल कोर्ट ने 5 फरवरी 2004 को काली को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उसने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।
सिस्टम की भूल: 2011 में गलत तथ्य पर हुआ फैसला
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 18 जुलाई 2011 को आंशिक रूप से फैसला सुनाया। कोर्ट ने उसकी धारा 302 IPC (हत्या) के तहत सजा रद्द कर इसे गैर-इरादतन हत्या में बदल दिया।
इस फैसले में कोर्ट ने यह मान लिया था कि आदिवासी महिला 7 जुलाई 2003 से 18 जुलाई 2011 तक लगातार न्यायिक हिरासत में रही। यह धारणा 24 मार्च 2005 के एक पत्र पर आधारित थी, जिसमें बताया गया था कि 1 अप्रैल 2004 को जमानत मिलने के बाद भी वह जमानत बांड जमा नहीं करा सकी। कोर्ट ने उसकी सजा को ‘भुगती गई अवधि’ तक कम करते हुए रिहा कर दिया था।

हालांकि, बाद में यह तथ्य सामने आया कि उसने 23 दिसंबर 2005 को जमानत बांड जमा कराया था और उसी दिन सेंट्रल जेल से रिहा हो गई थी। यानी वर्ष 2011 के फैसले के वक्त वह जेल में नहीं थी और उसने कुल मिलाकर सिर्फ 2 साल की सजा काटी थी, 8 साल नहीं। यह गलती रजिस्ट्री, ट्रायल कोर्ट और सरकारी वकील के स्तर पर हुए कम्यूनिकेशन गैप के कारण हुई थी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने उठाई आपत्ति
4 अगस्त 2011 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक नंबर 1), बांसवाड़ा ने हाईकोर्ट को पत्र लिखकर 18 जुलाई 2011 के फैसले में इस विसंगति की जानकारी दी। इस पर पिटीशन दायर की गई। मामला लंबे समय तक लंबित रहा और याचिकाकर्ता की ओर से कोई नहीं आया, जिस पर कोर्ट ने एडवोकेट शोभा प्रभाकर को एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किया।
कोर्ट की टिप्पणी: विधवा होने से बड़ी सजा क्या?
कोर्ट ने अपने फैसले में घटना के विवरण का उल्लेख किया। वर्ष 2003 में बांसवाड़ा के सियाताली गांव में रहने वाली काली के पति कांति बाजार से चिकन और शराब लेकर घर आए थे। काली खाना बना रही थी और कांति आंगन में शराब पी रहे थे। देर से आने पर काली ने टोका, जिससे दोनों में कहासुनी और हाथापाई हुई।
जस्टिस फरजंद अली ने फैसले में लिखा–
यह घटना घरेलू परिवेश में हुई, जहां पति-पत्नी के बीच मौखिक विवाद और शारीरिक हाथापाई में यह कृत्य हुआ। कोई पूर्व योजना नहीं थी, केवल एक वार किया गया और मृतक के शरीर पर कोई अन्य बाहरी चोट नहीं थी। मृतक कोई और नहीं बल्कि अपीलार्थी का अपना पति था। हालांकि उसकी मौत क्षणिक आवेश में हुई, लेकिन इससे महिला को अपूरणीय क्षति हुई है। वैधव्य (विधवापन) के दंश और अकेलेपन के अभिशाप से बड़ी सजा और क्या हो सकती है?

सुधारवादी दृष्टिकोण: जेल भेजना सुधार नहीं, प्रतिशोध होगा
कोर्ट ने कहा कि घटना 2003 की है और काली तथा मृतक कांति बांसवाड़ा के दुर्गम पहाड़ी इलाके के एक गरीब परिवार से थे। निकटतम पुलिस स्टेशन लगभग 25 किलोमीटर दूर है और इलाके में सड़क संपर्क भी नियमित नहीं है। घटना के समय काली 32 साल की थी और अब लगभग 55 साल की हो चुकी है।
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने स्वीकार किया कि काली का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और रिहाई के बाद उसके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि 20 साल बाद इस गरीब महिला को शेष 6 साल की सजा काटने के लिए जेल भेजना न तो न्यायसंगत है और न ही मानवीय। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह त्रुटि याचिकाकर्ता की नहीं थी, बल्कि रजिस्ट्री, ट्रायल कोर्ट, सरकारी अधिकारियों और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के कार्यालय के बीच कम्यूनिकेशन में कमी के कारण हुई। खंडपीठ ने कहा–
अगर उद्देश्य सुधार है, तो हमें चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। इतने साल के संघर्ष के बाद बची हुई 6 साल की सजा के लिए उसे वापस जेल भेजना क्रूर और अन्यायपूर्ण होगा।


